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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/७३७

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अब्द
और राज्यों में भी यही अब्द प्रचलित हो गया था। कदम्बराज तेलपदेवने भी इसी संवत्को स्वीकार किया।

सिंह-संवत्।

सन् १११४ ईस्वीमें सिंह-संवत् प्रचलित हुआ था। यह शिवसिंह-संवत्के नामसे भी प्रसिद्ध है। गुजरातसे जैनराजाओंके निकाले जानेपर यह संवत् चला।

लक्ष्मणसेन-संवत्।

मिथिलामें ऐसा प्रवाद है, कि गौड़ाधिप वल्लालसेन जिस समय युद्धके लिये मिथिलामें उपस्थित हुए, उसी समय उन्होंने राजधानीमें लक्ष्मणसेनके जन्मका समाचार पाया था। पुत्रजन्म और मिथिलाजय दोनोको चिरस्मरणीय रखनेके लिये उन्होंने यहां अपने पुत्रके नामानुसार लक्ष्मण-संवत् वा ल॰ सं॰ प्रचलित कर दिया।[] तबसे अबतक मिथिला और तिरहुत अञ्चलमें ल॰ सं॰ चल रहा है। आश्चर्यका विषय है, कि गौड़ाधिप द्वारा प्रवर्तित होनेपर भी गौड़-वङ्गमें किसी समय इस अब्दके प्रचलित रहनेका प्रमाण नहीं मिलता। बोधगयामें खृष्टीय १२वें शताब्दके अक्षरोंसे इस अब्दका अङ्कित एक शिलालेख मिला है—

"श्रीमत् लक्ष्मणसेन-देवपादानामतीत-राजा सं॰ ७४ वैशाख बदी १२, गुरौ।"

उक्त पाठसे कितने ही ऐसा खयाल करते हैं, कि लक्ष्मणसेनदेवका राजा बीत जानेपर यह अब्द प्रचलित हुआ था। ऐसी अवस्था में सन्देह होता, कि गौड़ाधिप वल्लालसेनपुत्र लक्ष्मणसेनसे भिन्न दूसरे किसी राजाके नामानुसार यह अब्द चला है। इस अब्दके आरम्भकालपर भी मतभेद है, यथा—

१। कोलबूक साहब इस अब्दके बारेमें सबसे पहले सर्वसाधारणकी दृष्टि आकर्षण करते हैं। सन् १७९६ ईस्वीकी १७वीं दिसम्बरको ६८२ लं॰ सं॰ चल रहा था।[] उसके अनुसार इस अब्दका आरम्भ काल सन् ११०४ ईस्वी होता है।

२। बुकानन साहबने सन् १८१० ईस्वीमें लिखा, कि उस समय लक्ष्मणाब्दका ७०५—७०६ अङ्क चलता था।[] इस अवस्थामें भी ११०४-११०५ ईस्वीसे लक्ष्मणाब्द प्रारम्भ हुआ। फिर उन्होंने मिथिलाका पञ्चाङ्ग देखकर कहा है, कि ११०८ या ११०९ ईस्वीके बीच में ही इस अब्दका आरम्भ हुआ होगा। उनके मतसे पूर्णिमान्त श्रावण कृष्ण प्रतिपदसे इसका वर्ष लगता है।

३। डाक्टर राजेन्द्रलाल मित्र और जेनरल कनिंहाम् साहबके मतानुसार ११०७—८ ईस्वीके मध्य इस अब्दका आरम्भ और माघ कृष्ण प्रतिपदसे इसका वर्षारम्भ है।

४। अध्यापक कीलहोर्नने सन् ११९४से १५५१ ईस्वीके मध्य लिखे हुए इस अङ्ग द्वारा अङ्कित नाना पुस्तकों और लेखों आदिको आलोचनासे स्थिर किया, कि १०४०-४१ शकके अमान्त कार्तिक मास में इस अब्दका आरम्भ हुआ था।[] आश्चर्यकी बात है, कि अकबरनामामें अबुल्फज़लने भी १०४१ शक अर्थात् १११९ ईस्वीमें ही इस अब्दारम्भके विषय पर अपना मत प्रकाश किया है। गौड़ाधिप सेनवंशके इतिहासको आलोचनासे देखा जाता है, कि १११८-१९ ईस्वीमें वल्लालसेनका राज्य आरम्भ हुआ था। उसी वर्षमें उनका मिथिला-विजय करना और वहां पुत्रके नामानुसार अब्द चलाना कोई विचित्र बात नहीं है। मिन्हाजने अपनी तवकात्टू-नासिरीमें लिखा है, जिस समय लछमनियाकी उमर ८० वर्ष रही, उसी समय (११९८—९९ ईस्वीमें) बख्तियारने नदीया-विजय किया था। मिन्हाजके प्रमाणसे भी १११८—१९ ईस्वीमें ही लक्ष्मणसेनका जन्म पाया गया। अतएव सन् १११८—१९ ईस्वी ही लक्ष्मणके जन्म और लक्ष्मणाब्दका आरम्भकाल होता है। अब बात यह है, कि यदि लक्षणसेनके जन्मसे ही इस अब्दका प्रचार हुआ, तो बोधगयाके कई शिलालेखों में "लक्ष्मणसेनदेवपादानामतीते राज्ये" अथवा "श्रीमत् लक्ष्मणसेनस्यातीतराज्ये" यह उक्ति क्यों?

  1. लघुभारत।
  2. Colebrook's Miscellaneous Essays, Vol. I. p. 472.
  3. Buchanan's Eastern India, III, p. 41 and 139.
  4. Indian Antiquary, XIX; p. 7 ff.