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अनुदात्तोदय-अनुद्धृत
अनुदात्तोदय (सं॰ क्ली॰) वह शब्दखण्ड जिसमें बोलते ही अनुदात्त स्वर लगता है।
अनुदात्तोपदेश, अनुदात्तेय देखो।
अनुदार (सं॰ त्रि॰) न उद्र-आ-रा-क। १ अदाता, दाता नहीं, न देनेवाला, जो फै़याज़ न हो। २ अमहत्, जो बड़ा न रहे। ३ असरल, टेढ़ा। ४ अदक्षिण, खि़लाफ़, उलटा। (पु॰) नास्ति उदारो यस्मात्, नञ् ५-बहुव्री॰। ५ अतिदाता, निहायत फै़याज़। ६ अतिमहत्, निहायत आला। ७ अति-सरल, बहुत सीधा। ८ अतिशय वाञ्छापूरक, ख़्वाहिशको खूब पूरा करनेवाला। अनुगतो दारान्, अतिक्रा॰ सं॰। स्त्रीके अनुगत, औरतका ताबदार।
अनुदित (सं॰ त्रि॰) उद्-इण-क्त, न ईषत् उदितः (सूर्यः) यस्मिन् काले, ईषदर्थे नञ्-बहुव्री॰। १ अरुणोदयकाल, पौ फटनेका वक्त, जिस समय पूर्वदिक्में ईषत् सूर्यकिरण चमकता और दो-एक नक्षत्र भी देख पड़ता है।—— ‘उदिते जुहोति अनुदिते जुहोति’ (श्रुति) (त्रि॰) नञ्-तत्। २ उदित नहीं, न निकला हुवा, जो देख न पड़ा हो। वद-क्त, नञ्-तत्। ३ अकथित, न कहा गया।
अनुदिन (सं॰ अव्य॰) वीप्सार्थे अव्ययी॰। प्रति दिन, प्रत्यह, रोज-ब-रोज, दिन-दिन।
अनुदिवस, अनुदिन देखो।
अनुदिशम् (सं॰ अव्य॰) प्रत्येक प्रान्तमें, हर ओर, चारों तर्फ़।
अनुदृष्टि (सं॰ स्त्री॰) अनुगता दृष्टि अनुकूला वा दृष्टिः, अतिक्रा॰-तत्। १ अनुगत दृष्टि, अनुकूल दृष्टि, नेक नज़र, मेहरबानीकी निगाह। २ अनुदृष्टिनेय, पुरखन। (त्रि॰) ६-बहुव्री॰। ३ अनुगत अथवा अनुकूल दृष्टि विशिष्ट, नेक नजर रखनेवाला, जो मेहरबानीकी निगाह रखे।
अनुदेय (सं॰ त्रि॰) वापस या पीछा दिया जाने-वाला, जो वापस या पीछा पहुंचाया जाये।
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अनुदेयी (सं॰ स्त्री॰) परिवर्तन, पलटा, एवज़ जो चीज़ किसी दूसरी चीज़के लिये देना पड़े।
अनुदेश (सं॰ पु॰) अनु पश्चात् अनुदिश्यते, अनु-दिश-घञ्। ययासं ख्यमनुदेश: समानाम्। पा १।३।१०। १ पश्चात् उच्चारण, पिछला तलफ़फुज। २ उपदेश, तालीम। ३ किसी पहली चीज़का हवाला। अनुदिश्यते, कर्मणि घञ्। ४ उपदेश्य, सिखाया जानेवाला।
अनुदेशिन् (सं॰ त्रि॰) १ पश्चाद् सङ्केत करते हुवा, जो पीछे का हवाला दे रहा हो। २ अनुदेशका विषय बनते हुवा, पिछले का़यदेपर कायम होनेवाला।
अनुदेह (सं॰ अव्य॰) देहसे पश्चात्, जिस्मके पीछे।
अनुदैर्घ्य (सं॰ त्रि॰) प्रशस्त, लम्बाचौड़ा, तूलानी, जो खूब बढ़ा या फैला हुवा हो।
अनुद्गीर्ण (सं॰ त्रि॰) १ वमन न किया गया, जो कै़ न हुवा हो। २ घृणा न किया हुवा, जिससे नफरत न दिखायी गयी हो। ३ ठोकर न लगाया गया, जिसपर लात न पड़ी हो।
अनुद्देश (सं॰ पु॰) न उद्देशः, अभावार्थे नञ्-तत्। १ उद्देशका अभाव, मतलबका न रहना। २ जिसका कोई अनुसन्धान न निकले, खोजसे खा़ली।
अनुद्धत (सं॰ त्रि॰) न उद्वतम्, विरोधार्थे नञ्-तत्। विनययुक्त, जो उद्धत न हो, अनुग्र, शान्त, सौम्य, ऊंचा न उठा हुवा, हलीम।
अनुद्धरण (सं॰ क्ली॰) न उद्धरणम्, अभावार्थे नञ्-तत्। १ उद्धारका अभाव, छुटकारका न मिलना। २ दान, प्रतिष्ठा अथवा प्रमाणका न होना, बख्शिश, बन्दिश या सुबूतका न रहना।
अनुद्धर्ष (सं॰ पु॰) उद्धर्षका अभाव, उद्वेगका न उठना, घबराहटका पैदा न होना, शान्ति, अमन-चैन।
अनुद्धार (सं॰ पु॰) उद्-धृ-घञ्; न-उद्धारः नञ्-तत्। १ उद्धारका अभाव, छुटकारेका न पाना। (त्रि॰) नास्ति उद्धारः ज्येष्ठादि लभ्यांशो यत्र, नञ्-बहुव्री॰। २ विंशोद्धारादि रहित, बीस छुटकारसे खा़ली।
अनुद्धृ (सं॰ त्रि॰) न उद्धृतम्, नञ्-तत्। १ उद्धार
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