नाम, खिताब। २ शब्दनिष्ठ अर्थबोधजनक शक्ति विशेष, लफ़ज़की हरफ़ी ताक़त। अभिधीयते अनेन, करणे अङ्। ३ वाचक शब्द, लफ़्ज़, आवाज़। ४ भट्टमतसे–फलजनक व्यापाररूप शब्दनिष्ठ भावना-विशेष। ५ अलङ्कारशास्त्रके मतमें-साङ्केतिक अर्थ बतानेवाली शब्दकी शक्ति।
"तव सङ्केतितार्थस्य बोधनादग्रिमाभिधा।" (साहित्यदर्पण) अभिधातव्य (सं॰ त्रि॰) कहा या नाम लिया जानेवाला, जो ज़ाहिर करनेको हो।
अभिधांवसिन् (सं॰ त्रि॰) अपना नाम खोनेवाला, जो अपनी शोहरत जाया कर रहा हो।
अभिधान (सं॰ क्ली॰) अभिधा भावे लुट्। १कथन, बातचीत। अभिधीयते कथ्यते अनेन करणे लुपट्। २ नाम, ध्वनि, निर्घोष। ३ शब्दार्थ प्रकाश-करनेवाला ग्रन्थविशेष।
संस्कृत भाषामें अनेक अभिधान चलते हैं। किन्तु उनमें कुछ पुस्तकोंका ही अधिक आदर है। अमरसिंह-विरचित नानार्थवगैयुक्त नामलिङ्गानुशासन है, यह पुस्तक सचराचर अमरकोषके नामसे प्रसिद्ध है। महेश्वर-विरचित विश्वप्रकाश, हेमचन्द्र-विरचित अभिधात्नचिन्तामणि, हलायुध-प्रणीत अभिधानरत्नमाला, पुरुषोत्तमदेव-विरचित त्रिकाण्डशेष एवं हारावली, मेदिनीकर प्रणीत नानार्थशब्दकोष, और केशवरचित कल्पद्रुनाममाला, धरणीकोष, अनेकार्थध्वनि मञ्जरी, मातृकानिघण्टु, शाश्वत, बहुरचित एकाक्षरकोष, महादेवप्रणीत अव्ययकोष, रामशर्मक्वत उणादिकोष और शब्दार्णव प्रभृति बहु-अभिधान है। इन सब अभिधानों में अमरकोष ही अधिक प्राचीन है। इसकी रचना महाराज विक्रमादित्यके सभासद अमरसिंहने की थी। इतिहासमें एकाधिक्य विक्रमादित्यका नाम मिलता है। उनमें जिनके नामसे संवत् चला, वही प्रथम रहे। सन् ई॰ के पञ्चम और एकादश शताब्द दूसरे भी दो विक्रमादित्य हुये थे। यह बात कहना कठिन है, कि अमरसिंह कौनसे विक्रमादित्यकी सभामें रहे। अमर बौद्ध थे। प्रवाद है, कि उनके रचे हुए अनेक काव्य भी रहे। खृष्टीय |
पांचवें शताब्दमें प्रबल हो उठनेपर ब्राह्मणोंने सब बौद्ध पुस्तकोंको जला दिया था। उस समय केवल अभिधान ही बच गया। अमरकोष तीन खण्डोंमें विभक्त है, इसीसे कोई कोई इसे त्रिकाण्ड भी कहते हैं। इस पुस्तकमें प्रायः दश हज़ार शब्द हैं। नानार्थ प्रकरणमें शब्दोंके स्थापनका कोई नियम नहीं; केवल अन्तवर्णसे ग्रथित हुआ है। इसके आनुकूल्य लिङ्ग और शब्दका अर्थबोध होता है। किन्तु हमारे देशमें पहले आद्यवर्णानुक्रमसे अभिधानकी रचना को न जाती, इसीसे कोई शब्द निकालने में बहुत कष्ट होता था। इसके अतिरिक्त दूसरा भी एक दोष है। अनेक स्थलोंपर एक एक चरणमें पृथक् पृथक् शब्द और उनके अर्थ लिखे हैं, अतएव किस शब्दका क्या अर्थ है, यह भी समझनेके लिये कुछ विवेचना रखना चाहिये।
विश्वप्रकाश पुस्तक सचराचर केवल "विश्व" नामसे प्रसिद्ध है। महेश्वर खृष्टीय बारहवीं शताब्दी में जीवित थे। विश्वप्रकाशमें एक अक्षर, दो अक्षर, तीन अक्षर इत्यादि प्रणालीसे शब्द ग्रथित हुए हैं। अन्त्य प्रत्ययानुसार इन शब्दोंके स्थापनको दूसरी भी प्रणाली देखी जाती है। जो हो, इच्छा होने पर कोई शब्द ढूंढ़ निकालना सहज नही है। हेमचन्द्र भी खृष्टीय बारहवीं शताब्दीमें महेश्वरके बाद प्रादुर्भूत हुए थे। अनेक स्थलों में हेमचन्द्रने महेश्वरकी प्रणालीके अनुसार ही शब्द संग्रह किये हैं। अभिधानरत्नमालाप्रणेता हलायुध गौड़के राजा लक्ष्मणसेनकी सभामें विद्यमान थे। इसका परिचय उन्होंने आप ही ब्राह्मणसर्वस्वके प्रारम्भमें दे दिया है। पुरुषोत्तमदेव खृष्टीय तेरहवीं शताब्दी में जीवित थे। उनका रचा हुआ त्रिकाण्डशेष अमरसिंहके अभिधानका परिशिष्ट मात्र है। यह अमरकोषकी प्रणालीसे ही सङ्कलित हुआ है। जो सब शब्द सचराचर और कहीं नहीं देखे जाते, उनमें कुछ-कुछ पुरुषोत्तमके त्रिकाण्डशेष-संग्रहमें मिलते हैं। मेदिनीकर खृष्टीय पन्द्रहवीं शताब्दीमें प्रादुर्भूत हुए थे। इनके शब्द सङ्कलनकी प्रणाली कुछ विश्व- |
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अभिधातव्य—अभिधान