पादनार्थ चार आचरणं। अभि-चर-भावे घञ्। हिंसा, हनन। पहले अथर्ववेदोक्त मारण उच्चाटन आदि अभिचार एवं मूल कर्म प्रभृति नाना प्रकारकी क्रिया सम्पन्न की जाती थी।
तन्त्रमें छः प्रकारके अभिचारका उल्लेख है। यथा— १ मारण, २ मोहन, ३ स्तम्भन, ४ विद्वेषण, ५ उच्चाटन, ६ वशीकरण। १ मारण—क्रियादिद्वारा किसीका प्राणनाश करना। २ मोहन—किसीके मनको मोह लेना। पहले राजसभा आदि स्थानोंमें जाते समय कोई-कोई मनुष्य इसी क्रियाका अनुष्ठान करते थे। पहले लोगोंको ऐसा विश्वास था, कि मालिक उससे मुग्ध होकर उनपर प्रसन्न होंगे। ३ स्तम्भन—मन्त्रद्वारा अस्त्र, अग्नि आदिकी शक्तिका नाश करना। पहले लोगोंको विश्वास था, कि ऐसे मन्त्र और औषध आदि वर्तमान रहे, जिनसे शरीरमें अस्त्रका घाव न लग सकता और आग डालनेसे भी जल न सकती थी। ४ विद्वेषण—दो मनुष्यों में अधिक प्रीति रहते विशेष क्रियादि द्वारा उनके मनमें भेद डाल विरोध खड़ा कर देना। ५ उच्चाटन—मनको चञ्चल या उन्मत्त बनाना। ६ वशीकरण—किसी स्त्री आदिको वशीभूत कर लेना। १ मारण—पहले अनेक प्रकारसे मारण किया जाता था। अब भी कहीं-कहीं यह काम होता है। तन्त्रसारके मतसे मारणक्रिया इस तरह सम्पन्न की जाती है— पहले नियमके अनुसार देवीको पूजा होम आदि करना चाहिये। उसके बाद जिस शव को मारना हो, उसका नाम लेकर खड्न अभिमन्त्रित करना आवश्यक है। ओम् विरुद्वे रुपिणि चण्डिके वैरिणममुकं देहि देहि स्वाहा। फिर एक बकरा ले—छागादिकममुन्नोसि। इस तरह शत्रु का नाम निकाल अभिमन्त्रित करना चाहिये। यह प्रकरण समाप्त हो जानेपर बकरेके मुंहपर तीन जगह लाल सूत बांध शत्रु का नाम ले प्राणप्रतिष्ठा करना पड़ता है। उसका मन्त्र यह है,— ओम् अयं स वैरी यो द्वेष्टि तमिमं पशुरुपिणं।
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यो मन्त्र पढ़ बकरके शिरपर फूल चढ़ा उसकी पूजा करना और वलिमन्त्र पढ़ना चाहिये। फिर यह मन्त्र पढ़कर वलिको उत्सर्ग करना पड़ता है,—अद्याश्विने मासि महानवम्यां अमुकगोत्रोऽमुकदेवशर्मा अमुकशत्रु नाशाय इमं छागं अमुक दैवतं भगवत्यै दुर्गायै तुभ्यमहं सम्प्रददे। उसके बाद, आँ क्रूं फट्—यह मन्त्र पढ़कर वलिको काट डालना चाहिये। एतदुधिरं दुर्गायै नमः,—यह कर रक्त और मस्तक देते हैं। अन्तमें मूलमन्त्र पढ़ अष्टाङ्गके मांससे होम करनेपर उसी क्षण शत्र का प्राण नष्ट हो जाता है। तान्त्रिक लोग अब भी मारणादि अभिचार करते हैं। कहते हैं, कि शतभिषा नक्षत्रको अधीरातके समय जलमें डुब्बो मार और शत्रुका नाम लेकर सरौतेसे एक ही बार एक सुपारी काट डालनेपर शत्रु का प्राण नष्ट हो जाता है। हमने वृद्ध लोगोंसे सुना है, पहले जो मारणादि अभिचार क्रिया करते, उन लोगोंको राजा और ज़मीन्दार दण्ड देते थे। २ मोहन—तान्त्रिक होम, मन्त्र और औषधादिद्वारा लोगोंको मुग्ध कर लेते हैं। कहते, सधवा स्त्रीका चिताभस्म, सुरत और अगुरु-चन्दन एकसाथ मिलाकर बायें हाथकी प्रदेशिनी वा कनिष्ठा अङ्गुलीसे कपालमें विन्दी लगा देनेपर उसे देख सभी मुग्ध हो जाते हैं। ३ स्तम्भन—पूर्वकाल तान्त्रिक लोग नानाप्रकारकी चतुराईसे किसीका वाक्स्तम्भन, किसीका हस्तादि स्तम्भन, शत्रु की सेनाका आगमन स्तम्भन आदि अभिचार करते थे। अम्निस्तम्भनकी प्रक्रिया इस तरह प्रसिद्ध है, बेलका आटा और जोंक दोनोंको एकसाथ पीसकर हाथमें लगा लेनेसे अग्निस्तम्भन होता है। तान्त्रिकोंके मतसे शीतकालमें स्तम्भन अभिचार करना श्रेष्ठ है। ४ विद्वेषण—यह क्रिया ग्रीष्मकालमें पूर्णिमा तिथिको दोपहरके समय की जाती है। जिन लोगों में विद्वेष उत्पन्न करना हो, भैंसका गोबर और घोड़ेकी लीद गोमूत्रमें मिलाकर उसीसे उन लोगोंका नाम लिखनेपर शीघ्र ही विरोध उठ खड़ा होता है। |
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अभिचार