सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४०६

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
३९९
अनन्ता-अनन्यज
अनन्ता (सं॰ स्त्री॰) नास्ति अन्तः सीमा यस्याः, बहुव्री॰। १ विशल्या ओषधि। २ अनन्तमूल। ३ दुरालभा, लटजीरा। ४ दूर्वा, दूब। ५ हरीतकी, ६ आमलकी, आंवला। ७ गुडूची, गुर्च। ८ अग्निमन्थ वृक्ष। ९ अग्निशिखा वृक्ष। १० श्यामा लता। ११ पिप्पल, पीपर। १२ यवास, जवासा। १३ पार्वती। १४ पृथिवी।
अनन्तात्मन् (सं॰ पु॰) परमेश्वर जिसका कोई अन्त नहीं।
अनन्तानन्द (सं॰ पु॰) अनन्ते विष्णौ आनन्दो यस्य। रामानन्दके बारह शिष्यों में एक शिष्य। भक्तमालामें इन बारह शिष्योंके नाम लिखे हैं,-१ रघुनाथ, २ अनन्तानन्द, ३ कुवेर, ४ सुखासुर, ५ जौव, ६ पद्मावत्, ७ पौपा, ८ भवानन्द, रुइदास, १० धन्य, ११ सेन और १२ सुरसुर।
अनन्त्य (सं॰ ली॰) अनन्तस्येदं यत्। १ हिरण्यगर्भ पद, ब्रह्मपद। (त्रि॰) २ असीम, बेहद। ३ सदाका, हमेशावाला।
अनन्द (सं॰ त्रि॰) न नन्दयति, न नन्दयति, नन्द-खिच्-अच्; नञ्-तत्। १ आनन्दजनक नहीं, जो खुश न करे। (वै॰ पु॰) २ किसी नरकका नाम।
अनन्न (वै॰ क्ली॰) न अन्नम्, नञ्-तत्। १ अभोजनीय, जो चीज, खाई न जाये। (त्रि॰) नास्ति अन्नं यस्य, बहुव्री॰। २ निरन्न, अन्नहीन; जिसके पास खानको अनाज न हो।
अनन्नास (हिं॰ पु॰) आनानास, एक तरहका फल। यह वृक्ष देखने में रामबांस-जैसा और प्रायः दो फीट तक ऊंचा होता है। मूलसे लगभग दो-तीन अङ्गुल ऊपर डण्ठलके पास अङ्गुरोंको ग्रन्थि पड़ती, जो धीरे-धीरे स्थूल और दीर्घ होते जाती है। इस ग्रन्थिमें रस भरा रहता है। खाते समय लोग पहले इसका बकला छील और आंख निकाल डालते हैं। स्वादमें यह खटमिट्टा होता और भुक्त अन्नको पचाकर हृदय शीतल करता है।
अनन्य (सं॰ त्रि॰) न अन्यः, नञ्-तत्। १ अन्धभिन्न, दूसरेसे अलग। कुमारसम्भवमें लिखा है,-

'अनन्धनारी कमनीयमङ्कम्।' मतलब यह, कि जिस क्रोड़की कामना भी अन्य नारी नहीं कर सकती। नास्ति अन्यो यस्य। २ जिसके दूसरा कोई नहीं, सबसे अलग। ३ उदासीन, नाखुश। ४ अनधीन, आज़ाद। ५ अपना। ६ एकसे अधिक नहीं। ७ समग्र, समूचा। ८ दूसरा प्रयोजन न रखनेवाला।

अनन्य-युक्तप्रदेशके एक कविका नाम। इनका जन्म सन् १७३३ ई० में हुआ था। इनके बनाये कितने ही वेदान्त और नीतिके पद लोगोंमें फैल गये हैं। इन्होंने चेतावनी भी लिखी थी। सम्भवतः यह वही कवि थे, जिन्हें शिवसिंहने अज्ञात समयका बताया था और जिन्होंने दुर्गाको स्तुति बनाई थी।
अनन्यगति (सं॰ स्त्री॰) १ पूर्ण स्रोत, पूरा ज़रिया। (त्रि॰) २ केवल एक स्रोत रखनेवाला, जिसके कोई दूसरा ज़रिया न हो।
अनन्यगतिक (सं॰ त्रि॰) नास्ति अन्या गतिर्यस्य, कप्। अन्य उपाय-रहित, दूसरा ज़रिया न रखनेवाला।
अनन्यगामिन् (सं॰ त्रि॰) दूसरेकी ओर न जानेवाला, जो गैरको तर्फ न झुके।
अनन्यगिरि-मन्द्राज प्रेसिडेन्सीके विजगापटम् जिलेका एक गांव। यह समुद्र-तलसे कोई ३१११ फीट ऊंचे गलीकोण्डाकी पहाड़ीपर बसा; जो विजयनगर और पञ्चीपेंता राज्यकी सीमा बनाती है। इस गांव में कोई ढाई हज़ार आदमी बसते और कहवेके बड़े-बड़े बाग़ लगे हैं।
अनन्यचिन्त, अनन्यचेतस् (सं॰ त्रि॰) अपना सम्पूर्ण ध्यान एक ही ओर लगा देनेवाला, जो अपना ख्याल एक ही बातपर जमा दे।
अनन्यचोदित (सं॰ त्रि॰) आप ही आप झुका, जो अपने मनसे किसी काममें लग जाये।
अनन्यज (सं॰ पु॰) नास्ति अन्यदयस्मात् सर्ववस्तूनां तदात्मकत्वात् अनन्यो विष्णुः तस्मात् जायते, जन-ड; ५-तत्-अथवा न अन्यस्मात् स्वयमेव वयोधर्मेण मनसि जायते। कामदेव, जो विषमुके पुत्र हैं या आप ही आप मनमें उत्पन्न हो जाते हैं। अमरकोषमें लिखा है,-'कुसुमेषुरनन्धनः।'

}}