छुच्छुन्दरिः शुभान् गन्धान् पत्रशाकन्तु वर्हिणः। मनुसंहिता ११ अध्याय। ब्रह्महत्याके लिये महापातकी पहले शत-शत वत्सर नरकभोग करते हैं। नरक भोगके बाद जन्मकी बात इसतरह लिखी गई है,— 'ब्रह्महत्याकारी कुत्ते, सूअर, गधे, ऊंट, भैंस, बकरे, भेड़े, मृग, पक्षी, चण्डाल और निषादसे ले शूद्राजात पुक्कश तककी योनिमें जन्मग्रहण करते हैं। (पापकी मात्राके अनुसार क्रमसे सभी योनियोंमें जन्म हो सकता है।)। ब्राह्मण सुरापान करनेसे कृमि, कीट, पतङ्ग, विष्ठाभक्षक पक्षी और (व्याघ्रादि) हिंस्रक प्राणीकी योनिमें उत्पन्न होता है। ब्राह्मण यदि चोर हुआ, (कुल्लूकभट्टके मतसे सोना चुराया) तो मकड़े, सांप, कुकलास, जलचर पक्षी, कुम्भीरादि और पिशाचादिकी योनिमें जन्म लेता है। गुरुपत्नीसे गमन-करनेपर तृण, गुल्म, लता, कच्चा मांसखा-नेवाले पशुपक्षी, दन्तशाली सिंहादि और क्रूरकर्मशील व्याघ्रादिकी योनिमें शतबार जन्म लेना पड़ता है। जो जीवहिंसा करता, वह कच्चामांस खानेवाला जन्तु होता है। अभक्ष्य द्रव्यको भोजन करनेवाला कृमि योनिमें उत्पन्न होता है। चोर (कुल्लूकभट्टके मतसे चोर जो महापातकी नहीं) परस्परके मांसभक्षक बन जन्मते हैं। चण्डालादि अन्त्यज जातिकी स्त्रीसे गमन करनेपर प्रेतयोनि प्राप्त होती है। (प्रेताख्य प्राणिविशेष, कुल्लूकभट्ट)। पतित व्यक्तिका संसर्ग रहने, परस्त्रीगमन करने और ब्राह्मणका धन (सुवर्ण भिन्न) चुरानेसे ब्रह्मराक्षस बनना पड़ता है। जो मनुष्य लोभवशतः मणि, मुक्ता, प्रबाल और रत्नको अपहरण करता, वह सुवर्णकार होता है (कोई-कोई कहते हैं, कि वह हेमकार पक्षियोनिमें जन्मग्रहण करता है)। धान चुरानेसे मनुष्य इन्दुर हो जाता है। जो कांसे- |
की चोरी करता, उसे हंस बनना पड़ता है। जलका चोर प्लव नामक पक्षीकी योनिमें जन्म लेता है। मधु चुरानेवाला डांस होगा। दूधके तस्करको काककी योनिमें जन्म दिया जाता है। तैलादि रसको अपहरण करनेसे कुत्ता बनना पड़ता है। घृतका चोर नेवला होगा। मांस चुरानेवाला गृध्रकीयोनिमें जन्म लेगा। जो चर्बीकी चोरी करता, उसे मछलीकी योनिमें उत्पन्न होना पड़ता है। तेल चुरानेवाला पतङ्ग बनेगा। लवणको अपहरण करनेसे चीरीवाक कीट बनना पड़ता है। दधि चुरानेवाला क्षुद्र वक पक्षी होता है। कौषय वस्त्र चुरानेसे तितली होना पड़ेगा। क्षौमवस्त्रका तस्कर भेक बनेगा। कार्पास वस्त्रकी चोरी करनेसे मनुष्य क्रौञ्च पक्षी होता है। मवेशी चुरानेवाला गोधेकी योनिमें जन्म लेता है। गुड़ चुरानेसे चिमगादड़ होना होगा। सुगन्धि द्रव्य चुरानेवाला छछूंदरका जन्म धारण करता है। पत्रशाकादि चुरानेसे मयूर होगा। सिद्धान्नको हरण करनेवाला श्वावित् और अपक्कान्नको हरण करनेवाला शल्धक बनता है। आग चुरानेसे मनुष्य वककी योनिमें जन्म गृहका उपकरण द्रव्य चुरानेवाला मृत्तिकादि द्वारा गृहनिर्माणकारी पक्षवान् कोट बनता है। जो रक्तवस्त्र चुराता, वह चकोर पक्षी होता है। मृग-हस्ती चुरानेसे लकड़बग्घेकी योनिमें जन्म मिलता है। घोड़ा चुरानेवाला व्याघ्र होगा। फलमूलका चोर मर्कटका जन्म पाता है। स्त्रीकी चोरी करनेसे भालुकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। जलका चोर चातक पक्षी होगा। यानकी हरण करनेवाला ऊंट बनता है। अन्यान्य पशु चुरानेसे अजकी योनिमें जन्म मिलता है।
जान पड़ता है, कि जो जन्तु जो-जो द्रव्य खाकर प्राणधारण करता, अनेकस्थलमें तद्रूप द्रव्य को हरण करनेसे मनुष्य उसी प्रकारके किसी जन्तुकी योनिमें उत्पन्न होता है। ऋषियोंने पापवाले फलभोगके लिये इसी नियमसे व्यवस्था की है। अनेकस्थलमें फिर यह नियमसे नहीं भी है। शरीरके कर्ण, वास- |
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