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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३५२

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अधःक्षिप्त - अधःस्थित
अधः क्षिप्त (सं० त्रि० ) अधोमुखेन क्षिप्तम्, चिप- त; शाक ०-तत् । नीचे लटका हुआ, नीचे पड़ा हुआ ।
अधःखनन ( सं० क्लो० ) सुरङ्ग, नोचेका खोदना ।
अधःपतन ( सं० क्लो० ) १ अधोगति, नीचेका गिरना । २ अवनति, तनज्जुली। ३ दुर्दशा, परेशानी ।
अधःपद्म (सं० क्लो० ) गुम्बदका कमल - जैसा हिस्सा ।

( वास्तुशास्त्र )

अधःपात ( सं० क्लो० ) अधोगति, दुर्दशा ; तनज्जुली, ज्वाल ।
अधःपातन(सं० क्लो० ) पारिको यन्त्रमार्ग से नीचेका गिराना । यथा, -

“नवनीताह्वयगन्धकं सूतञ्च समभागं गृहीत्वा जम्बीररसेन मर्दथित्वा, शुकशिम्बीमूल' शिशुमूलापामा श्वेतसर्ष पसैन्धवकल केन समभागेन संमिश्रा यन्त्रस्योध्व भाण्डाभ्यन्तरतले कल्कमिश्रितं तं सूतं लेपयेत् । श्रथ जलयुक्तमधो- भाण्डं भुवि पूरयित्वा तस्य मुखे रसयुक्त' भाण्डमधोमुखं संस्थाप्य च द्वयोः सन्धिमुखं लेपयेत् । अथ उपदिष्टात् पुटे दत्ते पारदो जले पतति । इत्यधः पातनम् । ” ( र० स० सं० )

अध:पुट (सं० पु० ) चारोली वृक्ष ।
अधःपुष्पी (सं० स्त्री० )अधोमुखं पुष्पं यस्याः, बहुव्री० ।१ गोजिह्वा, गोभी । २ अमरपुष्पिका,सौंफ ।
अधःप्रवाह (सं० पु०) नोचेको ओर बहनेवाली धारा ।
अधः प्रस्तर (सं० पु० ) टण-निर्मित आसन, जिस पर अशौचवाले बैठते हैं, तृणासन ।
अधःप्राणशायिन् ( सं० त्रि०) पूर्व की ओर भूमिपर सोनेवाला ।
अधःशय (सं० वि० ) ज़मीनपर सोनेवाला ।
अधः शयन ( सं० क्ली ० ) भूमिपर शयन, जमीनका सोना ।
अधःशय्या ( सं॰ स्त्री॰ ) अधोवर्त्तिनी भूमि निहिता शय्या । खट्टादि-वर्जित शय्या, भूमिशय्या ।
अधःशल्य ( सं० पु० ) अपामार्गक्षुप, लटजीरा, Achyranthes aspera.. यह झाड़ी तीन-चार फुट ऊंची होती और भारतमें तीन हज़ार फुट ऊंचेपर सब जगह मिलती है। बागमें इससे बड़ी अड़चन पड़ जाती है। इसकी शाखा सीधी रहती है,

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जिसमें धागे जैसी धारियां होती हैं। पत्ती अण्डे - जैसी चपटी और नोकदार, आधार में त्रिकोणाकार, छोटे डण्ठलवाली और बालदार रहती है । वृक्षका भस्म रंगने के काम आता है । यह सम्पूर्ण वृक्ष पेशाबावर और बलवर्द्धक है । बल बढ़ानेके विषय में तो कुछ निश्चय नहीं, किन्तु पेशाबमें खुन गिरने और संग्रहणीपर भारतीय वैद्य इसे सफलतापूर्वक व्यवहार करते हैं । इस वृक्षका काढ़ा रेचक होता और रक्तस्रावको लाभ पहुंचाता है : इसे दूसरे औषधीके साथ मिला जलीदार और शोथपर भी प्रयोग करते हैं । यह रेचक और कटु है और जलोदर, बवासीर, फोड़े और चर्मशोथके रोगोको लाभ पहुंचाता है। इसके वीज और पत्र वमनोत्पादक होते और कोई ज़हरीली चीज़ खा जाने और सांप काटने - पर उपकार दिखाते हैं । पेटमें दर्द होनेसे बच्चोंको इस वृक्ष का भस्म दिया जाता और सोजाक में बलल दिके काम आता है । इसकी फूली हुई डाल घर में रखनेसे बिच्छू भागते हैं। किसी ज़हरौले कोड़ेके काटने पर इसका लेप भी चढ़ता है । इसके भस्मसे पोटाश - एक प्रकारका चार खुब निकलता, जिससे यह रङ्ग और दवा दोनोमें लग सकता है। हड़ताल के साथ मिलाकर इसे नासूर और फोड़ेपर लगाते हैं । तिलके तेल में इसका भस्म डालकर कर्णवेदना होनेपर कानमें छोड़ा जाता है । पश्चिम-भारतमें इसका रस दांतमें दर्द होनेसे डाल और कासश्वासमें इसकी सूखी पत्ती चिलमपर रखकर पीते हैं। कहते हैं, कि इसके वीजकी खीर खानेसे भूख मर जाती है ।

अधःशाख (सं० पु० ) संसाराखत्थवृक्ष ।
अधः शिरस् (सं० त्रि०) १ नीचेको शिर झुका हुए । २ नरक - विशेष, एक नरकका नाम ।
अधः शेखर (सं० पु० ) श्वेत अपामार्ग, सफेद लटजीरा ।
अधःस्थ ( सं० त्रि०) नीचे रखा हुआ, छोटा,हकीर ।
अधः स्थित ( सं० त्रि०) नीचे खड़ा हुआ, नीचे जामा हुआ ।