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हैं। खरोष्ठी लिपिमालाके उत्पत्ति-प्रसङ्गमें इस विषयको आलोचना की जायगी। द्राविड़ीय सभ्यता समुद्रको राह सुदूर पाश्चात्य और प्राच्च जनपदों-में फैल कर भी भारतमें आर्यवैदिकोंके प्रभावसे ठहर न सको। यहां अगस्त्यादि आय्य-ऋषियोंने द्राविड़ी समाजका संस्कार कर लोगों को आर्य्यवापन्न बना लिया था। इसीसे आज भी अगस्त्य ऋषि अक्षरमाला और व्याकरणके बनाने वाले बताये और गिने जाते है' और द्राविड़ी लिपिमें ब्राह्मी लिपिके आदर्शसे अक्षरमालाको संख्याःभी बढ़ गई है। ब्राह्मी लिपिकी उत्पत्ति। अल् बेरुणी, भारतीय पण्डितोंके मुंहसे सुनकर लिख गये हैं, कि पराशरपुत्र वेदव्यास हो अक्षर-लिपिके उद्भावयिता थे। जैनियोंके मतसे ऋषभदेवने दाहने हाथसे अठारह प्रकारको जो लिपि सिखाई थीं[१], उनमेंसे आदि लिपिका नाम ब्राह्मी है। भागवत के मतसे ऋषभदेव भगवान्का आठवां अवतार हैं (१।३।१३)। वह लोक, वेद, बाह्मण और गो सबके परम गुरु थे और उन्होंने सकल धम्र्मके मूल गुह्य ब्राह्म-धर्म्मा (वेदरहस्य) का ब्राह्मणदर्शित मार्गके अनुसार उपदेश दिया था (५।६।अः)। ब्रह्मावर्त्तमें बुह्मर्षियोंको सभाके बीच उन्होंने ब्राह्मधर्मका प्रचार किया (५।४।१६-१८। राजर्षि भरत उन्हीं ऋषभदेवके पुत्र थे। उन्होंके नामपर इस देशका नाम भारतवर्ष रखा गया है। वह ब्रह्माक्षरका जप करते थे (५।८।११)। महाभारतमें लिखा है— "इत्य ते चतुरो वर्णा येषां ब्राह्मी सरखती। चारो वर्ण ब्राह्मणसे ही वर्णान्तरको प्राप्त हुए हैं और पूर्व कालसे ही ब्रह्माने इन चारो वर्षों को ब्राह्मी भाषा निद्दष्ट कर रखो है। उद्धृत प्रमाणसे अच्छी तरह जान पड़ता है, कि ब्रह्म शब्दका अर्थ वेद और बाह्मोका अर्थ वैदिकी है |
ऋषभदेवने हो सम्भवतः लिपिविद्याके लिये लिपि कौशलका उद्भावन किया था। इसलिये देखते हैं, कि ब्राह्मोलिपि कहनेसे पुराकालमें वैदिको लिपि ही समझी जातो रही। यह पहले हो प्रमाणित हो चुका है, कि वेद अवश्य लिपिवद्ध होते थे। ऋषभदेवने हो सम्भवतः बुह्मविद्याशिक्षाकी उपयोगी ब्राह्मोलिपिका प्रचार किया; हो न हो, इसीलिये वह अष्टम अवतार बताये जाकर परिचित हुए। ब्राह्मौलिपि नामसे भो लोगोंका यह कहना सच मालूम पड़ता है, कि पहले यह लिपि ब्रह्मावत्त में आविष्कृत हुई थी। वेदव्यास भी यह बात कहनेसे लिपि-प्रचारक गिने जा सकते हैं, कि उन्होंने वेद-सङ्कलनकालमें इस लिपिस काम लिया। जो हो, ब्राह्मीलिपि ही भारतीय आयाँको आदि लिपि है, इस बाह्मी लिपिसे हो भारतको सब लिपि निकली हैं। डाकर बूलरने अशोकलिपिको ही बाह्मी कह कर गणना की है। निःसन्देह, हम यह स्वीकार नहीं कर सकते। अशोकके समय भारतमें चौसठ प्रकारको लिपि चलती थीं, उस समय पाटलिपुत्र उनको राजधानी थी। ऐसे स्थलमें उनके अनुशामनींको मागध-ब्राह्मीलिपि कहकर ग्रहण कर सकते हैं; इसे छोड़ पाठ विभिन्न प्रदेशोंसे जो अशोकलिपि निकली हैं, उनके अक्षर और उनकी शब्दयोजना अविकल एक तरह नहीं। विहारके बरावरको गिरिलिपिमें अनपितम्', दाक्षिणात्यको स्तम्भलिपिमें 'आनपचिमति' और उत्तर-पश्चिम-प्रदेशको स्तम्भलिपिमें 'आना पसति' देख पड़ता है। यह कैसा अक्षरविपर्य्यय है, कि दक्षिण-देशीय लिपिमें 'एतारिसम्' और 'अनर्थभू' किन्तु उत्तर-देशीय लिपिमें 'एतादिसम्' और 'अर्थ' लिखा मिलता है। इसे छोड़ दक्षिण-देशीय और उत्तर-देशीय लिपिके बीच भी व्यञ्ज्ञ्जनसे मिले आकार और इकारका प्रमेद देख पड़ता है। इससे सहजमें ही समझा जायगा, कि देशभेदसे जैसे भाषामें कुछ अल-गाव हो गया था, वैसे ही अक्षरलिपि भी सामान्य रूपसे बदल गई थी। मालूम होता है, कि अशोकसे पहले ऐसी कोई लिपि वर्त्तमान थी। अक्षरयोजनाके { |
- ↑ अथ श्रीऋषभदेवेन ब्राह्मी दचिणहस्ते न अष्टादश लिपयो दर्शिताः।”
(लक्ष्मीवल्लभगणिरचितकल्यसूवकल्पद्रुमकलिका)