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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/५४

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अक्षरलिपि
तलसे प, वीणासे व, लाङ्गल या लङ्गूरसे ल, हाथसे ह, और श्रवणेन्द्रियसे श बना है। इसी तरह दूसरे अक्षरोंकी बनावट भी समझना चाहिये।
इसके बाद केनेडी साहबने प्रकाश किया, कि सन् ई॰ से पहलेकी ७ वींसे ३री शताब्दितक बाबिलनके साथ दक्षिण-भारतका वाणिज्य चला था। फिनिक जाति ही सबसे पहले भारतके साथ बाणिज्यके काममें लगी और उसी समय भारतीय लिपिकी उत्पत्ति हुई।
दोनों पक्षके मतकी आलोचना कर प्रसिद्ध संस्कृतशास्त्र जाननेवाले डाकृर बूहलरने सन् १८८८ ई॰ में इस तरह प्रकाश किया, कि कनिं हमने भारतीय चित्रलिपिकी जो उत्पत्ति मानी है, वह समीचीन नहीं। दाक्षिणात्यमें भट्टिप्रोलूसे जो लिपि निकली है, उसका पर्य्यावेक्षण करनेसे कभी चित्रलिपिके साथ उसकी बराबरी नहीं की जा सकती। बूहलरने अपना मत समर्थन करनेके लिये लिखा है—
सन् ई॰ से ८९० वर्ष पहले खोदे गये मेसाके पहाड़में जो सबसे पुराने सेमेटिक अक्षरोंकी ध्वन्यात्मक (Phonetic) लिपि देखी गई, उसके साथ ब्राह्मी लिपिके बहुतसे अक्षरोंका कितना ही सामञ्जस्य रहा है, उनमें 'ह' ओर 'त' यह दो अक्षर दक्षिण मेसोपोटेमियाके सन् ई॰ से पहले की ८वीं शताब्दिके मध्यभाग वाले 'हे' और 'तउ' इन दो फिनिक अक्षरोंसे निकले हैं। इसी तरह 'श' और 'ष' यह दो अक्षर भी सन् ई॰ से पहलेको ६ठीं शताब्दिके अरमीय अक्षरांस बने मालूम होते हैं। यह भी अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा, कि साहित्यिक और लिपिशास्त्रीय प्रमाणसे सन् ई॰ से पहले पांच-छः सौ वर्षके बीच जो अरमीय लिपि आविष्कृत हुई है, उससे ब्राह्मी लिपिकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। कितने ही विद्वानोंने इस प्रकार मत प्रगट किया है सही, किन्तु यह बात अच्छी तरह समझ पड़ती है, कि भारतभूमिमें पुरानी अरमीय लिपिके अनुरूप आधुनिक स, ष, श, अक्षर बनाये गये हैं। सन् ई॰ से पहले ७५० और ८९० वर्षके बीच ही भारतमें सेमेटिक अक्षरलिपि प्रवेश लाभ कर सकी होगी।

बौद्धोंका बाबेरुजातक पढ़नेसे ज्ञात होता है, कि बाबेरुस (Babylon) ही भारतमें बाणिज्य आरम्भ हुआ था। सन् ई॰ की पहली शताब्दितक पश्चिम भारतमें भरुकच्छ (भड़ोच) और सूर्पारक (सूपारा) नामक स्थान समुद्र-बाणिज्यके केन्द्र रहे। बौधायन और गौतम धर्म्मसूत्रमें भी यात्रियोंमें शुल्क या कर लेने को व्यवस्था पाई जाती है। ऋग्वेदमें समुद्रयात्राकी बात लिखी है। सिरीय बणिक् बहुत पुराने समयसे ही ईरानकी खाड़ी द्वारा भारतमें बाणिज्य करते आते थे। इसी तरह ईसाके जन्मसे प्रायः ८०० वर्ष पहले यानी कोई २७०० वर्ष हुए आने जानेवाले फिनिकीय (Phoenician) बणिकोंके यत्नसे ही भारतमें समेटिक लिपि आई और धीरे-धीर वही मिले हुए स्वरवर्षोंक साथ परिपुष्ट हो सन् ई॰ की ५वीं शताब्दिमें सर्व्वाङ्गसुन्दर भारतीय लिपि चन गई है।
डाकृर बृहलरने जो मत प्रकाश किया है, उसे ही आजकल पाश्चात्य प्रत्नतत्वविद् और दूसरे ऐतिहासिक समीचीन बता ग्रहण करते हैं; किन्तु हमने जहाँतक आलोचना की हैं, वहाँतक जान पड़ा हैं, कि जिस प्रमाण और युक्तिबलमें जर्म्मनीके प्रसिद्ध पण्डितने फिनिक लिपिसे भारतीय अक्षरलिपिकी उत्पत्ति, मानी है, वह समीचीन बता ग्रहण नहीं किया जा सकता। कारण, फिनिक अक्षरलिपि इतनी असम्पूर्ण और अल्पसंख्यक हैं, कि उसके द्वारा भारतीय शास्त्रोंकी उच्चारण-प्रक्रिया या लिखन प्रणाली किसी तरह सिद्ध नहीं हो सकती। उन्होंने दूसरी लिपिके साथ ब्राह्मीलिपिकी जो बराबरी दिखाई है, वह भी हमारी विवेचनामें ठीक नहीं। दोनों लिपि पास-पास रखने से आकाश-पातानका भेद जान पड़ता है। विशेषतः भारतवर्षीय ४८ अक्षरांक बीच दो-एकका सामञ्जस्य देख सब किसी तरह फिनिक अक्षलिपिकी सन्तति नहीं मान जा सकते। इसके सम्बन्धमें हम अपने युक्ति-प्रमाण आगे लिखत है।

वैदिक-वर्णमालाका उत्पत्तिकाल।

बीता हुआ इतिहास घोषणा करता है, कि हज़ारों वर्ष; यहाँ तक, कि हिमप्रलयसे पहले ही