| अनावर्षण (सं॰ क्ली॰) वृष्टिका अभाव, पानीका न बरसना; दुर्भिक्ष, क़हत।
अनावश्यक (सं॰ त्रि॰) आवश्यकतारहित, जिसकी कोई ज़रूरत न रहे। अनावश्यकता (सं॰ स्त्री॰) आवश्यकताराहित्य, ज़रूरतका न पड़ना। अनाविद्ध (सं॰ त्रि॰) अनाहत; बेज़ख्म; चोट न खाये हुवा। अनाविल (सं॰ त्रि॰) न अविलम्। १ परिष्कार, स्वच्छ, मलिनताशून्य, कलुषतारहित; साफ़, सुथरा। अनाविष्ट (सं॰ त्रि॰) न आविष्टम्। अमनोयोगी; दिल न लगानेवाला। अनावृत् (वै॰ त्रि॰) पुनरागमनरहित, वापस न आनेवाला। अनावृत (सं॰ त्रि॰) न ढंका हुवा, खुला। अनावृत्त (सं॰ त्रि॰) न आवृत्तं अभ्यस्तम्। १ घूमकर फिर न आनेवाला, जो जाकर वापस न हो। २ पीछे न हटते हुवा। ३ यातायात न करनेवाला, जो आमदरफ़्त न रखे। ४ पसन्द न किया गया। अनावृत्ति (सं॰ स्त्री॰) न आवृत्तिः पुनरागमनम्। १ पुनर्वार के आगमनकी शून्यता, ग़ैरवापसी। २ मुक्ति, निर्वाण। ३ अभ्यासका अभाव, महावरेका न मंजना। अनावृष्टि (सं॰ स्त्री॰) न आदृष्टिः सम्यग्वृष्टिः। वृष्टिका अभाव, पानीका न पड़ना; सूखा। यह शस्यहानिका प्रधान कारण है। छः ईतियोंमें अनावृष्टि भी शामिल है। अतिवृष्टि देखी। पहले हिन्दू अनावृष्टिके समय भोजपत्रपर रक्तचन्दनसे ऐसे एक सौ आठ स्थानके नाम लिखते, जिसका आद्यक्षर 'क' रहता था—जैसे काशी, काञ्ची, कलकत्ता, कनौज इत्यादि। किन्तु जिस स्थानके अन्तमें 'पुर' या ग्राम शब्द होता, (जैसे कल्याणपुर, कुलग्राम इत्यादि) उसका नाम छोड़ देते थे। पीछे उसी भोजपत्रको कटोरीमें डाल जलमें डुबाकर रखनेसे उन्हें वृष्टिहोनेका निश्चये हो जाता था। सिवा इसके अनावृष्टिको निवारण करनेके लिये |
दैवक्रिया भी अनेक थीं। ब्राह्मण ग्रामके शिवको जलमें डुबा देते, होम और याग भी किया करते थे। आदिशूरने जो कई बार यज्ञानुष्ठान किया, उसमें कदाचित् अनावृष्टिके निवारणार्थ भी एक यज्ञ रचा गया था। कितने ही वर्ष हुए, जब पञ्जाबमें अतिशय अनावृष्टि रही, तब पञ्जाबके ब्राह्मणोंने यह श्लोक पताका पर लिख झण्डा उड़ाया था,—
"भूयश्च शतवार्षि क्यामनावृष्ट्यामनम्भसि। पूर्वापेक्षा अब भारतवर्षमें वर्षा बहुत कम होती है। युरोपीय बताते हैं, कि क्रमसे इस देशका जङ्गल परिष्कार हो रहा, जो अनावृष्टिका प्रधान कारण है; बड़े-बड़े पेड़ न रहनेपर अच्छीतरह पानी नहीं पड़ता। अनावेदित (सं॰ त्रि॰) आवेदनविहीन; ग़ैरमुश्तहिर, ज़ाहिर न किया गया। अनाव्याध (वै॰ त्रि॰) जिसका टूटना या खुल जाना असम्भव हो, किसीतरह न टूटने या न खुलनेवाला। अनाव्रस्क (सं॰ पु॰) १ अनाहत दशा, नुक़सान न पहुंचनेकी हालत। (त्रि॰) २ हानि न पहुंचानेवाला, जो नुक़सान न करे। अनाश (सं॰ त्रि॰) १ आशाशून्य; नाउम्मेद। भरोसा न रखनेवाला। २ नाशशून्य; लाज़वाल; न मिटनेवाला, जीता-जागता। अनाशक (सं॰ पु॰) णश-ण्वुल्—नाशकः न नाशकः, नञ्-तत्। अथवा न आ सम्यक् अश-घञ्-आशः; अशनं कप्, नञ्-बहुव्री॰। १ अनश्वर, फलकामना-शून्य; उम्मीदसे खाली बात। २ उपवास। अनाशकनिवृत्त (सं॰ पु॰) उपवासका अभ्यास छोड़नेवाला व्यक्ति, जो शख्श फ़ाक़ाकशीकी आदत छोड़ दे। अनाकाशयन (सं॰ क्ली॰) न नश्यति अनाशक आत्मा तस्यायनं प्राप्त उपायः। आत्मज्ञान-साधन ब्रह्मचर्य-विशेष, जो उपवास करनेसे बनता है। अनाशस्त (सं॰ त्रि॰) न आशस्तम्। १ अस्तुत, |
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अनावर्षण—अनाशस्त
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