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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३४

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अकारक—अकालकुष्माण्ड
अकारक-मिलाव (हि॰ पु॰) एक प्रकारकी रासायनिक मिलावट, जिसमें मिली हुई वस्तुओंके पृथक् गुण ठीक-ठीक बने रहते हैं और वे इच्छानुसार अलग-अलग भी की जा सकती हैं।
अकारज (हि॰ पु॰) कार्य्यकी हानि। हानि।
अकारण (सं॰ त्रि॰) निष्प्रयोजन। नास्ति कारणम् हेतुरुद्देश्यम् वा यस्य। बहुव्री॰। कारणशून्य। अकारणगुणोत्पन्नगुण (सं॰ पु॰) अकारणात् हेत्व-भावाद्गुणात् उत्पन्नो जातो गुणो धर्म्माः। न्यायमतसे, विभुनिष्ठ विशेष गुण-समूह। जैसे बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, यत्न, धर्म्म, अधर्म्म, भावना, शब्द।
अकारथ (हि॰ वि॰ सं॰ अकार्य्यार्थ, प्रा॰ अकारियत्थ) निष्प्रयोजन। वृथा। लाभरहित।
अकारन (हि॰ वि॰) अकारण देखो।
अकारिन् (सं॰ त्रि॰) न-कृ-णिन्। कर्त्तृभिन्न। कार्य्यहीन।
अकार्पण्य (सं॰ त्रि॰) नास्ति कार्पण्यम् यस्य। बहुव्री॰। कृपणता-शून्य।
अकार्य्य (सं॰ क्ली॰) (हि॰ पु॰) न-क्ल-ण्यत्। नञ् तत्।*। ऋहलोर्ण्यत्। पा ३।१।१२४ अकारान्त एवं हलन्त धातुके उत्तर ण्यत् प्रत्यय होता है। अप्रशस्त कार्य्य। दुष्कर्म्मी। नास्ति कार्यम् यस्य बहुव्री॰। कार्यहीन। (त्रि॰) अकाज। हर्ज, बुरा काम।
अकाल (सं॰ पु॰) (अ—नहीं वा बुरा, काल—समय) बुरा समय। अप्राप्तः कालः, शाकपार्थिवादि तत्। असमय। अनवसर। कुसमय। दुर्भिक्ष। मँहगी। ज्योतिषके मतसे उपनयन विवाहादि शुभकर्म्मके अयोग्य समय। अकाल बहुत तरहके हैं। उनका स्थूल विवरण यहाँ लिखा जाता है। वृहस्पति अस्त होनेसे पहले वृद्धत्वमें १५ दिनं कालाशुद्धि और उसके बाद ३२ दिन। बृहस्पति उदय होनेके बाद बालत्वके १५ दिन। वृहस्पति और सूर्य्यके योगके १० दिन। सिंहराशिमें वृहस्पति रहनेपर पूरा एक वर्ष। इसमें एक विशेषत्व यह है कि, यदि माघ महीनेकी पूर्णिमाको मघा नक्षत्रका योग हो, तो इस प्रकारकी काल-अशुद्धि होगी, नहीं तो

न होगी। यदि वृहस्पतिका एक राशिमें स्थिति-काल समाप्त न हुआ हो और वे पूर्व्व राशिमें गमन करें, तो इस वक्रातिचारके कारण २८ दिन अशुद्ध माने जायेंगे। वृहस्पति यदि पूर्व्व राशिमें एक वर्ष भोग न करके अन्य राशिमें चले जाय और फिर पूर्व्व राशिमें न आवें, तो इस महातिचारको लुप्त-सम्वत्सर कहते हैं। लुप्त संवत्सरका एक वर्ष अशुद्ध रहता है। वृहस्पतिका एक राशिमें भोगकाल पूर्ण न होनेपर भी यदि वह एक राशिसे दूसरी राशिमें चले जाये और फिर उसी पूर्व्व राशिमें लौट आवें, तो इस अतिचारके कारण ४५ दिन अशुद्ध माने जायेगे। वृहस्पति यदि राहुग्रस्त हो जायँ, तो एक वर्ष अकाल माना जायगा।
शुक्रके महास्तके पूर्व्व वृद्धत्वके १५ दिन और महास्तके बादके ७२ दिन अकालके दिवस हैं। शुक्रके उदयमें १० दिन और अस्तमें १२ दिन अकालके माने गये हैं। भानुलङ्घित मासके, क्षय मासके और मलमासके पूरे ३० दिन और पूरा महीना ही अशुद्ध माना गया है। भूकम्प आदि अद्भुत घटनामें एक सप्ताह अशुद्ध है। पौषादि चतुर्मासके बीच जो एक दिन चरणाङ्गित वर्षणका है, वह दिन अशुद्ध है। दो दिनोंतक एक प्रकारसे ही वृष्टि होनेपर तीन दिन और तीन दिनोंतक एक तरहसे वृष्टि होनेपर अन्तिम दिवससे एक सप्ताहतकके दिवस अशुद्ध माने गये हैं। साथमें पहिलेके दो दिन भी जोड़ लिये जाते हैं। इस तरह ९ दिन अशुद्ध हुए। हरिशयनके चार महीने अशुद्ध होते हैं। चन्द्र-सूर्य्य-ग्रहणमें कर्म्म विशेषसे कहीं एक दिन, कहीं तीन दिन और स्थूल-भावसे एक सप्ताहके दिवस अशुद्ध माने गये है।
अकाल-कुसुम (सं॰ पु॰) बिना समय अर्थात् वे-ऋतुका फूला हुआ फूल। ऐसा फूल दुर्भिक्ष अथवा अन्य किसी उपद्रवकी सूचना देनेवाला समझा जाता है।
अकालकुष्माण्ड (सं॰ पु॰) गान्धारीने कोहड़े के आकार-का एक मांसपिण्ड अकालमें प्रसव किया था। उसीसे दुर्य्योधन आदिका जन्म हुआ। उसीकी सन्तान कुरु-