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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/७६

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अक्षरलिपि



उनका जन्म पूर्वकालमें प्रबल हो असुरोय, मिदीयप्रभृति पुराने राज्य जीते। भविष्यपुराणके मतसे ऋजिया नामके मिरिगो में एक ऋषि हुए थे।[१]}} उन्हींको कन्याके गर्भ जरशस्त्र ( जरथुस्त्रका) जन्म है। ठीक वैधरूपसे न होनेके कारण वह और उनके वंशधर पुराणमतसे 'अग्निजात्य'[२]}}और उनका पिटकुल अज्ञात रहनेके कारण हेरोदोतसने उनके वंशधरोंको मातृकुलके अरिअस्प या आर्जव (अर्थात् ऋजिवा- के गोवापत्य) बताकर ही प्रकाशित किया।

लिदियाके प्रसिद्ध यूनानो पण्डित जानथोस् सन् ई० से ४०० वर्ष पहले ही लिख गये हैं, कि जरथुस्त्र झ्य इसे कोई ६०० वर्ष पहले आविर्भूत हुए थे। परिचय और इउडोक्सास के मतानुसार प्लेटोसे ६००० वर्ष पहले जर मुखका अभ्युदय हुआ था। फिर प्रसिद्ध ऐतिहासिक झिनिने द्रय-युद्ध से ५००० हज़ार वर्ष पहले जरथुस्त्रका आविर्भाव माना। इधर बाबिलोन के ऐतिहासिक बेरोसस्ने लिखा है, कि जरथुस्त्र किसी समय वाविलोनके अधोम्बर थे; उनके वंशधरोंने यहां सन् ई०के २२०० वर्ष पहलेसे २००० वर्ष पहले तक अधिपत्य किया था।[३]}} पूर्वोक्त नाना ऐतिहासिकको प्रमाणावलीसे देखते हैं कि पूर्वकालमें कई जरथुस्त हुए थे। जरथुस्त्रके वंशधर भी जरथुस्त्र के नामसे परिचय देते रहे । चार हज़ार वर्ष से भी बहुत पहले उनका अभ्युदय हुआ था । उन्हींके प्रभावसे शकोंके आदि मित्र-धका अधःपतन हुआ, और अग्निपूजा हो सर्व्वत्र प्रचलित हुई। पहले ही इस बातका आभास दे


  1. ↑ "गीव' मिहिरमित्याह व्रतं तु ब्राह्ममुत्तमम् ।
    ऋजिचा नाम धर्मात्मा ऋषिरासीत् पुरानघ
  2. ↑ "वेदोक्त' विधिमुत्सृज्य यथीहं लङ्घितस्तया ।
    तस्मात् भगः समुत्पन्नस्तव पुत्रो भविष्यति ॥
    जरशस्त्र इति ख्याती वंशकीविवर्तन:। ।"
    अग्निजात्या मगा प्रोक्ता सोमजात्या द्विजातयः ॥ (भविष्य १२२००२ - ० )
  3. ↑ “एभिर्दशन्ति भूयिष्ठं तस्मिन् दीपे भगाधिपाः ।
    विद्यानन्तशीचाचारसमन्विताः । (१०००)

भविष्यपुराचसे भी मालूम होता है, कि शाकदीप मन आधिपत्य करते थे-

दिया गया है, कि मग विपरीत भावसे पढ़ते थे। भविष्यपुराण में लिखा है-

'विपरीत क्रममे वेदाध्ययन करनेके कारण इनका नाम 'मग' पड़ा था। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद जैसे ब्राह्मणोंके चार वेद है, वैसेही मगोंक भी इनसे विपरीत चार वेद हैं, जो विद, विश्वरद (या विस्परद), विदाद और आङ्गिरस् नामसे पुकारे जाते हैं।'[१]}}

भविष्यपुराणको इस युक्तिसे भलीभांति समझ पड़ता है, कि भारतके चार वेद जैसे वामसे दक्षिणको यानी ब्राह्रीलिपिसे लिखे जाते थे, वेमही शाकद्वीपीय मग अपने आदि ग्रन्थ ब्राह्मी लिपिके विपरोत भावसे यानी दाहनी ओरसे बाई ओरको पढ़ते और लिखते थे। इसी पाठविपर्ययसे उनका नाम 'मग' पड़ा। यह 'मग' नाम अवस्ताके प्राचीनांश गाथमं भी मिला है। ऐसे स्थलमें इसमें सन्देह नहीं, कि ४।५ हज़ार वर्ष पहले विपर्यस्तलिपि या खरोष्ठौकी उत्पत्ति हुई थी। प्राचीनतर ऐतिहासिक और इस देश के पौरा णिक प्रायः सभी इस बातका आभास दे गये हैं, कि ४५ हजार वर्ष पहले शाकद्वीप में बाबिलोन, यहां


  1. ↑ * "विपय्यस्तो न वेदन मगा गायन्तातो मगाः । ऋग्वेदीय बहुर्वेदः सामवेदस्वथर्थवण ।। ब्रह्मणोक्ता तथा वेदा मगानामपि मन्त्रत ॥ तद विपरीतास्तु तेषां वेदाः प्रकीर्त्तिताः । " (भविष्य १४० अ० )

भविष्यपुराणका प्रमाण देख कोई उसे आधुनिक न समझे बम्बई- से प्रकाशित भविष्यपुराणवाल 'ब्राह्मपथ' सिवा मी पानिक सम झनेके लिये यथेष्ट कारण रहते भी इसमें संदेह है कि ब्राह्मपर्व बहुत पुराना है। यहां तक, किं आपस्तम्बधसूत्र (२|२४|५६) में इस भविष्यत्पुराण- का उल्ले ख रहा है। यह धर्म सूत्र अध्यापक बृहलर भतानुसार अन्ततः सन् ई० से पहलेके ५वें शताब्दका है । इस ग्रन्थ में बुद्धप्रभावका निदर्शन न रहने से इसे हम सन् ई०से पहले से ६ ठे शताब्दका भी पूर्ववर्ती ख्याल करते हैं। इससे भी पहले मूल भविष्य पुराण लिखा गया था

पूतन यूनानी ऐतिहासिकको वर्णना अनुसार वर्तमान युरोपीय पुराविदोंने फिर किया है, कि वर्तमान तातार एशियारिया मस्कोबी, क्रिमिया), पोलेख, हुङ्गे रियाका कितना ही अंश. लिथुनिया, जम नौका उत्तरांश, खीडेन, नारवे प्रभृति स्थानों तक पुराना स्किदिया या शाकद्दौप विस्तृत था [ वर जातीय इतिहास, ब्राह्मण काण्ड, ४ घांश ६-९ पृष्ठ द्रष्टव्य हैं ]।