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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४१५

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अनर्वन्-अनलवार
अनर्वन् (सं॰ त्रि॰) अर्द-हिंसायां क्वनिप्; न अर्वा, नञ्-तत्। शत्रु भिन्न, दुश्मन नहीं; जो वैरी न हो।
अनर्विश् (वै॰ त्रि॰) अनसा शकटेन विशति प्राप्नोति; विश-क्विप, ३-तत्। रोऽमुपि। पा ८।२।६९। १ शकट द्वारा काष्ठ लानेको वनमें फिरनेवाला, जो गाड़ी ले जङ्गलको लकड़ी बटोरने जाये। २ गन्तव्य स्थल में गमन करनेको असमर्थ, मनज़िले मक़सूदपर न पहुंच सकनेवाला। (पु॰) २ सारथी, गाड़ीबान।
अनर्शनि (वै॰ पु॰) दैत्यविशेष, एक राक्षसका नाम। इन्द्रदेवने इसे मार डाला था।
अनर्शराति (सं॰ त्रि॰) अर्शशब्दोऽश्लीलवाची। राते: क्तिन् इति रातिर्दानम्। अश्लीलविषया रातिर्दान' यस्य सोऽर्श रातिः पापकदानस्तविपरीतोऽनर्शरातिः। (इति निरुक्तटौकायां देवराज: १ अपापक दान देनेवाला, जिसकी दी हुई चीज़ तकलीफ़ न पहुंचाये। २ पापिष्ठ-भिन्न अन्य व्यक्तिको जो दान दे, सत्पात्रको देनेवाला; गुनहगार छोड़ दूसरे शख्शको बख्शनेवाला, जो भले आदमीको बख् शे।
अनर्ह (सं॰ त्रि॰) न अहः योग्यः, नञ्-तत्। १ दण्ड या पुरस्कारके अयोग्य, जो सजा या जज़ाके काबिल न हो। २ अपर्याप्त, अनुपयुक्त; कसीर, नाक़ाबिल; कम, भद्दा।
अनर्ह्यता (सं॰ स्त्री॰) १ विशुद्ध रीतिसे परिमाण न बांधे जानेको स्थिति, हालत जिसमें ठीक तौरसे अन्दाज़ न लगे। २ अपर्याप्तता, अनुपयुक्तता; कसर, नाक़ाबिलियत; कमी, भद्दापन।
अनल (सं॰ पु॰) नास्ति अलं पर्याप्तिः परिच्छेदो यस्य प्रभावात् नज-बहुव्री॰। १ अग्नि, वह्नि; आतिश, आग। २ शरीरका पित्तधातु, जिस्ममें रहने वाला सफरा।३ आठ वसुवोंमें पांचवें वसु ।४ कृत्तिका नक्षत्र। ५ वायु, हवा। ६ वासुदेव। ८ मुनिविशेष। ८ चित्रक, चीत। ९ भल्लातक, भिलावां । १० देवधान्य। ११ रकार अक्षर। १२ तीनकी गिनती। १३ वार्हस्पत्य षष्टिसंवत्सरका पन्द्रहवां वर्ष। १४ पितृ देवविशेष। १५ विष्णु। (क्ली॰) १६ नलका अभाव,

नलराजाकी नामौजूदगी। (त्रि॰) १७ गन्धशून्य, बेखुशबू। १८ अपर्याप्त, जो चुक गया हो।

अनलङ्करिष्णु (सं॰ त्रि॰) १ अलङ्कार पहननेका अभ्यास न रखनेवाला, जिसे जेवर पहननेकी आदत न हो। २ अलङ्कार-रहित, बेगहना।
अनलचूर्ण (सं॰ पु॰) बारूद, आगका मसाला।
अनलदीपन (सं॰ क्ली॰) अनलं जठरानलं पित्तधातुवर्धनेन दीपयति वर्धयति; दीप-णिच्-ल्युट्। जठरानलदीपक द्रव्य, अग्निबुद्धिकर; मुकब्बी मेदा, पेटको ताक़त देनेवाली चीज।
अनलनामा (सं॰ पु॰) चित्रक वृक्ष, चीत।
अनलपक्ष (सं॰ पु॰) पक्षिविशेष, एक तरहकी चिड़िया। लोग कहते हैं, कि यह सदैव आकाशमें उड़ते रहती और वहीं अण्डे भी देती; जो भूमिपर गिरनेसे पहले फूटता और बच्चा फड़फड़ाकर अपने पिता-माताकी छातीसे जा चिपटता है।
अनलपङ्घ (हिं॰) अनलपक्ष देखो।
अनलपङ्खचार (हिं॰ पु॰) हस्ती, हाथी।
अनलप्रभा (सं॰ स्त्री॰) अनलस्य प्रभा इव प्रभा यस्य, बहुव्री॰। ज्योतिष्मती लता, रत्नज्योति, रतनजोति।
अनलप्रिया (सं॰ स्त्री॰) अनलस्य प्रिया, ६-तत्। स्वाहानामक दक्षकन्या, अग्निकी पत्नी, विसर्ग। वर्णाभिधानमें कहा है,- "हिठः स्वाहानलप्रिया।" सिवा इसके राघवभट्टने भी लिखा है,-"हिठ: खाहा ठकारण लिपिमास्यादिन्दुरुच्यते। तस्य हित्व तेन विसर्ग: सच शक्तिरुपः तेन दिठशब्द नाग्निशक्तिः स्वाहा।" मतलब यह, कि हिठ और स्वाहा पर्याय शब्द हैं। ठकार देखनेमें विन्दु-जैसी होती है। उसे हित्व करने अर्थात् दो विन्दु लगानेसे ही विसर्ग बनता है। वह विसर्ग शक्तिका रूप है। इसलिये हिठ शब्द अग्निशक्ति स्वाहाको सुझाता है। अनलवत्-बम्बई प्रान्त के सूरत ज़िलेके शुक्लश्वरका मन्दिर। यह सङ्गेमूसासे बना है।
अनलवात (सं॰ पु॰) प्राचीन पटनेका नाम।
अनलवार (अनहल्वाड़)-गुजरातके एक प्राचीन नमरका नाम। आजकल यह वीरवल-पत्तनके नामसे प्रसिद्ध है। मुसलमानोंने इसका नहरवाल नाम लिखा है सन्