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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३५१

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अद्वैत — अधः कृष्णाजिनम्

यह शान्तिपुरमें रहते थे । इनका जन्म वारेन्द्रब्राह्मण कुलमें हुआ था । प्रभुने दारपरिग्रह किया था, इनके औरससे आठ सन्तान हुए। यह पहलेसे ही विलक्षण कृष्णभक्त थे, भागवतादि पुस्तक पढ़ने में इनका मन खुब लगता था । गौराङ्गके जन्म होनेसे पहले यह सर्वदा ही कहा करते थे, - नवद्वीपमें जो ( अर्थात् गौराङ्ग ) जन्मग्रहण करेंगे, मैं उनका अनुचर बनूंगा । पीछे गौराङ्गने जब सन्यासा- श्रमको अवलम्बन किया, तब अद्वैत प्रभु भी संसारको परित्यागकर उनके अनुचर बन गये ।

वैष्णवोंके मतसे तीन प्रभु होते हैं, - १ श्रीश्री- नित्यानन्द प्रभु, २ श्रीश्री अद्वैत प्रभु और ३ श्रीश्री चैतन्य महाप्रभु । गौराङ्ग और अद्वैत एकप्राण और एक आत्मा थे । संसाराश्रमको त्याग करनेपर श्रीचैतन्य सर्वदा ही अद्वैत-प्रभुको साधुचूड़ामणि कहकर आदर किया करते थे ।

गौराङ्गका जन्म १७०७ शक में हुआ था । अद्वैत प्रभु उनको अपेक्षा वयोज्येष्ठ थे । इसलिये यदि इन्हें ३० वर्ष बड़ा कहें, तो यह मानना पड़ेगा, कि इनका जन्म १३७७ शकमें हुआ था । वैष्णवोंका पर्वदिन देख निश्चित होता है, कि यह माघ मासको शुक्ला सप्तमोको आविर्भूत हुए थे । उस समय मुसलमान राजाओं का अत्यन्त प्रादुर्भाव था, हिन्दुओं का आचार-व्यवहार भी इस लाम जैसा हो गया था । अद्वैत प्रभुके आठ सन्तानमें सात जन यथेच्छाचारी थे ; केवल अच्युत परम वैष्णव रहे, वह सिवा विष्णु- भक्तिके और कुछ जानते न थे । यही कारण है, कि प्रभु उनसे बहुत प्रसन्न रहते थे ।

अद्वैत, गौराङ्गः प्रभृति वैष्णव जब कृष्णप्रेमसुधा चारो ओर बरसाते घूमते थे, तब खड़दहके नित्यानन्द प्रभु भी जाकर इनके दलमें मिल गये ।

तीनो प्रभुके अप्रकट होने बाद नवद्दीपके वैष्णवोंने इन तोनो जनोंको दारुमय तीन मूर्तियां स्थापन कीं। आज भी बारी-बारी उन सकल मूर्तियोंकी सेवा हुआ करती है । शान्तिपुरवाले उड़िगोस्वामीके सिवा दूसरे प्रायः सभी गोस्वामी

अद्वैत प्रभुके सन्तान हैं । इस वंश अनेक सुपण्डित व्यक्तियोंने जन्मग्रहण किया है । शान्तिपुर में अईतकी प्रतिष्ठित को हुई एक कृष्णमूर्ति वर्तमान है, जिसे मदनगोपाल कहते हैं । आज भी मदनगोपालके रासमें विलक्षण आनन्द हुआ करता है ।

अद्वैतवाद (सं० पु० ) ब्रह्मसे सकल जगत्के उत्पन्न होनेका मत, जिसमें संसार असार माना गया है।
श्रई तवादिन् (सं० त्रि० )अद्वैत अभेदं वदतीति, वदु-णिनि । ब्रह्मवादी, एकात्मवादी ।
अद्वैसिद्धि (सं० पु० ) अद्वैतस्य विश्वस्य ब्रह्मा- भेदस्य सिद्धिर्यत्र ।१ अद्वैतसिद्धि नामक वेदान्त प्रकरण विशेष । (स्त्री० ) २ अद्वैत विषयकी सिद्धि ।
अद्वैतानन्द - भूमानन्द सरखतीके शिष्य । यह शङ्करा- चार्य विरचित ब्रह्मविद्याभरण नामक ग्रन्थ के टीका- कार थे ।
अद्वैतोपनिषत् - आत्मतत्त्व विषयक एक उपनिषत् । इसमें जीवात्मा और परमात्माका अभेद विषय लिखित है ।

{{Outdent| अध (वै० अव्य० ) १ अब, सम्प्रति । अतएव, इसलिये । ३ अलावा, सिवा । ५ और । ६ अनन्तर, पीछे । {{Outdent| अधअध ( सं० श्रव्यं ० ) {{Outdent|अवंतरी (हिं० स्त्री० )

अधः, अधःकर

(सं० पु० ) अध:करण (सं० क्लो० ) न्यूनकरण । २ सुतरां ४ कुछ कुछ । ७ आगे, पहले । २ कुछ-कुछ ।

१ और । एकतरहकी कसरत, जो मलखम्भपर की जाती है । अधस् देखो ।

हाथ के नोचेका भाग । अप्राधान्य बनानेका काम,

अधःकाय (सं० पु० ) अधः अधरं कायस्थ, एकदेशि - समासः । नाभिका अधः प्रदेश, कमर से नीचेका शरीर ।
अध:कार (सं० पु० ) न्यून करनेका काम, तिरस्कार, अधरीकरण ।
अधः कुन्तल (सं० पु० ) नीचेके बाल ।
अधः कृत (सं० ति० ) नीचे रखा गया, डाला गया।
अधः कृष्णाजिनम् (स० अव्य० ) काले चमड़े के नीचे ।