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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४२२

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अनवेक्षा-अनशन
अनवेक्षा (सं॰ स्त्री॰) न अवेक्षा अपेक्षा, नञ्-तत्। अपेक्षाभाव, बेगौरी; ध्यान लगानेकी हालत।
अनव्रत (सं॰ त्रि॰) १ साधुकर्मसम्पन्न, जो फ़क़ीरी लटकेसे ख़ाली न हो। (पु॰) कर्मरत जैन साधु, जो जैनी फ़क़ीर अपना काम करता रहे।
अनशन (सं॰ क्ली॰) न-अश-लुपट, नञ्-तत्। १ भोजनका अभाव, ग़िज़ाका न मिलना। २ उपवास। ३ लङ्घन, फ़ाक़ा। ४ भोजन-निवृत्ति-रूप व्रत विशेष, ख़ास व्रत जिसमें खाना नहीं खाते। इस व्रतमें रात दिन कुछ खाया नहीं जाता। अनशनव्रत एक दिन, दो दिन, तीन दिन, सात दिन, नौ दिन या एक मासतक चलता है। दूसरे प्राणपरित्यागकी इच्छासे जबतक प्राण न निकले, तबतक अनशन व्रत रहता है,-


"अनशनं मासमेकन्तु महापातकनाशनम्।
नेहनामुभिकं पापं कृतेनानेन तिष्ठति॥" (जावाल)

'एक मास अनशनव्रत करनेसे महापातक नष्ट होता है। इसलिये यह व्रत रखनेसे इहकाल और परकालका पाप छूट जाता है।' "प्रायश्चानशने मृत्यौ" इति विश्वः। प्रायस् शब्दसे अनाहारमें प्राणत्यागका अर्थ निकलता है।


"समासक्तो भवेद्यस्तु पातकैर्महदादिभिः।
दुश्चिकित्समहारोगै: पीड़ितो वा भवेत्तु यः॥
स्वयं देहविनाशस्य काले प्राप्त महामतिः।
अब्राह्मणं वा स्वर्गादि महाफलजिगीषया॥
प्रविशेज्ज्वलनं दीप्तं कुर्यादनशनं तथा।
एतेषामधिकारोऽस्ति नान्येषां सर्वजन्तुषु॥
नराणामथ नारीणां सर्ववणेंषु सर्वदा॥" (पुराणवचनम्)

'जो महापातकग्रस्त या असाध्य रोगसे पीड़ित हो, वह महामति व्यक्ति अपने विनाशका काल प्राप्त होनेपर ब्रह्मलोक या स्वर्गादि महाफलकी कामना कर प्रज्वलित अग्निमें बैठे या अनशनव्रतको अवलम्बन करे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-इन्हीं चार वर्णके पुरुष और स्त्रीको इसमें अधिकार है। अन्य प्राणीको इसे करनेका निषध देते हैं।'

(त्रि॰) नास्ति अशनं यस्य, नञ् बहुव्री॰।

५ भोजनशून्य, ग़िज़ासे खाली; जिसने खाना छोड़ दिया हो। यह भली भांति स्थिर नहीं हुआ, कि एकबारगी ही निर्जल उपवास करनेसे कितने दिनमें मृत्यु होती है। सालिखेके श्यामाचरण बाबूने काशीमें पहुंच अनशनव्रत किया था। अठारह दिन पीछे उनकी मृत्यु हो गयी। किन्तु सुस्थ शरीरसे उपवास करनेपर बारह दिनसे एक मासतक मनुष्य जी सकता है। किन्तु जो स्वभावतः अधिक भोजन, अधिक कायिक परिश्रम करता और नित्य मद्य-मांस खाता है, उसके पक्षमें यह नियम नहीं लगता। वह क्षुधाको नहीं सह सकता, अल्प उपवास करते हो अवसन्न हो जाता है। चित्तोड़का दुर्ग जीतते समय विलायती गोरे और हमारे देश मिपाही दोनो लड़ रहे थे। एकाएक खाद्य ट्रव्यका अतिशय अभाव होजानेपर, क्षुधासे जठराग्नि धांय-धांय जलने और गोरोंको जगत् अन्धकारमय दिखाई देने लगा। किन्तु हमारे देशके सिपाही उतने कातर न हुए। जो सामान्य चावल रहा, उसे पका सिपाही आप तो मांड खाते और सब भात गोरोंको दे देते थे। उसपर भी गोरे भूखसे कोई काम न कर सके। किन्तु सिपाहियोंने केवल मांडके सहारे तुमुल संग्राम संभाला था।

जो निरामिषभोजी, एकाहारी और प्रतिदिन यथानियम प्राणायाम करता है, उसकी मृत्यु अनशनसे शीघ्र नहीं होती। ऐसे-ऐसे अनेक योगी सन्यासी हैं, जो दिनान्तमें केवल आध सेर दुग्ध पीते हैं। बांकीपुरमें एक योगी रहे, जिनका पथ्य दूर्वातृण होता था। वह नवीन दूर्वा पीस और खाकर प्राण पालते थे। मतलब यह, कि प्राणायामसे योगनिद्राका आविर्भाव होता है। उस क्षण कच्छप और सर्पादिवाली शीतनिद्राकी तरह योगमें रहकर सो सकनेसे क्षुधाका उद्रेक नहीं उठता। साधु हरिदास खास और आहार रोक दश मास मट्टीमें गड़े रहे थे। उसे देख डाक्टर मेकग्रेगरने कहा,- "इस देशके लोग सहजमें उपवास और प्राणायाम पालनेसे ऐसे अद्भुत कार्य कर सकते हैं।" जो हो; यह बात ठीक नहीं बता