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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४०७

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अनन्यता-अनन्याश्रित
अनन्यता (सं॰ स्त्री॰) अन्य होनेका अभाव, दूसरा न रहनेकी हालत; निरालापन, अनोखापन; एकनिष्ठा, एकाश्रयता।
अनन्यत्व (स॰ क्ली॰)अनन्यता देखो।
अनन्यदास-युक्तप्रदेश गोंडा जिलेके चकदवेवाले एक कविका नाम। शिवसिंह-सरोज नामक पुस्तकमें लिखा है, कि इन्होंने अनन्ययोग नामक एक ग्रन्थ बनाया था।
अनन्यदृष्टि (सं॰ त्रि॰) अन्य दृष्टि से न देखनेवाला, जो बराबर टकटकी बांधकर देखे।
अनन्यदेव (सं॰ पु॰) नास्ति अन्यद् यस्मात् सर्ववस्तूनां तदात्मकत्वात् तादृशो देवः। १ परमेश्वर जिनकी बराबर दूसरा कोई देवता नहीं। २ विष्णु।
अनन्यनिष्याद्य (सं॰ त्रि॰) अन्य द्वारा पूरण किये जानेको आवश्यकता न रखनेवाला, जो आप ही पूरा पड़ जाये।
अनन्यपूर्वा, अनन्यपूर्विका (स॰ स्त्री॰) न अन्यः पूर्वी यस्याः, बहुव्री॰। १ अन्यसे अभुक्त स्त्री, जिस स्त्रीके साथ पहले किसीने भोग नहीं किया। २ अविवाहिता बालिका, बिन व्याही लड़की। याज्ञवल्कसहितामें लिखा है,-


"अविप्नु तब्रह्मचर्यों लक्षण्यां स्त्रियमुबहत्।
अनन्धपूर्वि कां कान्तामसपिण्डां यवीयसौम्।" (२४२)

'ब्रह्मचर्यके बाद सुलक्षणा, अविवाहिता, मनोज्ञा, असपिण्डा और वयःकनिष्ठासे स्त्रीसे विवाह करना चाहिये।'

अनन्यप्रतीक्रिय (सं॰ त्रि॰) प्रतीकारका अन्य उपाय न रखनेवाला, जिसे रोकको दूसरी तदबीर न सूझे।
अनन्यभव (सं॰ त्रि॰) अन्यसे उत्पन्न न होनेवाला, जो आप ही आप पैदा हो।
अनन्यभाज (सं॰ त्रि॰) न अन्य अन्य भजते, भज-खि; उप॰ स॰। भजोखिः। पा ३२९ अन्य पुरुष या अना स्त्रीको सेवा न करनेवाला, जो दूसरे मर्द या दूसरी औरतकी खिदमत न करे,-


"अनन्यभाचं पतिमान हीति सातथ्यमेवाभिहिता भवेन।
नहीश्वरव्यातयः कदाचित् पुश्चन्ति लोके विपरीतमर्थम्॥"

(कुमारसम्भव, ३)

शिवका यह वर यथार्थ ही निकला-'ऐसे पतिको प्राप्त करो, जो किसी दूसरी स्त्रीको न भजे।' क्योंकि ईश्वरकी उक्ति कभी विपरीत अर्थ नहीं देती अर्थात् ईश्वरका वाक्य कभी निष्फल नहीं जाता।

अननाभाव (सं॰ त्रि॰) अन्य भाव न रखने अर्थात् केवल ईश्वरसे ध्यान लगानेवाला, जो दूसरा मतलब लिखा है, कि इन्होंने अनन्ययोग नामक एक ग्रन्थ न रखे, परमेश्वरमें ही ध्यान लगाये रहे।
अनन्यमनस्, अनन्यमनस्क, अनन्यसानस (सं॰ त्रि॰) सम्पूर्ण ध्यानको कार्यमें नियुक्त करनेवाला, जो अपना पूरा खयाल किसी बातपर जमा दे।
अनन्ययोग्य (सं॰ त्रि॰) अन्यके उपयुक्त नहीं, जो दूसरेके क़ाबिल न हो।
अनन्यविषय (सं॰ त्रि॰) अन्य विषयका नहीं, पूर्ण नियुक्तिके योग्य; जो पूरे तौरसे काममें लाया जो आप ही पूरा जा सके।
अनन्यविषयात्मन् (सं॰ त्रि॰) अना विषयके आत्माका नहीं, एक ही विषयपर आत्माको लगानेवाला; जो रूहको पूरे तौरपर किसी बातमें मशग़ूल करे।
अननावृत्ति (स॰ त्रि॰) न अन्या से विभिन्ना वृत्तिः मनोवृत्तिर्यस्य, बहुव्री॰। १ एक ही रूपसे मनोयुक्त, जिसका दिल दूसरी ओर न चले। नास्ति अन्या वृत्तिः जीवनोपायो यस्य। २ एकमात्र जीवनोपायविशिष्ट, जिसके गुज़रकी दूसरी तदबीर न लगे।
अननासाधारण (सं॰ त्रि॰) न अनास्य अनाधर्मस्य साधारण: सदृशः। अपना-जैसा दूसरा न रखनेवाला, सबसे निराला।
अननाहृत, (सं॰ त्रि॰) अनासे हृत नहीं, जिसे दूसरा न उठा ले जाये; सुरक्षित, महफ़ूज़।
अननग्रादृश (स॰ त्रि॰) अन्याके समान नहीं, एकाकी, जो दूसरे जैसा न देख पड़े, एकता।
अनन्यवर्थ (सं॰ त्रि॰) अन्य अर्थ न रखनेवाला,प्रधान; जो दूसरी चीज़से ताल्लुक न रखे, खास।
अनन्याश्रित (सं॰ त्रि॰) अन्यका आश्रित नहीं, स्वाधीन; जो दूसरेका सहारा न लेता हो, आज़ाद। अदालतमें अनन्याश्रित वह सम्पत्ति कहाती है, जिसमें कोई झगड़ा झञ्झट नहीं रहता।