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तरहकी अलग-अलग और छोटो छोटो-शाखा सहजमें ही शक्तिहीन और अल्पायु मनुष्य ग्रहण कर सकेगा।[१] महाभारतके यह कई वचन पढ़कर फिर किसीको इस बातमें सन्देह न रहेगा, कि वेद ग्रन्थोंमें लिपिबद्ध होते थे— "बदेतदुक्तं भवता बंदशास्वनिदर्शनं। (वशिष्ठ जनकको सम्बोधन कर कहते हैं) आपन वेद और धर्मशास्त्रका जो यह निदशन कहा, ओर मनही मन जो धारणा की, वह ऐसो हो है यानी ठोक नहीं। आपने वेद और धर्मशास्त्र दोनोही ग्रन्य पढ़े, किन्तु उनका यथावत् अर्थ न समझ सकें। जो व्यक्ति वेद और धर्मशास्त्र ग्रन्थ पढ़नेमें अनुरुक्त हो, उनका तत्त्व यथावत् समझ न सका, उसका ग्रन्य अभ्याम किसी कामका नहीं। जो ग्रन्थका अर्थ भली-भांति गुहण न कर सका, उसके पक्ष में ग्रन्थका भार-बहन हो सार है। फिर, जो गुन्थका अर्थ यथारूपसे लगा सकता 'है, उसका अभ्यास विफल नहीं होता। |
अब हम निःसंदेह देखते हैं कि अति पूर्वकाल- से ही श्रुति और धर्म्मशास्त्र लिपिबद्ध और 'ग्रन्थ' कहे जाकर परिचित होते चले आते हैं इसमें मनुसंहिता (७।४।३) का टीका में कुल्लूकभट्ट ने लिखा है— "धर्मेणेव हि सम्पुष्टा लोका धर्मेण वर्धते॥ रघुनन्दनने भी वृहस्पतिका प्राचीन वचन उद्धृत किया है:— "वाग्मासिकेंऽपि समान्तमन्त्रान्नातिक्रामेन्मन्त्रवित्सर्वकर्मसु। अर्थात् छः महानंक बाद लोग भूल जाते हैं, इसीसे विधाताने पुराकालमें अक्षर बना पंक्तिबद्ध किया था। लिपिका अभ्यास करते रहे हैं। इसका भी प्रमाण पाया गया है, कि बहुत पुरान समयम हो भारतमं मम्भान्त स्वा-पुरुष दोनों हा अक्षर पाल्याकि रामायण मवास्वज्ञ महावार माता को देखा और अपना और रामका परिचय देकर भी जब वह सीताका मन्देह दूर न कर मर्के, तब उन्होंन मीताको विश्वास दिलानंर्क लिये रामनामाङ्गित एक अँगूठी निकाल कर दिखाई थी। राम नाम रत्न सागर, सबके मन के रंग। उद्धृत श्लोक प्रक्षिप्त बताकर नहीं उड़ाया जा मकता ; कारण, मभा पुराने टीकाकारांने इस चोक-को प्रतिष्ठित किया है। रामनामाङ्गित अगृठापर हो मुन्दरकाण्डकी भित्ति स्थापित है। इलिये मानना पड़ेगा, कि यह श्लोक ग्वाम चाद्यौकिका बनाया है। तैत्तिरीय प्रातिशाख्यसूत्रमं पूर्वतन आचायरूपम बाल्मीकिका नाम रखा गया है। एम स्थनमें इसका स्पष्ट आभास मिलता है, कि बाज्याकिर्क ममय यानी वैदिक युगर्क अन्तिम भागमं कभर्म कम सन् ई०से पहलेको १०वीं शताब्दिम पहले भारतकी शिक्षित स्त्रियांको भी अतलिपिका ज्ञान था। यह लिखना इस जगह आवश्यक नहीं, कि बहुत पुराने वैदिक युगसे हो भारतमें स्त्रीशिक्षा प्रचलित था। इसलिये इस |
- ↑ साचात्कृतो वैर्धर्मः साचाद्द, टः प्रतिविशिष्टन तपसा। तइभ माचात्-क्लतधर्माणः। के पुनस्ते इति। उच्यते—ऋषयः, ऋषन्ति असुमात् कभंगा एवमर्थवता मन्त्र गण संयुक्तादमुना प्रकारेणैवंलचणफलविपरिणामी भवतीटषयः। ऋषिदर्शनादिति वच्चाति। तदेतत् कर्मणः फलविपरिणामदर्शनमौपचारिक्या इत्तोक्तः साचात्क्कृतधर्माण इति। न हि धर्मस्य दर्शनमस्ति; अन्धन्तापूवोहि धर्मः। आह-किं तेषामिति उच्यते—तऽवरभ्योऽसाचात्कृतधम्मभ्य उपदेशन मन्त्रान्त्सम्प्रादुः। तये साचात्कृतधम्र्मा णस्तेऽवरभ्योऽवरकालोनेभ्यः शक्ति-हौनेभ्यः श्रुतषिभ्यः। तेषां हि श्रुत्वा ततः पचादृषित्वमुपजायते न यथा पूर्वेषां साक्षात्कृतधर्मणां श्रवणमन्तरेनैव। आह- किं तेभ्य इति। तेऽवर्रभ्य उप-देशेन शिष्योपाध्यायिकया वृत्त्या मन्त्रान् ग्रन्यतोऽर्थतश्य सम्प्रादुः सम्प्रदत्तवन्तः। तेऽपि चोपदेशेनैव जग्गृहुः। ... उपदेशाय उपदेशार्थ। कथं नाम उपदिश्यमानमेते शक्न युर्ग्रहीतुमित्य तमधिक्कृत्य ग्लायन्तः खिद्यमानास्तष्वनु-गृह्णन्ति तदनुकम्पया तेषामायुषः सङ्कोचमवेच्चा कालानुरुपाञ्च ग्रहणशक्तिम् विव्यग्रहणायेनं ग्रन्य' गवादिदेवपनान्तं समाखातवन्तः। किमेतमेव नेतुाच्यते।"