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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४१७

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अनलशिला-अनलेख

इनका वज़न पन्द्रह रत्तीसे साढ़े तीन सेर तक निकलता है। सन् १८३३ ई॰ में उत्तर-अमेरिकापर नौ घण्टे के बीचमें न्यूनाधिक दो लाख अस्सी हज़ार अग्निमय क्षुद्र पत्थर बरसे थे। नव हावेनके अध्यापक अम्सतेद इस विषयका वर्णन कर गये हैं, कि इस प्रकार नक्षत्रपात अनेक स्थलमें सामयिक घटना-जैसा देख पड़ता है। किसी किसी वत्सरके एक-एक निर्दिष्ट दिनमें प्रायः यह उत्पात उठा करता है। हम्बोल्टने स्थिर किया, कि ऐसा उपद्रव उठनेकी सम्भावना निम्नलिखित समयमें हो सकती है,-२२ वींसे २५ वीं अप्रेल, १७ वीं जुलाई; १०वीं अगस्त; १२ वींसे १४ वीं नवम्बर; २७ वींसे २९ वीं नवम्बर और ६ ठींसे १२ वीं दिसम्बर।

इस विषयमें अब कोई सन्देह नहीं, कि आकाश से यथार्थ हो अग्निशिलाको वृष्टि होती है। किन्तु यह अग्निशिला क्या है? कोई-कोई अनुमान करते कि यहांके आग्नेयपर्वतसे प्रस्तरखण्ड ऊपरकी ओर उड़ जाते हैं; उड़-उड़ाकर कुछ काल पृथिवीके साथ वह घूमते रहते हैं। उसके पीछे वह फिर इसी पृथिवीपर आ गिरते हैं। अन्य पक्षका मत दूसरी तरह है। उसके अनुसार जिस सकल उपादानसे अग्निशिला उठती, वह सकल उपादान आकाशमें बाष्यरूपसे अवस्थित रहता है। पीछे किसी कारणवशतः वह जमकर नीचे गिर पड़ता है। आजकल इन दो मतोंमें एकका भी आदर नहीं अड़ता। फिर एक पक्षके लोग यह सिद्धान्त साधते, कि चन्द्र के आग्नेय-गिरिसे पत्थर उड़कर पृथिवीपर आ पड़ते हैं। किन्तु अब उत्कृष्ट दूरवीक्षणकी सृष्टि हो गई है। उसके द्वारा चन्द्रलोक खूब स्पष्ट दिखाई देता है। चन्द्रमें जो आग्नयगिरि हैं, आजकल उन सबका निर्वाण हो गया है, किसीसे भी कोई अग्न्युत् पात नहीं उठता। आजकल अनेकोंने यह सिद्धान्त किया है, कि ग्रह-नक्षत्रके मध्य असंख्य पदार्थ पृथक् पृथक् पड़े हैं। उनके मध्य निरेट और बाष्यवत् पदार्थ भी पाये जा सकते हैं। यह सकल द्रव्य क्रमागत घूम-फिरकर चक्कर लगाया करते हैं। पीछे

किसी कारणवशत: यह प्रज्वलित हो पृथिवीपर गिर पड़ते हैं।

सन् १८८५ ई० को २७ वी० नवम्बरको कलकत्तेमें और शहरकी चारो ओर असंख्य नक्षत्रपात पड़ा था। तिथि कृष्णपक्षकी षष्ठी थी, चारो ओर अन्धकार आच्छन्न हो गया था। वैसे ही समय आकाशमें तोप-जैसी गड़गड़ाहट घहराने लगी। उसके बाद झड़-झड़ उल्काका पड़ना आरम्भ हुआ। हजारोंपर हजार, एक-एक बारमें ही लाखोंपर लाख,-किसको देखते, किसकी ओर ताकते; अनन्त आकाशमें असंख्य-असंख्य नक्षत्र निकल रहे थे। इस नक्षत्रपातको देख टिण्डल साहबने लिखा है, कि आकाशमें अनेक छोटे-छोटे ग्रह रहते हैं। वह पृथिवीकी तरह सूर्यको चारो ओर घूमते-फिरते हैं। यही कारण है, कि सूर्यका आकर्षण भी उन्हें ज़ोरसे करते खींचता है। इसलिये घूमते-घूमते अन्तमें वह सूर्य- मण्डलमें जा पहुंचते हैं। सूर्य आप ही तेजःपुञ्जधूमराशि है। इस सकल ग्रहादिके संघर्षसे उसका प्रकाश और सन्ताप उत्तम तौरपर रक्षित रहता है। किन्तु वह पृथिवीके किनारे पहुंच बाष्पके संघर्षसे जल जाते हैं। इसीको हमलोग नक्षत्रपात कहते हैं।

अनलस (सं॰ त्रि॰) आलस्यरहित; फुरतीला, जो सुस्ती न करे।
अनला (सं॰ स्त्री॰) १ दक्षप्रजापतिकी एक कन्या, जो कश्यप ऋषिको पत्नी रहीं। लोग इन्हें सकल अड़ता। फिर एक पक्षके लोग यह सिद्धान्त साधते, वृक्षोंकी माता बताते हैं। २ माल्यवान् राक्षसकी एक बेटी।
अनलायक, (हिं॰ वि॰) अयोग्य; बुरा, जो लियाक़त न रखे।
अनलि (सं॰ पु॰) अनिति-अन्-अच्; अनः अलिः भ्रमरो यत्र, शाक॰ बहुव्री॰। वकपुष्प-वृक्ष; अगस्त, (Sesbana grandiflora)। इस फलमें मधु अधिक भ्रमरोंके उसे पीकर प्राण पालनेसे इसका नाम अनलि पड़ा है।
अनलेख (हिं॰ वि॰) १ जो देख न पड़े। २ जिसका वर्णन लिखा न जा सके।