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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४३५

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अनार्यक—अनावर्ति
विन्ध्यगिरि और उत्तरमें हिमालय—इसके मध्यवर्ती स्थानको पण्डित आर्यावर्त कहते हैं।'

कुल्लू कभट्टने आर्यावर्तकी इसतरह व्युत्पत्ति बतायी है,—'आर्य अत्रावर्तन्ते पुनःपुनरुद्भवन्तौत्यार्यावर्तः।' आर्य इस स्थानमें पुनःपुनः उत्पन्न होते, जिससे यहांका नाम आर्यावर्त पड़ा है। अमरसिंहने यों लिखा है,— "आर्यावर्तः पुण्यभूमिर्मध्यं विन्ध्यहिमालयोः।" निरुक्तके भी एक स्थानमें आर्यजनपदका विषय बताया गया है।

यह नहीं कह सकते, कि यास्कने इस आर्य शब्द से आर्यावर्तका निर्देश निकाला था या नहीं। जो हो, पहले आर्य जहां बसते, उसे छोड़ दूसरा स्थान अनार्य देश कहाता था। इसका विस्तारित विवरण आर्य शब्दमें देखो। वर्तमान भारतवासी कोल, साँओताल प्रभृति वन्य जातियोंको अनार्य बताते हैं।

अनायक (सं॰ क्ली॰) अनार्य-कन्, आर्यो न वसति यत्र तत्रार्यवर्जिते देशान्तरे भवः। अगुरु काष्ठ, मुसब्बर, ऊद। अगुरु वृक्ष सिलहट और अराकान प्रभृति अञ्चलमें जन्मता है। मनुसंहितामें जो सीमा सजायी गयी, उसे देखकर विचारने से श्रीहट्ट आर्यावर्तके भीतर जा पड़ता है। अतएव इसके द्वारा अराकान प्रभृति देश समझे जाते और वहां जो अगुरु लकड़ी होती, उसीको अनार्यक कहते हैं।

अनार्यकर्मिन् (सं॰ पु॰) अनार्यका कर्म करनेवाला व्यक्ति, जो शख्स कमीनेका काम करे।

अनार्यज (सं॰ क्ली॰) अनार्यदेशे जायते, जन-ड। १ अनार्यदेशजात अगुरु काष्ठ, कमीने मुल्कमें पैदा हुई मुसब्बरकी लकड़ी, ऊद। (त्रि॰) २ अनार्य-देश जात, कमीने मुल्कमें पैदा हुवा।

अनार्यजुष्ट (सं॰ त्रि॰) अनार्य द्वारा अध्युषित, साधित अथवा अधिकृत, कमीनेसे मिलाया, साधा या लिया गया।

अनार्यता (सं॰ स्त्री॰) अनार्य होनेका भाव, कमीनापन।

अनार्यतिक्त, अनार्यतिक्तक (सं॰ पु॰) अनार्यदेशे जातस्तिक्तः। भूनिम्ब, चिरायता। (Gentiana cherayta, Rox.) दार्जिलिङ्ग प्रभृति हिमालयके

नाना स्थानमें चिरायतेका पेड़ जङ्गली तौर पर पैदा होता है। लेप्चा प्रभृति पार्वतीय जाति अनार्य कहती थी, इसी कारण उसके देशका नाम अनार्यदेश रखा गया। उसी अनार्यदेशका तिक्त वृक्ष चिरायता है। चिरायतेका दूसरा नाम 'किरात-तिक्त' भी होता, जिसका मतलब पर्वतकी अनार्य किरात जातिके देशमें पैदा होनेवाला तिक्त वृक्ष है। चिरायता देखो।

अनार्यत्व (सं॰ क्ली॰) अनार्यता देखो।

अनार्ष, अनार्षेय (सं॰ त्रि॰) ऋषिसेवितत्वात् ऋषिः वेदः तत्रोक्त आर्षस्तद्भिन्ने। अवैदिक, वेदका अव्यवहृत; वेद या ऋषिसे सम्बन्ध न रखनेवाला।

अनालम्ब (सं॰ त्रि॰) निराश्रित, बेसहारा; जिसे कोई टेक न मिले। (पु॰) २ निराश्रयता, सहारेका न सधना।

अनालम्बन (सं॰ त्रि॰) आश्रयशून्य, बेसहारा।

अनालम्बी (सं॰ स्त्री॰) शिवकी वीणा, महादेवका तम्बूर।

अनालम्बुका, अनालम्भुका (सं॰ स्त्री॰) मासिक धर्मसे सम्पन्न स्त्री, जो स्त्री कपडोंसे हो।

अनालाप (सं॰ त्रि॰) १ मौनावलम्बी; मुंहचुप्पा; ज्य़ादा बात न करनेवाला। (पु॰) २ मौनावलम्बन; कमगोयी; कम बोलनेकी हालत।

अनालोचित (सं॰ त्रि॰) न आलोचितम्। १ अविवेचित, बेसमझा। २ अष्ट, बेदेखा।

अनालोच्य (सं॰ अव्य॰) अविवेचनासे; बेसमझें, बेदेखेभाले।

अनालोडित (सं॰ त्रि॰) न आलोड़ितम्। अनान्दोलित, अविवेचित; न समझा गया, जिसकी देखभाल न चली हो।

अनावया (वै॰ त्रि॰) कठोर; सख़्त; न देनेवाला, हाथ न उठाते हुवा।

अनावर्ति (सं॰ स्त्री॰) पुनरागमनविहीनता; ग़ैरवापसी; पीछेका न लौटना। इस शब्दका तात्पर्य इहलोकसे जाकर फिर न फिरना अर्थात् मुक्ति पाना है।