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आर्यसभ्यताका सुवीज अङ्कुरित हुआ। जिस युगमें हिमालयने भूगर्भसे मस्तक ऊपर न उठाया था, जिस युगमें समुच्च आल्प-शैल बहुत ऊंचे पर्व्वतरूपसे न निकला था, और जिस युगमें वर्तमान एशिया और अफ्रीका महादेश छोटे-छोटे द्वीपोंके आधार थे, उसी दूर-अतीत युगमें, हमें भूतत्त्वविद्या बताती है, कि पश्चिममें उत्तर-स्कन्दनाभसे पूर्व में उत्तर-अमेरिकातक आर्य्य-जातिको 'प्रत्नीकस्' या आदि जन्मभूमि फैल गई थी। आज जो स्थान चिरतुषारमय, सुखी मनुष्यको कष्ट देनेवाला, असह्य और उपादेय फलमूल वृक्षादि उत्पादनके सम्पूर्ण अनुपयुक्त समझा जाता है, वह उत्तर महादेश ही एक समय आर्यदेवोंका नन्दनकानन गिना जाता था। यह २१००० वर्षसे भी पहलेकी बात है, कि जबतक हिमप्रलय और बरफ़ गिरनेसे आर्यभूमि सुमेरुका (Arctic regions) प्राकृतिक विपर्य्यय न हुआ था, तब-तक उस अतीत युगमें एशिया और युरोपका उत्तर शीतल-ग्रीष्म और उष्ण-शीत ऋतुसे मण्डित रहा, यानी उस समय वहां सदा वसन्त बना रहता और मेरु सकल उपादेय फल-मूलका उद्यान जैसा देख पड़ता था। उसी समयसे वैदिक आर्य्यों में सभ्यताका स्रोत बह रहा था, और उसी समयसे वह यागयज्ञ और ज्योतिषक तत्त्व जानते रहे थे।[१] नाना सूत्रोंके सम्पादनकल्पसे ऋषियोंके हृदयमें ज्योतिषकी कठिन समस्या उदित हुई थी। वेद देखो। बिना अङ्कविद्या जाने उस समस्याका पूरा होना सम्भवपर न था! विना अङ्कपात कठिन गणना कैसे की जाती? यदि किसी प्रकारका चिह्न या अक्षर-विन्यास न हो, तो अङ्कपात कैसे किया जाये इसलिये यह बात मानना ही पड़ेगी, कि उस बहुत पुराने युगसे ही वर्ण या अक्षर विशेषकी उत्पत्ति हुई है। किन्तु यह जाननेका कोई उपाय नहीं, कि कैसी लिपिके साहाय्यसे वह अक्षर या अङ्कपात बनाये गये थे। फिर भी, यह वैदिक मन्त्रोंकी आलोचना करनेसे मालूम होता है, कि उस आदि वैदिक युगमें ही नाना |
वर्णमालाओं और अक्षरोंकी उत्पत्ति हुई थी। बिना नाना वर्ण या अक्षर-समाधान सब वैदिक शब्द समुच्चारित होनेकी सम्भावना नहीं।
हिमप्रलयसे पहले जब वैदिक सभ्यता सुप्रतिष्ठित हुई थी, तब यह बात भी साधारण रीतिसे स्वीकार की जाती है, कि वैदिक अक्षरमालाका भी विकाश हुआ था। प्रातिशाख्य या प्रतिशाखाकी वैदिक पठन-पाठन विधिके अनुसार प्रति मन्त्र ही 'स्वरतः' और 'वर्णतः' पाठ करनेका नियम है। इसलिये यह बात ठीक नहीं, कि आदि वैदिक मन्त्र केवल खरानुसृत ही थे; सब लोगोंको मालूम है, कि वह अक्षरविशिष्ट भी थे। कोई ऐसा प्रबल प्रमाण अवश्य नहीं है, जिस-पर हम ज़ोर देकर कह सकें, कि हिमप्रलयसे पहले सुमेरु-निवासी वैदिक देवर्षि जो मन्त्र पढ़ते थे, वह अविकृत आकारसे ही आर्य्यावर्त आ पहुंचे और इस समय जो वैदिक मन्त्र पाए जाते हैं, वह सभी हिमप्रलयसे पहले विद्यमान थे। किन्तु यह तो असम्भव नहीं, कि हिमप्रलयके समय विषम तुषार-समुद्रके तरङ्गाघातसे जो आर्य्य बच गये थे, उन्हें श्रुतिविभ्रम न हुआ। उनके वंशधरोंने मेरु (Pamir) और समुच्च हिमालय प्रदेशमें रहते समय उनके मुंहसे ही जो आदिवैदिक मन्त्र सुने थे, वही श्रुति कहे जाकर गण्य हुए हैं। यह बात नहीं, कि देश, काल, पात्र और जलवायुका अवस्था-भेद बदलते समय उस श्रुतिके उच्चारणमें कुछ-कुछ अलगाव न हो गया था और स्थान-विशेषमें आर्य्यसन्तानोंने उन आदि मन्त्रोंको व्यवहारोपयोगी न बना लिया था। वेदके मन्त्रपरिचायक ब्राह्मणग्रन्थमें लिखा है— "पथ्यास्वस्तिरुदीची दिशं प्राजानात्। वाग् वै पथ्या स्वस्तिः। तस्माटुदीच्यां दिशि प्रज्ञाततरा वागुद्यते। उदञ्जे उ एव यन्ति वाचं शिक्षितुम्। यो वा तत आगच्छति तस्य वा शुश्रूषन्ते इति स्याह। एषा हि वाचो दिक् प्रज्ञाता।" (शाङ्ख्यायनब्राह्मण ७।६) अर्थात् उत्तरदिक्को पथ्यावस्ति समझते हैं। पथ्यास्वस्ति ही वाक् है। उत्तरदिक्में ही वाक्य प्रज्ञात बताया जाकर कीर्तित हुआ करता है। लोग भी उत्तर-दिक्में ही भाषा सीखने जाते हैं। जो उस दिकसे |
- ↑ * B. G, Tilaka's Arctic home in the Vedas, p. 26.
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