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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३३७

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अदिगम

दासीसे विवाह कर सकते हैं। इसके बाद कल जो दासी थी, वह आज गृहलक्ष्मी - प्रभुको अर्द्धाङ्गिनी । बन सुखसे संसारधर्मको निर्वाह करती है । कोई महाजन निर्धन हो जानेसे अपनी दासदासीको दूसरे व्यक्तिके हाथ बेच सकता है । मनुष्यको रहन रखनेको चाल थियङ्गथा जातिमें ही अधिक है ।थियङ्कथा देखो । तुङ्गथाओं में इसतरह मनुष्यको रहन रखनेको चाल कदाचित् सुन पड़ता है। कितने हो । यह बात भी कहते, कि युद्धके बाद पराजित जातिके जो स्त्री-पुरुष यह पकड़ लाते, उन्हींको घरका दास- दासी बनाते हैं, किन्तु ऋणके लिये मनुष्यको रहन नहीं रखते । लिलइन साहबने भी अपनी पुस्तकमें इस मतको समर्थन किया है। किन्तु और भी एक बात है, जिसके झूठ या सच होनेका कोई ठिकाना नहीं। पहले असभ्य पहाड़ी कदाचित् गांवमें जाकर लड़के चुरा लाते थे। लड़कोंका मांस हलवानसे भी मुलायम होता है । जो उसे खाते हैं, उन सकल नर- पिशाच-राक्षसोंके मुखमें उसका स्वाद भो आ सकता है। पहाड़ी कदाचित् लड़के चुरा उनमें किसीका - मांस खाते और किसौको दास भी बना लेते थे। ब्रह्म देश के राजाने जो पत्र लिखा, उसमें इस बातका कितना ही आभास मिला है, कि पहले आराकान प्रभृति स्थानोंके असभ्य लोग मनुष्य खाते थे । दूसरा भी एक प्रमाण है। आराकान प्रभृतिके पहाड़ी लोग स्नान करते समय शिर नहीं भिगोते । शिर भिगोनेसे निविड़ लम्बे-लम्बे बाल सुखाने में बड़ा ही कष्ट मिलता है, इसोसे केवल शरोर डुबो जलसे बाहर निकल आते हैं । दूसरा भो एक भय है, - कदाचित् भिगोये हुए शिर में जूए बहुत पड़ जाते हैं । एक कहानी है, कि पहले थियङ्गथा, तुङ्गथा प्रति पहाड़ियोंके शिर में जूए न थे। इसके बाद हठात् एक दिन आराकानके राजाका शिर खूब खुजलाने लगा । रानीने बालोंको उठा और ढूंढ-ढूंढ देखा, कि शिरमें एक प्रकार के काले-काले कोड़े पड़ गये थे। आंख से क्या देखना था ? उन कोड़ोंका नाम भी तो किसीने कभी नहीं सुना । कोड़े निकालकर

सोनेके पिंजड़े में रखे गये ; पिंजड़ा राजप्रासादके दरवाज़ेपर लटकने लगा। कितने हो लोग देख- सुनके चले जाते थे। सवेरेसे सन्ध्यातक लोगों की भीड़ कम न होती थी । जो आता, वही शिरपर हाथ रखके सोचने लगता, — ब्रह्माको सृष्टिमें यह कौन पदार्थ है ! राजाने नगर-नगर में घोषणा करा दो। घोषणामें कहा गया था, जो इस कोड़ेका नाम और इसको उत्पत्ति ठीक-ठीक बता सकेगा, उसे अधिक और क्या - राजकन्या विवाह में प्रदान की जायेगी । दैवज्ञ और पुरोहित पोथी - पत्रा खोलके बैठे ; कितनी हो गणना लगाई, अङ्गपात किया, किन्तु कौड़ेका नाम ठीक न निकला । देश-देशान्तरसे भी कितने ही लोग आये, किन्तु कोड़ेका नाम बता न सके । अन्तको एक राक्षस मनुष्यका रूप बना सभामें जा पहुंचा । उसने गणनाकर कहा, कि उस कोड़ेका नाम जूआं था, जो अब्दुल ख़ां नामक एक बङ्गाली सौदागरके बालोंसे राजाके शिरमें चढ़ गया। फिर वह सौदागर पकड़ बुलाया गया। नौकरोंने उसके बाल खोलकर देखे ; सब बात सत्य थी, कुछ भो उसमें झूठ नहीं, - अब्दुल खांके शिरमें जूए भरे थे । अपराध प्रमाणित हो गया और उसे उचित शास्ति देनेकी व्यवस्था हुई । इसलिये उस समय गड्ढे में बड़े-बड़े ज़हरीले सांप- बिच्छू छोड़े गये और उसमें अब्दुल खांको डालके प्राणवध किया गया ।

राजाको मालूम न था, कि उनको सभामें राक्षस आया, उन्होंने आदरकर उसे कन्याको प्रदान किया । राक्षसने देखा,–'अष्टप्रहर मनुष्यके समीप रहना पड़ता ; जिस ओर बैठो, जिस ओर खड़े हो, उसी ओर मनुष्यका गन्ध लहराता है । लोभ कितने दिन संवरण किया जायेगा ? न जाने किस दिन किसे खा जाऊं, इसलिये ऐसे स्थानसे चल देना हो अच्छा है।' यही विचार उसने श्वसुरसे बिदा मांगी। राजाने अनेक दासदासी दे कन्या और दामादको बिदा किया। राह में जाकर मनुष्यमांस खानेको राक्षस बहुत व्याकुल हुआ । साथमें राजकन्या रही,