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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/५

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अ—अउघड़
साधनका यह फल है कि साधकका चित्त एकाग्र होकर वह दीर्घायु होजाता है। उसके भीतरी वायु, पित्त, रक्त, तथा शुक्र स्वच्छ होकर शुद्ध हो जाते हैं और समाधिकी पूर्वावस्थाकी भाँति साधक सो जाता है।
बहुत दिनोंकी पुरानी बातें लिखी जानेके कारण पाठक भलेही हँसें परन्तु अब हँसनेका समय नहीं है। पहिले हमलोगोंको देखकर जो हँसते थे, अब वे भी माथे पर हाथ रखकर सोचा करते हैं। संस्कृत-प्रिय मोक्षमूलर (Max Müller) साहबने लिखा है—ओंकार जप करके देखो। पहिले यह वृथा, सारहीन मालूम होगा। परन्तु बात वास्तवमें ऐसी नहीं है। बार बार प्रणवका उच्चारण करनेसे ओंकारका जप होता है। यह जप मनको एकाग्र कर ब्रह्मरूप महाकेन्द्रमें लगानेके लिये किया जाता है। हिन्दू जिसे मनकी एकाग्रताका साधन कहते हैं; सबलोग उसका मर्म्म नहीं जानते।
अउ—(हिं॰) और, तथा, अपर। [इसकी योजना पथमें ही होती है]
अउठा—(हिं॰ पुं॰) नापनेकी दो हाथकी एक लकड़ी जिसे जुलाहे लिये रहते हैं। इस लकड़ीसे जुलाहे अपना ताना बाना ठीक करते, कपड़े को नापते और समय समय पर सूतको भी ठीक करते हैं।
अउर—(हिं॰) और।
अऊत—(हिं॰ वि॰) अपुत्र, बिना पुत्रका, निःसन्तान।
अऊलना—(हिं॰ क्रि॰) जलना, गरमी पड़ना, चुभना, छिदना, छिलना।
अऋण—(वि॰) ऋणमुक्त, जो कर्ज़दार न हो।
अऋणिन्—(सं॰ त्रि॰) न ऋण-इन् अस्त्यर्थे। नञ्-तत्। किसी किसी पुस्तक में इस तरह रूप-सिद्धि ली गई है।

अऋणी चाप्रवासी च स वारिचर मोदते। (महाभारत वनपर्व्व)

नञ् तत्पुरुषसमासमें स्वरवर्ण पीछे रहनेसे अ की जगह अन् हो जाता है।*। तस्मान्नुड़चि। या ६।३।७४। ऋकारका हलत्व ग्रहण करना ठीक नहीं है। ऋकार अर्द्धस्वरवर्ण है। अर्थात्

इसके आदिमें आधा स्वर और अन्तमें आधा हल् (अ्+र्) मिला हुआ है। इसीसे "अनृणी" ऐसी रूप-सिद्धि हो जाती है। कालिदास ने इस शुद्धरूप को ग्रहण भी किया है। जैसे, तदहमेनाम् अनृणां करोमि। ऋणशून्य। जिसे क़र्ज़ न हो। अऋणी अऋणिनी, अऋणिनः। (स्त्री॰) अऋणिनी।
किसीसे उधार धन लेकर फिर चुका देनेसे ही मनुष्य अऋणी अर्थात् ऋण मुक्त हो जाता है; परन्तु इसके अतिरिक्त धर्म्मतः मनुष्यों पर और भी तीन प्रकारके ऋण रहते हैं।

ऋणं देवस्य योगेन ऋषीणां दानकर्म्मणा।
सन्तत्या पितृलीकानां शोधयित्वा परिब्रजेत्॥

होम यज्ञ आदि द्वारा देवऋण, दानद्वारा ऋषिऋण, और सन्तान उत्पन्न करके पितृ ऋणको परिशोधकर ब्राह्मणको मोक्षसाधनमें चित्त लगाना चाहिये।
अपरना—(हि॰ क्रि॰) अङ्गीकार करना। अँगेरना। स्वीकार करना। धारण करना।
अउघड़ (औघड़)—भारतवर्षका एक उपासक सम्प्रदाय। ब्रह्मगिरि नामक एक महन्त ने यह मत चलाया था दशनामी संन्यासी योगी गुरु गोरखनाथ की कृपा से "अउघड़" नाम देकर उन्होंने यह मत चलाया। गुजरात में उनकी एक गद्दी है। इनमें शिष्य बनाने की रीति नहीं है। इस गद्दी के महन्त की मृत्युके बाद सम्प्रदायका कोई एक मनुष्य किसी एक प्रकरणसे गद्दी का अधिकारी बना दिया जाता है।
इस अउघड़ मतके चलाने वाले ब्रह्मगिरि रुखड़, सुखड़, प्रभृति योगियों का मत बहुत कुछ मिलता है। इनके विषय में जनश्रुति फैली हुई है कि गोरखनाथ ने ब्रह्मगिरि को मन्त्र दान न देकर कई अपने चिन्ह दिये थे। ब्रह्मगिरि गुरुसे उन चिन्हों को लेकर रुखड़ सुखड़ प्रभृति को दे गये थे।
इनमें किसी संन्यासी को मृत्यु होने पर सुखड़, रुखड़, गुदड़ ये तीनों मतावलम्बी एकत्र होकर उसकी अन्त्येष्टिक्रियासम्बन्धी सब काम करते हैं। पहिले मृत संन्यासी को स्नान कराया जाता है; उसके बदन