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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३६१

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अधश्चौर—अधस्
'किन्तु सेंधका गड्डा भी तो कई तरहका होता है,—कमल के फूल-जैसा, सूर्य-जैसा, अर्द्धचन्द्राकार, दीर्घाकार, स्वस्तिक-जैसा और पूर्णकुम्भ-जैसा। अब मैं किस जगह अपना हुनर दिखाऊं, जिसे कल शहरके लोग देखकर अचम्भ में पड़ जायें। इस ईंटके पक्के मकान में पूर्ण कुम्भाकार—पानी भरे घड़े-जैसा गड्डा ही अच्छा लगेगा। इसलिये मुझे वैसा ही गड्डा बनाना चाहिये।

'वरदाता कुमार कार्तिकेयको नमस्कार है। कनकशक्तिको नमस्कार है। ब्रह्मण्यदेव देवव्रत, भास्करनन्दी और योगाचार्यको नमस्कार है। मैं उनका पहला शिष्य हूं। उन्होंने तुष्ट होकर मुझे गोरोचना दी है। इसे शरीर में लगानेसे नगररक्षक मुझे देख न सकेगा और शरीरपर हथियार चलनेसे चोट न लगेगी। यह बात कहकर शर्विलकने शरीरमें गोरोचना लगा ली। इसके बाद उसने कहा,—अरे! सेंध नापनेका गज़ तो मैं भूल आया। फिर कुछ सोच-समझकर वह बोल उठा,—गज़ न सही, अपने इस जनेऊसे नाप लेनेपर ही काम चल जायेगा। ब्राह्मणका जनेऊ बड़े ही कामकी चीज़ है। विशेषतः मेरे-जैसे ब्राह्मणको इससे कितना ही काम पड़ जाता है। इससे सेंधका गड्ढा नपता; गहना उतरता, दरवाज़ा मज़बूती से बन्द रहनेपर किवाड़ा खुल जाता और सांप या बिच्छूके डङ्क मारनेपर गांठ बंधती है।

'इसके बाद उसने सेंधकी जगह नाप काम शुरू कर दिया। गड्ढे को गहराकर वह बोला,—'एक ईंट और बाक़ी है, जिसके निकलते ही सेंध फूट जायेगी। अरे यह क्या! क्या सांपने काट खाया?' तब उसने जनेऊसे उंगली बांधी, किन्तु विषसे शरीर भभक उठा। इसके बाद चिकित्सा से चङ्गा होकर उसने सेंध फोड़ी। भीतर जाकर देखा, कि दिया जलता था। अन्तमें गड्ढेकी चौड़ाकर सोचने लगा,—'अब तो भीतर घुस जाऊं। नहीं, एकबारगी ही घुस जाना अच्छा नहीं, पहले एक पुतलेको घुसेड़कर देखूं। कोई तो नहीं। कार्तिकेयको

नमस्कार करता हूं। घरमें दो आदमी सोरहे हैं। आदमियोंको सोने दो, पहले अपने बचाव के लिये दरवाजा खोल लूं। दरवाज़ा पुराना हो गया, किवाड़से आवाज़ आती है! कहीं से थोड़ासा पानी ढूंढ लाऊं! पानीसे सावधान होकर किवाड़ आर्द्र करूं। पीछे मट्टी गिरनेसे आवाज़ आती है, पीठके सहारे कीवाड़ खोल लूं। जो ही, अब देखना चाहिये, कि ये दोनो असलमें सोते हैं या नहीं; भय दिखानेसे मालूम हुआ, कि असलमें सो रहे हैं। इनकी हलकी सांससे नहीं जान पड़ता कि इन्हें भय लगा है। क्योंकि ख़ूब साफ़ और रह-रहके सांस चलती है, आंखें अच्छी तरह मुंद गई हैं और पुतलियां भी घूमते नहीं देख पड़तीं; शरीर के जोड़ ढीले पड़े और हाथ-पैर बिस्तर से बाहर लटके हैं। असलमें न सोने से आंखपर कभी दियेकी रोशनी नहीं सही जाती।'

मृच्छकटिक अति प्राचीन पुस्तक है। शर्विलककी कथा सुननेसे जान पड़ता है, कि पूर्वकालमें इस देशके चोर अपना व्यवसाय बहुत अच्छी तरह समझते-बूझते थे। एक ग्राम्य गल्प प्रचलित है, कि आकाशसे जो वज्र गिरता, वह केले या सार नामक वृक्षमें लगनेसे फिर निकल नहीं सकता, फंस जाता है। सेंध मारनेवाले चोर उसी वज्रके लोहेसे अपना खन्ता बनवाते हैं। यह ठीक नहीं कहा जा सकता, कि इस गल्पकी उत्पत्ति कैसे हुई है। लोहारकी दुकान के पास एक जंगला रहता है। कहते हैं, कि शायद सेंध लगानेवाले चोर उसी जंगलेमें रातको लोहा और मज़दूरीका दाम फेंक जाते हैं। लोहार इशारेसे समझ सकता, कि किस चोरको खन्तेकी ज़रूरत पड़ी है। वह चुपके से एक खन्ता बना उसी जंगलेमें रख देता है। सेंध फोड़नेवाले चोर रातको आ अपना हथियार ले जाते हैं।

अधश्शिरस् (सं॰ क्ली॰) अधः अधोवर्ति शिरः मस्तकं यस्य। अवाङ्मस्तक, मुंह लटकाये हुए आदमी।

अधस् (सं॰ अव्य॰) अधर-असि। पूर्वाधरावराणामसि