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अदृष्ट माननेमें यही दोष है, भी मानते है। कि यदि कपाल में जो लिखा है, वही होगा, तो हम निष्कर्मा क्यों न बन जायें । सांसारिक काम करनेमें क्या फल है ? फिर इस बातका कोई जवाब नहीं, कि जब पहले सृष्टि हुई थी, तब पूर्वजन्मार्जित कर्मफल किसका था और ऐसी अवस्था में लोग सुख-दुःख के भागी कैसे बने । फिर यदि अदृष्ट न मानें, तो इसका क्या कारण होगा, कि संसारमें कोई सुख और कोई दु:ख । भोगता है । इस समस्याको व्याख्या करना कठिन है। इससे लोग कर्मवादी बन जाते हैं । ईश्वर ही जाने, कि असल में बात क्या है; हम इसका उत्तर दे नहीं सकते । फिर हम देखते, कि अतिप्राचीन कालसे सकल देशों के लोग अदृष्ट मानते चले आये क्या संस्कृत और क्या अरबी-फारसीको पुस्तकें- अष्टकी बात सभी जगह देख पड़ती है। हमारे सुश्रुत नियति न मानते थे । उनका यहांतक विश्वास था, कि जो लोग नियति मानते, वह सब बुद्धिमान् नहीं। क्योंकि, ऐसा विश्वास रख कोई भी सांपके मुंहमें नहीं घुसता, कि कपालमें जो लिखा है, वह अवश्य होगा । वलि, मन्त्र और यागयज्ञ का विधान भी सब लोग करते हैं । यदि अदृष्टका लिखा न मिटे, तो इन सब कामों का क्या फल हो सकता है ! २ भावी विपत्ति, नागहानी आफत । ३ बुद्धि या परीक्षासे बाहर विषय, वह काम जिसमें अक्ल या आज़मायश न चले। ( पु० ) ४ अदृश्य कमि, कोड़े जो देख न पड़ें। (त्रि ० ) न दृष्टम् । ५ अकृतदर्शन, अवोचित, न देखा हुआ । अदृष्टकर्मन् (सं० त्रि० ) जिसने काम-काज देखा नहीं, अनुभवरहित । अदृष्टकाम (सं० पु० ) कभी न देखी गई वस्तुका प्रेम, अनदेखी चीज़का लालच । अदृष्टनर, अदृष्टपुरुष (सं० पु० ) न्याय जो वादी और प्रतिवादी आप ही कर लेते हैं । अदृष्टपरसामर्थ्य (सं० पु० ) वह पुरुष जिसने शत्रुको शक्तिका अनुभव प्राप्त न किया हो । अदृष्टपूर्व (सं० त्रि०) न पूर्व दृष्टम्, सुप्सुपेति |
समासात् परनिपातः । सह सुपा । पा २।१।४।१ पहले जो देखने में नहीं आया । २ अनोखा, निराला । दृष्टफल (सं० त्रि०) १ उन फूलों वाला जो देखे न गये हों। (क्लो०) २ फल जो देख न पड़े, पोशीदा नतीजा । अदृष्टरूप(सं० त्रि०) अनदेखे रूपवाला, ऐसी शक्लका, जो देखी न जाये । अदृष्टवत् (सं० त्रि०) १ भाग्य - सम्बन्धोय, किस्मत से हुआ । २ भाग्यवान्, खुशकिस्मत ३ अभागा, बदबख्त अदृष्टवाद (सं० पु० ) भाग्य पर विश्वास, विना विचारे शास्त्रानुसार प्रारब्धका स्वीकार । अदृष्टहन् (वै० पु० ) विषमय कमिको नाश करने- वाला सूर्य । अदृष्टाक्षर (सं० पु० ) अक्षर जो देख न पड़े, न दिखाई देनेवाले हर्फ । यह अक्षर बहुधा प्यान और नोबू जैसी चीज़ोंके रससे बनते और अग्निपर तपानेसे देख पड़ते हैं । अदृष्टार्थ (सं० त्रि० ) इन्द्रियसे अज्ञात विषयपर विश्वास रखनेवाला । अदृष्टाश्रतपूर्वत्व (सं० क्लो० ) वह गुण, जिसका कभी प्रत्यक्ष हुआ न हो । अदृष्टि, अदृष्टिका (सं० स्त्री० ) न दृष्टिः, नञ्-तत् विरोधार्थे । १ दर्शनाभाव । २ क्रूरदृष्टि, कोपदृष्टि, गुस्से को नज़र । (त्रि० ) ३ दृष्टिशून्य, अन्धा । अदेख ( हिं० वि० ) अदृश्य, अदृष्ट, गुप्त, पोशीदा, छिपा, जो देख न पड़े । अदेखो (हिं० वि० ) देख न सकनेवाला, हसदी, जिसे किसीका वैभव देखनेसे डाह लगे । अदेय (सं० त्रि०) न देयम्, दा-यत् ; नञ्-तत् । १ दानके अयोग्य, न देने काबिल । ( क्लो० ) २ न्यायानुसार न देने या न समर्पण करने योग्य द्रव्यं । अदेयदान (सं० क्लौ० ) अन्याय दानं, बेजा बख्शिश । अदेव (सं० त्रि०) १ जो देव-सम्बन्धीय न हो, देवतांसे सम्बन्ध न रखनेवाला । ( पु० ) २ वह जो देवता नहीं । ३ राक्षस, निशाचर । |
पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३४२
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अदृष्ट — अदेव