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ठीक नहीं बताया जा सकता, कि यह सब आदमी किस देशसे आयें और कितने दिनसे इन पहाड़ोंमें घर बनाकर बसे हैं । थियङ्गथा एक जातिका नाम है । आजकलके चाकमा इसी जातिके अन्तर्गत हैं । कोई-कोई अनुमान करते हैं, कि थियङ्गथाओं और चाकमाओंका आदिवास आराकानमें था । थियङ्गथामें थियङ्—शब्दका अर्थं नदी है, थ या था अथवा चा शब्दसे पुत्रका बोध होता है। इससे जो नदीके किनारे घर बनाकर रहे, वही नदीपुत्र आजकलको थियङ्गथा जाति हैं । इनकी बोलो पुरानी आराकानी और आचार-व्यवहार प्रायः बौद्धोंकासा है। थियङ्गथा देखो। किन्तु अदिमग या तुङ्गथा कौन हैं ? तुङ्ग या तुङ् शब्दका अर्थ पर्वत है। इसीसे अनुमान होता है, कि पहले जो जाति केवल पर्वत में रहते रहो, उसे अब लोग तुङ्गधा कहते हैं । किन्तु अदि शब्दका अर्थ क्या है ? विशेष अनुसन्धान करने- पर भी इस बातका कुछ ठीक-ठाक न लगा । कर्नल डाल्टन साहबको पुस्तकमें भी इस नामका कहीं पता नहीं चलता। कप्तान 'लिअन' साहबने तुङ्गथा नामका उल्लेख किया है, किन्तु अदिमसका नाम नहीं लिया । इससे मालूम पड़ता, कि यह नाम क्रमसे अप्रचलित होते जाता है। पहाड़ौ स्वयं अपनी बात कुछ भी नहीं जानते। वह यह सब पेंचको बातें नहीं समझते, कि कौन किस जाति और किस सम्प्रदायका आदमी है । परिचयके लिये वह अपने वासस्थानका नाम बता सकते हैं । इससे स्पष्ट ही मालूम पड़ता है, कि थियङ्गथा, चाकमा, तुङ्गथा, लुशाई, कुको प्रभृति नाम उनके रखे हुए नहीं। बङ्गाली, ब्रह्मदेशवासी, चौना प्रभृति लोगोंने ही असभ्य पहाड़ियोंके यह नाम रखे होंगे। इसमें सन्देह नहीं, कि 'अदिमग' शब्द आदिमग किंवा अद्रिमग शब्दका अपभ्रंश है । किन्तु तुङ्गथा ( अर्थात् पर्वतपुत्र) शब्दको अपेक्षा वास्तवमें अद्रिमग शुद्ध मालूम होता है ।
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आदमी थे । वह वहां चोरी और लूट-मारकर अपना काम चलाते थे, अन्तको राजाके भयसे भारतवर्ष में आकर उन्होंने आश्रय लिया । कोई-कोई कहते हैं, — यह भारतवर्षके आदिम निवासी हैं, दूसरे देशसे यहां नहीं आये । किन्तु इस बातके दो-एक आधुनिक प्रमाण मिलते हैं, कि दस्य ब्रह्मदेशसे आकर भारत- वर्ष आश्रय लेते थे । कर्णवालिसके समय ब्रह्म- राजने चट्टग्रामवाले सरदार के पास एक पत्र भेजा, जिसमें चोरोंको बात लिखी थी । सन् १७८७ ई० में आराकानके राजाने चट्टग्रामके सरदारको जो पत्र लिखा, उसमें भी चोरोंकी बात थो इन दोनो पत्नीके पढ़नेसे उस समयकी कितनी ही बातें समझ पड़ती हैं, इसीसे यहां उनका मर्मं लिख दिया गया है । ब्रह्मराज-तुर्बु माको आज्ञासे आराकानके कर्मचारोने यह पत्र चट्टग्राम भेजा था, - 'हम चक्रवर्ती महाराज हैं। हमारे शासनमें सौ (१००) ग्राम विद्यमान हैं। लोग हमें राजच्छत्र- धारी कहते हैं । हम सूर्यकुलोद्भव हैं, सोनेका चन्द्रातप सर्वदा हमारे शिरपरं शोभा देता है । असंख्य-असंख्य राजा हमारी पूजा किया करते हैं । हमारे राज्यमें सोना, चांदी और कई सौ रत्न उत्पन्न होते हैं। हमारे पास वज्र-जैसे अस्त्र-शस्त्र विद्य मान हैं, जिन्हें देखते हो शत्रु शरण लेते हैं । हमारे पास जो समस्त सैन्य-सामन्त हैं, उनसे कोई भी बात कहना नहीं पड़ती। इस राजसंसारमें हाथो घोड़ों की कोई संख्या नहीं। हमारी सभामें दश शास्त्रज्ञ पण्डित और एक-सौ-चार पुरोहित विद्यमान हैं, जिनके परामर्शसे हम राज्यशासन करते हैं। विद्युत्का वेग चाहे टल जाये, किन्तु हमारी आज्ञा नहीं टलतो । हमारी प्रजा धार्मिक और न्यायपरायण है। वह नहीं जानतो, कि दुष्कर्म किसे कहते हैं। हम सूर्यके समान हैं, अन्धकारमें भी हमारे ज्ञानका आलोक पहुंचा करता है । लोगोंको दुरभिसन्धि हम सहजमें ही समझ सकते हैं । 'दया और न्यायपरायणता हो राजाका धर्म है । इस राज्य में चोर एवं असत् व्यक्तियोंको उचित शास्ति |
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अदिमग