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अब्बासौ—अब्विन्दु
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अब्बासी (अ॰ स्त्री॰) कार्पास विशेष, किसी किस्म का कपास। यह मिश्र देशमें उत्पन्न होती है।
अब्भक्ष (सं॰ पु॰) आपो भक्षयति; अप्-भक्ष-ण उप॰ स॰। १ सर्पविशेष, पनिहा सांप। (त्रि॰) २ केवल जलभक्षण करनेवाला, जो सिर्फ पानी ही पीता हो।
अब्भक्षण (सं॰ क्ली॰) पानी पीकर रहनेकी दशा, जिस हालतमें सिर्फ पानी ही पीकर रहें।
अब्भ्र (सं॰ क्ली॰) आपो विभर्ति, भृ-क अथवा अभ्र गतौ अच्। १ मेघ, बादल। २ गगन, आकाश, आसमान्। ३ मुस्ता, मोथा। ४ त्रिदिव। ५ स्वर्ण, सोना। ६ धातुविशेष, अबरक। यास्कने अब्भ्रके ३० पर्याय बताये हैं,—
१ अद्रि, २ ग्रावा, ३ गोत्र, ४ बल, ५ अश्न, ६ पुरुभोजा, ७ बलिशान, ८ अश्मा, ९ पर्वत, १० गिरि, ११ व्रज, १२ चरु, १३ वराह, १४ शम्बर, १५ रौहिण, १६ रैवत, १७ फलिग, १८ उपर, १९ उपल, २० चमस, २१ अहि, २२ अभ्र, २३ बलाहक, २४ मेघ, २५ दृति, २६ ओदन, २७ वृषन्धि, २८ वृत्र, २९ असुर और ३० कोश। अभ्र देखो। अब्भ्रंकष (सं॰ पु॰) १ पर्वत, पहाड़। २ वायु, हवा। (त्रि॰) ३ गगनस्पर्शी, आसमान् छुनेवाला।
अझलिह (सं॰ पु॰) अब्लेढ़ि स्पृशति, अब्भ्रलिह-खस्। १ उच्च शिखर, ऊंची चोटी। २ वायु, हवा। (त्रि॰) ३ गगनस्पर्शी, आसमान छूनेवाला।
अब्भ्रक (सं॰ पु॰) अभ्रधातु, अबरक।
अब्भ्रपिशाच (सं॰ पु॰) राहु। चन्द्रसूर्यको ग्रहणके समय ग्रास करने कारण राहुको अब्भ्रपिशाच कहते हैं।
अब्भ्रपुष्प (सं॰ क्ली॰) १ जल, पानी। २ वेतसवृक्ष, बेंतका पेड़।
अब्भ्रमातङ्ग (सं॰ पु॰) ऐरावत, इन्द्रका हाथी।
अब्भ्रयु (सं॰ स्त्री॰) १ ऐरावत हस्तीकी स्त्री, पूर्वदिग्रहस्तीकी स्त्री।
अब्भ्रयुवल्लभ (सं॰ पु॰) ऐरावत हस्ती।
अब्भ्ररोहस् (सं॰ पु॰) वैदूर्यमणि।
अब्भ्रि (सं॰ स्त्री॰) काठकी कुदाल। इससे नौका दिका मल परिष्कार किया जाता है।
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अब्भ्रिय (सं॰ त्रि॰) मेघभव, आकाशीय, बादलसे पैदा, आसमानी।
अबभ्रोत्थ (सं॰ क्ली॰) १ वज्र, विद्युत्, बिजली। (त्रि॰)२ अनजात, बादलसे पैदा।
अब्र (फ़ा॰ पु॰) मेघ, बादल।
अब्रह्मचर्य (सं॰ क्ली॰) न ब्रह्मचर्यम्, विरोधे नञ्-तत्। १ मैथुनादि, ब्रह्मचर्यका विरोधी कार्य। (त्रि॰) नज-बहुव्री॰। २ ब्रह्मचर्यरहित।
अब्रह्मचर्यक (सं॰ क्ली॰) ब्रह्मचयराहित्य, लोलुपता, लम्पटता, नफ् सपरस्ती, नापाकदामानी, छिनारा।
अब्रह्मण्य (सं॰ क्ली॰) ब्रह्मणि ब्राह्मणोचितकर्मणि अहिंसादौ साधु यत् विरोधे नत्र-तत्। ब्राह्मण-विरुद्ध कार्य, जो काम ब्राह्मणके करने क़ाबिल न हो।
अब्रह्मता (सं॰ स्त्री॰) योग अथवा विशुद्ध ईश्वरज्ञानका अभाव, जिस हालतमें इबादत न बने या परमेश्वर समझ न पड़े।
अब्रह्मन् (वै॰ त्रि॰) १ साधन-भजनविहीन, ज्ञानशून्य, जो पूजापाठ न करता हो, जिसे समझ न रहे। २ ब्राह्मण भिन्न, जो ब्राह्मण न हो।
अब्रह्मविद् (सं॰ त्रि॰) ब्रह्मको न पहचाननेवाला, जिसे ब्रह्मज्ञान न रहे।
अब्राह्मण (सं॰ पु॰) न ब्राह्मणः, अप्राशस्तय नञ्-तत्। अपकृष्ट ब्राह्मण, जो ब्राह्मण विशुद्ध न हो। शास्त्रमें छः प्रकारका अब्राह्मण बताया गया है,— १ राजाके अन्नसे पालित, २ बाणिज्य करनेवाला, ३ बहुयाजक, ४ ग्रामयाजक, ५ कार्यविशेषमें ग्राम्य वा नागरिक सकल लोगोंसे वरण किया जानेवाला और ६ सन्ध्यावन्दनादि न करनेवाला।
अब्राह्मण्य (सं॰ क्ली॰) पवित्रताका नाश, ब्राह्मणके कामकी खराबी।
अब्रुवत् (सं॰ त्रि॰) न बोलनेवाला, जो बात न कह रहा हो।
अब्रूकृत (सं॰ क्ली॰) न ब्रूवे कृतम्। १ वाक्य-प्रति-रोधक, गुराहट। २ बोलीका धुंधलापन।
अब् लिङ्ग (सं॰ स्त्री॰) जलार्थं पठित सूक्तविशेष।
अब् विन्दु (सं॰ पु॰) अश्रु, आंसू।
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