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पदार्थवादी नहीं, अर्थात् सात प्रकारके पदार्थ स्वीकार करते हैं। अभावको पदार्थसे अलग समझनेपर, 'घट नहीं हैं' यह प्रतीति और किसीतरह नहीं हो सकती। इसीसे आधुनिक पण्डित अभावको पदार्थ कहते हैं। मीमांसक लोगोंने अभावको अधिकरण स्वरूप माना है। बौद्धोंका मत दूसरा है। वह अभावको शून्य, आकाश, निरावरण वा निरुपाख्य रूपमें व्यवहार करते हैं। गीताके मतसे जी नहीं, वह कभी है ही नहीं। फिर जो वस्तु है, उसका अभाव कभी नहीं होता। अर्थात् इस समय जो जीवादि रहते, महाप्रलयकाल वह सब परमेश्वरमें लीन हो जाते हैं। पीछे महाप्रलयका अन्त हो जानेपर वह फिर जीवरूपसे प्रकट होते हैं। एवं इस समय जो सब वस्तु स्थूल रूपमें देखी पड़तीं, कालक्रमसे उनका नाश हो जाने पर वह परमाणुरूप में परिणत होती हैं। इसके बाद फिर वही सब समय विशेषमें स्थूल रूपधारण करती हैं। न्यायादिके मतसे अभाव प्रथमतः दो भागों में विभक्त हुआ है। यथा—संसर्गाभाव और अन्योन्याभाव। फिर संसर्गाभाव एवं ध्वंसाभाव, प्रागभाव और अत्यन्ताभाव इन तीन भागोंमें इसे विभक्त करते हैं। सांख्यके मतसे प्रागभाव उत्पत्तिके पूर्वस्थित कारणका सूक्ष्मावस्थाविशेष है। उत्पत्तिको आविर्भाव और ध्वंसको तिरीभाव कहते हैं। अभाव शब्दसे मरण भी समझा जाता है। (त्रि॰)२ अलङ्कारशास्त्रके मतसे, रत्यादि स्थायि भावशून्य, अनुरागरहित। नास्ति भावः सत्व यस्य, नञ्-बहुव्री॰। ३ मिथ्याभूत। मीमांसक प्रभृति अभाववाले ग्राहकयोगा विषयको अनुपलब्धिरूप प्रमाणविशेष समझते हैं। |
अभावना (सं॰ स्त्री॰) १ विचारका अभाव, तजवीज़का न निकलना। २ ध्यानकी शून्यता, मज़हबी ख्यालकी गफलत।
अभावनीय (स॰ वि॰) भू-णिच्-अनीयर्, नञ्-तत्। अचिन्तनीय, अनुत्पादनीय, फ़िक्र न करने काबिल, जिसे सोच न सकें।
अभावपदार्थ (स॰ पु॰) भावरहित वस्तु, मतलबसे खाली चीज़।
अभावप्रमाण (सं॰ क्ली) भावरहित प्रमाण, जिस सुबूतका कुछ ठिकाना न लगे। कोई-कोई न्यायाचार्य कारणके अभावमें भी कार्यको प्रमाणित करते हैं। गौतम अभावप्रमाणको न मानते थे।
अभावयितृ (सं॰ त्रि॰) न समझते हुआ, जिसको ख्याल न रहता हो, हवाला न देने वाला।
अभावसम्पत्ति (सं॰ स्त्री॰) अभावस्य मिथ्याभूतस्य सम्पत्तिः, ६-तत्। मिथ्याभूत पदार्थज्ञान, अध्यास। शुक्तिको देखनेसे जा रजतभ्रम उठता, उसी ही ज्ञानको अभावसम्पत्ति कहते हैं। अध्यास शब्दमें विवरण देखो।
अभावित (सं॰ त्रि॰) भावना न किया गया, जो ख्यालमें न आया हो।
अभाविन् (सं॰ त्रि॰) न होनेवाला जो न होता हो। अभावी, अभाविन् देखो।
अभाषण (सं॰ क्ली॰) अभावे नञ्-तत्। भाषणाभाव, मौनभाव, न बोलनेकी हालत, खमोशी।
अभास (हिं॰) आभास देखो।
अभि (सं॰ अव्य॰) न भाति स्वयं शब्दान्तरयोगं विना, बाहुलकात् कि। १ को, तयों, तर्फ़, सामने। २ में, भीतर। ३ वास्ते, लिये। ४ से, कारणवश। ५ पर, ऊपर, बाबत। ६ पास, नजदीक, रूबरू। गणरत्नमें अभिके नौ अर्थ लिखे हैं,—१ पूजा, २ भृशार्थ (अतिशयार्थ), ३ इच्छा, ४ सौम्य (माधुर्य), ५ आभिमुख्य, ६ सौरूप्य (सुरूपता), ७ वचन, ८ आहार, ८ स्वाध्याय। उदाहरण नीचे देते हैं,—
पूजा—'त्वामहमभिवन्दे'—मैं आपको वन्दना करता हूं। भृशार्थ—'परद्रव्येष्वभिध्यानम्'—परके द्रव्यका अतिशय |
पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/७५४
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अभाव—अभि