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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४१८

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अनल्प-अनवद्यत्व
अनल्प (सं॰ त्रि॰) न अल्पम्, नञ्-तत्। प्रचुर, अधिक; ज्यादा, बहुत; जो कम न हो।
अनल्पघोष (सं॰ त्रि॰) अधिक घोषविशिष्ट, अत्यन्त शब्दायमान; निहायत पुरशोर, बड़ी आवाज़का; जो आवाज़से बहुत भरा हो।
अनल्पमन्यु (सं॰ त्रि॰) अतिशय क्रुद्ध, निहायत गुस्सावर; जो बहुत नाराज़ हुआ हो।
अनवकाङ्क्षा (सं॰ स्त्री॰) अभिलाष-राहित्य, उत्कण्ठा-शून्यता; नामर्जी, बेचाही; इच्छा का न रहना। जैनसाधु जब मरनेके लिये न कुछ खातेपीते और न घबराते, तब उनमें अनवकाङ्क्षा विद्यमान रहती और उन्हें अनवकाक्ष्यमाण कहते हैं।
अनवकाश (स॰ पु॰) अभावार्थे नञ्-तत्। १ अवकाशका अभाव, फुरसतका न मिलना। (त्रि॰) नञ्-बहुव्री॰। २ अवकाशशून्य, बेफुरसत। ३ जो नियोगके योग्य न हो, नाकाम।
अनवकाशिक (सं॰ पु॰) साधु, जो एक पादसे दण्डायमान हो तपस्या करे।
अनवगाह (सं॰ त्रि॰) अवगाहरहित, अपार; अथाह, खूब गहरा; जिसे कोई तैर या पार न कर सके।
अनवगाहिता (सं॰ स्त्री॰) अवगाह-राहित्य, गहराई; न तैरता हुआ। २ जो पढ़ता न हो।
अनवगाहिन् (सं॰ त्रि॰) १ पार न जाता हुआ, न तैरता हुआ। जो पढ़ता न हो।
अनवगाह्य (सं॰ त्रि॰) अवगाहके अयोग्य, तैरनेके नाक़ाबिल; अथाह।
अनवगीत (सं॰ त्रि॰) न अव-गै कर्मणि क्त। अनंन्दित, खुशनाम; जिसकी बुराई ख़राब गीतोंमें न गायी गयी हो।
अनवग्रह (सं॰ त्रि॰) नास्ति अवग्रहः प्रतिबन्धो यस्य, न-बहुव्री। प्रतिबन्धशून्य, बेजब्त; जिसे कोई रोक न लगे। (पु॰) नञ्-तत्। २ वृष्टिप्रति बन्धाभाव, बारिशकी रोकका न रहना।
अनवग्लापत् (वै॰ त्रि॰) आलस्यरहित होता हुआ, जो सुस्ती न कर रहा हो।
अनवच्छिन्न (सं॰ त्रि॰) १ अवच्छिन्नतारहित, जो

जुदा न हो। २ चिह्नशून्य, सीमाविहीन, अनियमित; बेनिशान, हद न बांधा गया, बेमौताज। ३ व्याख्यारहित, बेबयान।

अनवच्छिन्नसंख्या (सं॰ स्त्री॰) अखण्ड राशि, कामिल अदद; जो गिनती कटी-फटी न हो।
अनवच्छिन्नहास (सं॰ पु॰) निरत अथवा अयोग्य गुस्सावर; जो बहुत नाराज हुआ हो। हास, लगातार या बेहूदा हंसी।
अनवट, अनोटा (हिं॰ पु॰) १ पादके अङ्गुष्ठ में धारण की जानेवाली मुद्रिका, छल्ला जो औरतें पैरके अंगूठेमें पहनती हैं। २ ढोका, ढक्कन जो कोल्हू के बैलकी आंखपर बांधते हैं।
अनवत् (सं॰ त्रि॰) श्वास अथवा जीवन सम्पन्न, जिसकी सांस चलती या जो जीता हो।
अनवत्त्व (सं॰ क्ली॰) जीवनसम्पन्न होनेकी स्थिति, ज़िन्दगी कायम रहनेकी हालत।
अनवतप्त (सं॰ पु॰) १ जैन मतानुसार एक सर्पराजका नाम। २ एक हदका नाम, रावणड्रद।
अनवती-बम्बई-उत्तर कनाड़ाके एक स्थानका नाम। यहां कैटभेश्वरका एक सुन्दर मन्दिर बना, जिसके प्रधान मण्डपमें सोलह और आड़की दीवारपर बाईस स्तम्भ खड़े हैं। इस मन्दिरमें कितनी ही बातें इधर-उधर पार न पाने या तैर न सकनकी हालत। लिखी मिलती हैं,-१ कैटभेश्वरके मन्दिरमें देवमूर्तिसे दाहने शक ११५२ (बी); २ मन्दिरके मध्यरङ्गमें एक स्तम्भपर शक ११६३ (बी); ३ दूसरे स्तम्भपर ११६३ (बी); ४ फिर दूसरे स्तम्भपर शक ११७१ (बी); ५-६ मध्यरङ्गके किनारे दो शक, जिनमें एक शक ९९२ है; ७ सामनेकी ओर एक ८ सामनेवाले पार्वती-मन्दिरके बड़े लट्टे पर दूसरा शक खुदा है।
अनवद्य (सं॰ त्रि॰) म अवद्य निन्दयम्, नञ्-तत्।

अवधपण्यवर्या गर्दा पणितव्यानिरोधेषु। पा ३।१।१०१ १ निन्दाभिन्न, दोषशून्य; खुशनाम, बेऐब; जिसकी कोई

बुराई न करे। २ प्रशस्य, इष्ट; बेउज्र, जिसमें कोई बखेड़ा न हो।
अनवद्यता (सं॰ स्त्री॰) दोषराहित्य, बेऐबी।
अनवद्यत्व (सं॰ क्ली॰) अनवद्यता देखो।