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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३८२

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अध्यापक—अध्यासन
अध्यापक (सं० पु० ) अधि- इङ्-णिच्ख ल्, अध्या-पयतोति । आचार्य, उपाध्याय, शिक्षक, उस्ताद, मुअल्लिम ; जो किसोको पढ़ाये । विष्णुका वचन है, कि जो वेदादि अध्ययन कराते, वह आचार्य और जो वेतनादि ले शिक्षा देते, वह उपाध्याय कहा हैं । (स्त्री) अध्यापिका।

अध्यापक (हिं० स्त्री०) आचार्यता, उपाध्यायो, उस्तादी, मुअल्लमी।

अध्यापन (सं० क्लो० ) अधि-इङ -णिच्- ल्युट् भावे । पाठन, शिक्षादान ; अध्ययनका कराना, किताबका पढ़ाना। अध्यापन तीन प्रकारसे होता है, – १ धर्मके कारण, २ अर्थके कारण और ३ शुश्रूषा के कारण। ( स्त्री० ) अध्यापना।

अध्यापयिट (सं० पु० ) शिक्षक, उस्ताद, पढ़ानेवाला।

अध्यापित (स० वि० ) लिखा या पढ़ाया, तालोम दिया हुआ।

अध्याय (सं० त्रि०) अधि-इङ - णिच् यत् कर्मणि। पाठनीय, अध्यापनयोग्य; पढाने या तालीम देने काबिल।

अध्याय (सं० पु० ) अधि-इङ-घञ् ।अध्यायन्यायो- द्यावस' हाराश्च । पाश३ १२२। १ अध्ययन, तालीम । २ ग्रन्थ- विभाग, मुकालह | ३ पाठ लेने योग्य समय, तालीम पाने काबिल वक्त. । इस शब्द के यह पर्याय हैं, – सर्ग, वर्ग, परिच्छेद, उदघात, अङ्क, संग्रह, उच्छास, परिवर्त, पटल, काण्ड, स्थान, प्रकरण, पर्व, आह्निक, स्कन्द, स्तवक, उल्लास, पाद, उद्योत् और विरचन।

`अध्यायशतपाठ (सं० पु० ) १ शत अध्यायका सूची पत्त्र, मौ मुकालहको फेहरिस्त। २ ग्रन्थविशेष।

अध्यायिन् (सं० त्रि०) पठनशील, पढ़ता हुआ, जो तालीममें लगा हो।

अध्यारूढ़ (सं० त्रि० ) अधि आ रुह त कर्मणि कर्तरि वा । १ समारूढ़, चढ़ा हुआ । २ आक्रान्त, ऊंचा, बड़ा । ३ तुच्छ, हकौर । ४ अधिक, अतिशय ; हद से ज्यादा ।

अध्यारोप (सं० पु० ) अधि-आ-रुह - णिच् पादेशः घस्।

रुहः पोऽन्यतरस्याम् पा १२२४३ १ चढ़ना,ऊपरका पहुंचना | २ आरोप, लगाव | ३ मिथ्याज्ञान, झूठो समझ । रज्जु में सपको भ्रमसे देखना और सच्चिदानन्द परमेश्वरमें जड़धमं लगाना आदि विषय अध्या-

रोपके हैं।

अध्यारोपण (सं० क्लो० ) अधि आ रुह णिच् पादेशः ल्य ुट् । १ धान्यादिका वपन, अनाज वर्गरहको बोआई। २ अतिशय आरोपण, हृढ़से ज्यादा लगाव।

अध्यारोपित (सं० त्रि०) १ मिथ्याकल्पित, गुलत समझा हुआ। २ धोखे या मुबालगेका।

अध्यावाप (सं० पु० ) अधि आ वप घञ्। १ बौनी, शस्य या अनाजका बोना । २ शस्य बोनेका क्षेत्र, बोन डालनेका खेत।

अध्यावाहनिक (सं० क्लो० ) अधि-आ-वह- णिच्-लुट् ; अध्यावाहनं पिटग्टहात् भग्टहागमनं तत्काले लब्ध' अस्मात्, लब्धायें ठन् । स्त्रीधनविशेष।

“यत् पुनर्लभते नारी नीयमाना हि पैटकात् ।
श्रध्यावाहनिकं नाम तत् स्त्रीधनमुदाहृतम् ॥” ( दायभाग )

'पिताके घरसे चलते समय स्त्रियां पुनर्वार जो धन पातीं, वही अध्यावाहनिक कहाता है।'

अधवास (सं० पु० ) अधि- अस क्षेपे घञ । १ आरोप, लगाव । २ मिथ्याज्ञान, झूठा इल्म । शङ्कराचार्यका वचन है, कि पहले कोई वस्तु देखनेसे हृदयमें उसके रूपादिका एक संस्कार जम जाता है; पोछे वैसी हो कोई दूसरी वस्तु देखनेसे रूपादि विषयमें किञ्चित् सादृश्यके कारण वह पहली हो वस्तु जैसी समझ पड़ती है । जैसे,—कोई व्यक्ति यदि पहले सर्प देखता, तो सर्पके अवयव - सम्बन्धपर उसके हृदयमें एक धारणा जम जाती है; पीछे हठात् रज्जु, देखने से उसी सर्पका आकार उसके हृदयमें दौड़ पड़ता है। उस समय रज्जु सर्प दिखाई देती और उसी मिथ्याज्ञानको अधग्रास कहते हैं।

अध्यासन (सं० क्लो० ) अधि-आस वासे उपवेशने वा-लुट । १ निवास, रहन। २ अधिष्ठान, बैठक। ३ अधिरोहण, चढ़ाव ।