सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/८४

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
८०
अक्षरलिपि



सम्पूर्ण विपरीत यानी वर्त्तमान अरबी या फ़ारसी- की तरह दाहनेसे बायेंको है । इस शब्द लिपि- में पांच स्वराक्षरके चिह्न हैं, किन्तु ह्रस्व या दीर्घ स्वरके पार्थक्य निर्णयको सुविधा और व्यञ्जन अक्षरों में जिह्वामूलीय, तालव्य या अनुनासिकादियोंके उच्चारण- निर्धारणका उपाय नहीं है ।

पाश्चात्य 'अक्षरमालाकी उत्पत्ति ।

गंभीर गवेषणा के साथ साइप्रीय अक्षरमालाको आलोचना करते-करते स्वतः मनमें अक्षरमालाका उत्पत्ति-प्रसङ्ग आकर समुदित होता है। पाश्चात्य पण्डितोंको विश्वास है, कि यह अक्षरमाला, फिनिसिया और यूनानसे पहले भूमध्यसागरोपकूलवर्त्ती देशीं और पीछे वहांसे दूरवर्ती जनपद समूहों में परि व्याप्त हुई थी। सन् १८५६ ई० के समय इमानुएल डिरूजने Academie des Inscriptions सभामें लिपितत्त्वका जो अभिमत प्रकाशित किया, उसमें उन्होंने मिश्र वाली हायरोग्लिफिक या चित्रलिपिकी अभिशप्त या कुत्सित आकृतिसे ही फणिक् अक्षर- मालाको उत्पत्ति मानी है । वह इन दोनो अक्षर- 'मालाओंके सामञ्जस्य - साधनकालमें उभय भाषागत कितने ही अक्षरोंका अपूर्व वैषम्य अवधारित कर गये हैं। सन् १८७७ ई० में अध्यापक डिके (Deecke) ने इमानुएल रूजका मत काटकर कहा था, कि 'अपेक्षाकृत परवर्त्ति कालको विकृत असुरीय कील- लिपिसे सेमेटिक अक्षरमालाको उत्पत्ति है और फणिक् भाषा भी उसी असुरीय अक्षरमालाके निकट ऋणी है। किन्तु इस विषय में प्रमाणका अभाव है। यदि प्रमाण मिले, तो अवश्य ही स्वीकार करना पड़ेगा, कि फणिक् अक्षरमालाको वर्त्तमान निर्धारित युगको अपेक्षा और भी सहस्राधिक 'वर्षकी प्राचोन बताकर ग्रहण करना और अक्षर माला के इतिहासमें कोई युगान्तर साधित होगा ।

फिर, मिश्रके ध्वस्तस्तूपोंको ढूंढते ढूंढते अध्यापक फिण्डार्स पिटीर्ने सन् १९०० ई० में आबिडोस् नगर वाले राजसमाधिस्तम्भके बीच जो लिपि (Sym " bols like alphabetic characters) उत्कीण देखी

जाती, वह प्राचीन हायरोग्लिफिक् और चिह्न लिपिके संयोगसे उत्पन्न है। मिश्र राज्यवाले इतिहासोक्त प्रथम राजवंशके राजत्वकाल से भी पहले या सन् ई० के. ६००० से १२०० वर्ष पहले तक यह चिह्न लिपि अबाध रूपसे मिश्र राज्य में प्रचलित रहो । सन् ई० से पहलेके ८वें शताब्दी से पूर्व्वयुग के उत्कीर्ण क्रीटदीप वाले शिलाफलक में भी इस चित्रलिपिका निदर्शन विद्यमान है। इसके द्वारा भी परवर्त्ती मिश्रभाषाको वर्ण मालासे फिनिकों द्वारा वर्ण लिपिकी परिपुष्टि सम्बन्धीय पूर्व्वसिद्धान्तित मौमांसा हो अप्रतिपन्न होती है।

सन् १८०० ई०में क्रौट द्वीपवाले भूगर्भके भीतर मिष्टर इभान्सने जो सकल लिपिपूर्ण मृत्फलक पाये थे, उनको लिपि मिश्रको चित्रलिपिके अनुरूप ही है । उसके ८२ चित्रोंमें ६ मनुष्य या उनको प्रतिकृति ; १७ अस्त्राकृति यन्त्र और बाजे, गृह, गृहांश या रन्धनके पात्रादि ; ३ सामुद्रिक जोव-चित्र ; १७ पशु और पक्षोमूर्त्ति ; ८ वृक्ष और गुल्मादि ६ ग्रह- नक्षत्रादि ; एक भौगोलक चित्र ; ८ ज्यामितिमूलक चित्र और १२ दूसरे चिह्न थे । आज भी आविष्कृत नहीं हुआ, कि यह बारह कौन अक्षर थे । साधारण लोगोंको धारणा है, कि नोसस (Knosss) वाले सुविख्यात प्रासादके ध्वस्तस्तूपमें जो फलक मिला, वह माइकिनि द्वीप के आदिम अधिवासियोंका खोदा है ।

इभान्सको इस मृत्फलकके पढ़नेसे समझ पड़ा, कि यहांके अधिवासी माइकिनिवाले विजेटदलके अधीन रहे थे । माइकिनोयोंके यहां नवागत होते भी, उनकी लिपि अपेक्षाकृत प्राचीन थी । क्योंकि आज भी आविडास्से निकले फलकमें माइकिनोय लिपिको जो प्रतिकृति विद्यमान है, वह, इसमें सन्देह नहीं कि, मिश्रवाले प्रथम राजवंशके पूर्व्ववर्त्ती समयको मृत्पात्रस्थ चित्रलिपिसे पुरानी नहीं तो, उसकी समसामयिक है हो । यह अभी सुस्पष्ट रूप से समझ नहीं पड़ा है, कि इस लिपि-प्रथाके वर्ण आक्षरिक "या शाब्दिक हैं।

एक समय इस द्वीप से भ्यतास्रोत कारिया और