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अनाचारिन्-अनाथ
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कर्मका न करना, २ धर्मशास्त्रके बताये कर्मसे विरुद्ध चलना। अनाचारिन् (सं॰ त्रि॰) १ कदाचार, बदचलन, ख़राब चालचलनवाला। २ रीति, नीति याव्यवहार पर ध्यान न देनेवाला। ३ दुष्ट, बदज़ात।
अनाचारी, अनाचारिन् देखो।
अनाज (हिं॰ पु॰) अन्न, धान्य; गल्ला।
अनाजी (हिं॰ वि॰) अनाजका, ग़ल्लेवाला।
अनाज्ञा (सं॰ त्रि॰) आज्ञा न पाया हुआ, जिसे हुका न मिला हो।
अनाज्ञाकारिता (सं॰ स्त्री॰) आज्ञारहित कर्मका कार्य, बेहुका काररवाई।
अनाज्ञाकारी (सं॰ पु॰) आज्ञाके अनुसार कार्य न करनेवाला, जो हुक्मके मुताबिक काम न करे। (स्त्री॰) अनाज्ञाकारिणी।
अनाज्ञात (सं॰ त्रि॰) न आज्ञातम्। ज्ञानका अविषयीभूत, नजाना हुवा।
अनाड़ी (हिं॰ वि॰) अज्ञानी, नासमझ।
अनाढ्य (सं॰ वि॰) निर्धन, बैदौलत; दरिद्र, ग़रीब।
अनाढ्यम्भविष्णु (सं॰ वि॰) धनिक न बनता हुवा, दौलतमन्द न होनेवाला; जो ग़रीब होते जा रहा हो।
अनातङ्क (सं॰ त्रि॰) अरोगी, नाबीमार।
अनातत (सं॰ त्रि॰) धनुषाकार न फैला या फंसा हुवा, जो कमानकी तरह फैला या फंसा न हो।
अनातप (सं॰ पु॰) अभावार्थे नञ्-तत्। १ आतपका अभाव, गर्मीका न रहना। २ छाया, साया। ३ शीतलता, ठण्डापन। (त्रि॰) बहुव्री॰। १ आतप शून्य, तपिशसे खाली।
अनातुर (सं॰ वि॰) न आतुरम्, नञ्-तत्। आतुरभिन्न, सुस्थ; नाबीमार, लाचारीसे अलग, तन्दुरुस्त।
अनात्म (सं॰ वि॰) १ आत्मश न्य, बेरूह। (क्ली॰) २ आत्मासे विरुद्ध वस्तु, जो चीज़ रूह न हो।
अनात्मक (सं॰ वि॰) नास्ति आत्मा स्थिरो यत्र,
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कप्। १ आत्मविहीन, बेरूह। २ जैन मतानुसार असत्, सच्चा नहीं। अनात्मक-दुःख (सं॰ क्ली॰) आत्मासे सम्बन्ध न रखनेवाला दुःख, जिस तकलीफ़का रूहसे कोई सरोकार न रहे। जैन शास्त्रकार इहलोक और परलोक दोनोके दुःख अनात्मक मानते हैं।
अनात्मज (सं॰ त्रि॰) आत्मानं यथास्वरूपं न जानाति,
ज्ञा-क। आत्माको न जाननेवाला, रूहकी पहचानसे खाली; जो असली समझ न रखता हो।
अनात्मधर्म (सं॰ क्ली॰) आत्माका धर्म नहीं, जो
चाल रूहकी न हो।
अनात्मन् (सं॰ पु॰) न आत्मा, अप्राशस्त्ये भेदार्थे च नञ्-तत्। १ आत्म-भिन्न, रूह नहीं; जो चीज़ चेतन न हो। (त्रि॰) २ आत्मारहित, बेरूह; शारीरिक, जिस्मानी।
अनात्मनीन (सं॰ त्रि॰) आन्मन्-ख; आत्मने हितमात्मनीनम्, न आत्मनोनम्, नञ्-तत्। आत्मन् विश्वजनभोगोत्तरपदात् खः। पा ९।१।९ निजको अहित, अपने लिये बुरा; जो आत्माको भला न लगे।
अनात्मप्रत्यवेक्षा (सं॰ स्त्री॰) जैन मतानुसार-
आत्माकी अनुपस्थितिका विचार, रूहके न रहनका खय़ाल।
अनात्मवत् (सं॰ त्रि॰) न आत्मा अन्तःकरणं वश्य-त्वेन अस्ति अस्य: मतुप-मस्य वः, नञ्-तत्।
१ अजितेन्द्रिय, अपने काबू.का नहीं। (अव्य॰) २ अपने विरुद्ध, रूहके ख़िलाफ़। अमात्मा (सं॰ क्ली॰) आत्मन इदम् आत्मन् यत् आत्मां शरीरम्;
न आत्माम्, नञ्-तत्। तस्येदम्। पा ४।३।१२०।
१ अपने निज परिवारके लिये प्रेमका अभाव, अपने खास ख़ानदानपर मुहब्बतका न होना। (त्रि॰) २ अपना नहीं, अपनेसे ताल्लुक न रखनेवाला। अनाथ (सं॰ त्रि॰) नास्ति नाथः प्रभुरस्य। १ प्रभुः
हीन, बेमालिक; जिसका कोई रखवारा न रहे। २ रहित, महरूम। ३ लावल्द, बेबाप। ४ ग़रीब, बेचारा। ५ यतीम, लावारिस। (वै॰ क्ली॰) १ रक्षाका अभाव, हिफाजतका न होना।
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