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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/७३२

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अब्द

कलिगताब्द वा कल्यब्द।

सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि इन चारो युगोंका एक महायुग होता है। नीचे युगोंका परिमाण दिया जाता है—

वत्सर देवपरिमाण
कृतयुग १७२८०००÷३६०=४८०० वत्सर
त्रेतायुग १२९६०००÷३६०=३६०० "
द्वापर ८६४०००÷३६०=२४०० "
कलियुग ४३२०००÷३६०=१२०० "
महायुग ४३२००००÷३६०=१२००० "

ईसा मसीहके जन्मसे ३१०२ वर्ष पहले कलियुग प्रचलित हुआ।

वराहमिहिरके समयतक भी कलिगताब्द व्यवहारमें आता था। वराहमिहिरसे प्रायः पचास वर्ष पहले आर्यभट जीवित थे। आर्यभट और उनसे पहलेके ज्योतिर्विद्गण भी कलियुगाब्द द्वारा ही सौर और चान्द्रसौरकी कालगणना करते थे। जिस-जिस स्थलमें केवल कलियुगाब्द ही कालगणनाके मानरूपसे परिगृहीत होता, उसी-उसी स्थलमें महीनेकी तारीख सौर और दिनकी संख्या सावन दिन नामसे की गई है।[] सावन और चान्द्र-मान द्वारा ही साधारणतः वत्सरकी गणना होती है। उत्तरभारतमें चान्द्र-सावन-मान ही प्रचलित है।

युधिष्ठिराब्द वा भारत-युद्धाब्द।

युधिष्ठिरके आविर्भावकाल-विषयमें मतभेद है। बार्हस्पत्यमान वा षष्टिसवत्सरके प्रसङ्गमें यह बात पहले ही कह दी गई है। वराहमिहिरके मतमें शकाब्दके साथ २५२६ जोड़ देनेसे (अर्थात् शकाब्दसे २५२६ वर्ष पहले) युधिष्ठिरका समय जाना जाता है। भास्कराचार्यने लिखा है—

"नन्दाद्रीन्दुगुणास्तथा शकनृपस्यान्ते कलेवत्सराः।"

कलिके ३१७९ वर्ष बीत जानेपर (वराहमिहिरके

मतसे) युधिष्ठिर आविर्भूत हुए थे। किन्तु पहले कहा जा चुका है, कि वराहमिहिरसे पहले कल्यब्द प्रचलित था। उत्तरभारतमें उनका मत प्रचलित होने पर भी ऐसा विश्वास नहीं होता, कि दक्षिण-भारतमें प्रथमतः विशेषरूपसे वह प्रचलित हुआ था। बराहमिहिर ५०९ शकमें परलोक गये।[] उसके ४७ वर्ष बाद उत्कीर्ण प्रतीच्य-चालुकराज २रे पुलिकेशीके शिलाफलकमें लिखा गया है—

"त्रिंशत्स त्रिसहस्त्रेसु भारतादाहवादितः।
सप्ताब्दशतयुक्तेषु गतेष्वब्देषु पञ्चसु॥
पञ्चाशत्सु कली काले षट्सु पञ्चशतासु च।
समासु समतीतासु शकानामपि भूभुजाम्॥"

अर्थात् भारतयुद्धसे अबतक ३७३५ वर्ष और इस कलिकालमें शकाधिपतिके ५५६ वर्ष बीत चुके हैं।

उक्त खोदित लिपिके श्लोकानुसार शकाब्दके ३१३९ वर्ष पहले भारतयुद्ध हुआ था। फिर भास्कराचार्य तथा मकरन्दके मतसे इसी वर्ष कल्यब्द आरम्भ हुआ। सुतरां प्राचीन खोदित-लिपिके अनुसार भारतयुद्धके समयसे हो कल्यब्द आरम्भ हुआ है। ज्योतिर्विदाभरणमें (१०वें अध्यायमें) देखा जाता है—

"युधिष्ठिराद्वेदयुगाम्बराग्नवः कलम्बविश्वेऽयखखाष्टभूमयः।
ततोऽयुतं लक्षचतुष्टयं क्रमात् धरादृगष्टाविति शाकवत्सराः॥"

ऊपर लिखे हुए श्लोकका तात्पर्य यही है, कि घुधिष्टिरसे लेकर ३०४४ वर्ष, उसके बाद विक्रमादित्यके १३५ वर्ष बीत जानेपर शाकवर्ष वा शकाब्द आरम्भ हुआ। ऐसे स्थलमें युधिष्ठिरके (३०३४ + १४५=)३१७९ वर्ष बाद शकाब्द प्रचलित हुआ था। सुतरां भास्कराचार्य और वराहमिहिरने जिसे कल्यब्द माना, वही यौधिष्ठिराब्द वा भारतयुद्धाब्द होता है।

परशुरामचक्र वा सहस्त्र-संवत्सर।

एक सहस्र वर्ष में परशुराम अब्द होता है। ईसामसीहके जन्मसे ११७६ बर्ष पहले यह अब्द प्रचलित हुआ त्रिवाङ्कोड़ और कुमारिका अन्तरीपके अञ्चल

  1. सूर्योदयसे जो दिन गिना जाता है, उसे सावन दिन कहते हैं। परन्तु इस शब्दका अर्थ दूसरी तरह है। सवनका अर्थ यज्ञ वा सीमरसानुसन्धान है। उस समयमें सूर्योदयसे यज्ञ प्रारम्भ होता था, इसीसे सावनका अर्थ सौरदिवस है।
  2. "नवाधिकपञ्चशतसंख्यशाके वराहमिहिराचार्यो दिवंगतः।"
    (ब्रह्मगुप्तरचित खण्डखाद्यको भामराजकृत टीका)

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