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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/७४२

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अब्दर् रहमान् ख़ान्
दी थी। इनके सुप्रबन्धसे स्पेनमें उमय्यदोंने ढाई शताब्दतक राज्य किया। इनका समय सन् ७५६ से ७८८ ई॰ तक रहा था।

२, यह सन् १६८१ ई॰ के समय दिल्लीमें उत्पन्न हुए थे। इन्होंने पहले सम्राट मुअज्जमशाह और फिर सम्राट् बहादुर शाहका दरबार किया। इनकी कविताका उदाहरणस्वरूप 'यमकशतक' नामक पुस्तक देख पड़ेगा।

अब्दुर्-रहमान् ख़ान्—दोस्त मुहम्मदके नाती और अफज़ल ख़ानके बेटे। सन् १८६३ ई॰ को ९वीं जूनको दोस्त मुहम्मदके मरने पर अफ़ज़ल ख़ान्ने अपने छोटे भाई शेर अलीके अमीर बननेसे उत्तरमें बलवा खड़ा किया था। उसमें अबदुर् रहमान्ने बड़ी योग्यता और साहसका परिचय दिया। अफ़ज़ल अलीके कैद हो जानेपर इन्होंने उत्तरमें फिर उपद्रव उठाया था। सन् १८६६ ई॰ के मार्च मास यह विजयी हो काबुल पहुंचे। इन्होंने शिकोहाबादमें शेर अलीको हरा अपने पिता अफ़ज़लको कैदसे छोड़ा और अमीर बना दिया था। सन् १८६७ ई॰ में यह फिर शेर-अलीसे जीते और कन्धारको अधिकारमुक्त बनाया। किन्तु सन् १८६९ ई॰ के अन्तमें शेर अलीने लौट इन्हें सन् १८६९ ई॰ को ३री जनवरी को परास्त किया था, जिससे यह इरानको भाग खड़े हुए। पीछे इन्हें रूसकी रक्षामें समरकन्द जाना पड़ा। उस समय इनका वयस बीस वत्सरसे अधिक न था।

सन् १८७९ ई॰ में शेर-अलीके मरने और अंगरेजी फ़ौजके अफ़ग़ानस्थान पहुंचने पर रूसियोंने इन्हें फिर अफ़ग़ानस्थान भाग्यकी परीक्षा लेने वापस भेजा था। सन् १८८० ई॰ के मार्च मास अंगरेजोंको इनके उत्तर पहुंचनेका समाचार मिला और उसी वर्षकी २२वीं जुलाईको अंगरेजोंने इन्हें अफ़ग़ानस्थानका अमीर बना दिया। किन्तु शेर-अलीके लड़के याक़ूब ख़ान्ने हेरातसे चढ़ अबदुर्-रहमान्की सेनाको हराया और कन्धारपर अपना अधिकार जमाया था। अबदुर् रहमान्ने फिर सेना एकत्र कर

याक़ूब खान्पर धावा मारा और ऐसा विजय पाया, कि उन्हें ईरान भाग ही जाना पड़ा। कठोर शासनके कारण ग़िलज़ायी जातिने बलवा किया, किन्तु सन् १८८७ ई॰ के अन्तमें गहरी हार खायी थी। याक़ूब खान्के ईरानसे चढ़ दौड़ने और सन् १८८८ ई॰ में इसहाब खान्के बलवा करनेसे कुछ फल न निकला।

सन् १८८५ ई॰ में अफ़ग़ानस्थानको उत्तर-पश्चिम सीमाके निर्धारण पर जब अफ़ग़ानी और रूसी सेनामें झगड़ा हुआ था, तब इन्होंने बड़ी चतुरतासे शान्तिकी रक्षा की। 'आर्डर अवष्टार अव इण्डिया' की उपाधि पा यह अत्यन्त प्रसन्न हुए थे। सन् १८८८ ई॰ के अन्तसे इन्होंने छः महीने उत्तरमें रह बलवा मिटाया। सन् १८९२ ई॰ में ईन्होंने हज़ारा जातिको भी दबा दिया। सन् १८९३ ई॰ में सर हेनरी डूरण्डके काबुल रूसी और अफ़ग़ानी सीमाका निर्धारण करने जानेपर इनका बरताव बड़ी बुद्धिमानी और पटुताका रहा, इन्होंने भारत और अफ़ग़ानस्थानकी सीमा बांधने में कोई झगड़ा न लगाया था।

सन् १९०१ ई॰ को १ली अक्तोबरको इनकी मृत्यु हुई। इन्होंने अपने सिंहासनके प्रतिद्वन्दीका मुंह तोड़ दिया था। किसीमें इनको आज्ञा टालनेकी शक्ति न रही। यह बलपूर्वक फौज भरती करते और भेद ले-लेकर काम चलाते थे। इन्होंने खुली अदालत बैठे लोगोंका आवेदन-निवेदन सुना और अभियोगोंका विचार किया। यह एशियाकी सबसे अधिक बली जातिपर शासन कर और युरोपीय आविष्कारसे लाभ उठा सके थे। किन्तु इन्होंने अपने देशमें रेल-तारको न फैलने दिया। इन्हें भय था,—युरोपीय कहीं हमारे देशमें घुस न आयें। रूसी और भारतीय साम्राज्य के बीच पड़ इन्होंने जिस योग्यताका परिचय पहुंचाया, उससे अफ़ग़ानस्थानके इतिहासमें इनका नाम अजर-अमर रहेगा।

अमीरको प्रति वत्सर बृटिश गवर्नमेण्ट साढ़े अट्ठारह लाख रुपया वृत्ति स्वरूप देती थी। इन्हें युद्ध-सामग्री भी मंगानेका अधिकार रहा। इनके मरने-