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प्रदत्त और मिश्रकी सङ्केतलिपिमें जो सब मौलिक वस्तुओंके चित्र उद्घटित हुए हैं, उन दोनोके बीचमें कोई सम्बन्ध नहीं। हिब्रू "अलिफ़" जैसा फनिक अक्षरमालाका जो तुल्य आद्यक्षर है, उसके साथ वृषमुण्डका काल्पनिक सादृश्य है और द्वितीय हिब्रू अक्षर "बेथ्"के साथ भी एक चतुरसभवनका मौसा-दृश्य देख पड़ता है। किन्तु वस्तुतः वृषमुखाकृति, इस फनिक अक्षरके शीघ्र-शीघ्र लिखे जानेपर वृषमुखके बदले गृध्रपक्षीके गरदन जैसी होते आई और इसी तरह द्रुत प्रणालीसे 'बेथ्' अक्षर भी बगुलेकी तरह वक्रग्रीव हो गया। इससे पाश्चात्य पण्डित अनुमान करते हैं, कि फनिकोंने चिह्न और शब्द या स्वरमात्रको ग्रहण किया था, किन्तु उन्होंने अक्षरका नाम ग्रहण न किया। यह, लिपिचित्र और फलकादिको निरीक्षण करनेसे ही सुस्पष्ट प्रतिभात होगा, कि परवर्त्तिकालमें फनिकोंके द्वारा फनिक अक्षरमालाकी कहांतक पुष्टि साधित हुई। उत्तर-इजिपृके आबुसिम्बेल नगरस्थ सुबृहत् प्रतिमूर्त्तिसमूहके पादमूलमें समेतिकासके वेतनभोगी यूनानी, कोरिया और फनिक सेनादलने अपनी-अपनी जातीय भाषामें अपना-अपना नाम अङ्कित कर दिया था। इसके बाद सन् ई॰ से पहले-वाले ३ रे शताब्दके समय बाइव्लोसकी ष्टेली, एसमाञ्जारके प्रस्तर निर्मित शवाधार, कार्थेजके ध्वस्तस्तप और प्राचीन सिडोन् उपनिवेशमें जिन सब लिपियोंके जो सब फलक पाये गये, वाह्य आकृतिकमें वह प्रायः एक रूप हैं; और उनके सभी विषयोंमें अति सामान्य प्रभेद देख पड़ता है। इन सकल शिला या मृत्फलकोंमें जो सकल अक्षर व्यवहृत हुए हैं, वह पूर्ववर्त्ती या आक्षरिक लिपिचिह्ना-पेक्षा ढालू और लम्बे हैं। इसलिये भली भांति समझ पड़ता है, कि यह लिपिप्रणाली उस समय शिलाफ-लकके बदले वाणिज्यकार्य्यके उपयोगी हो गई थी। कारण, वाणिज्यकी व्यस्ततासे लिखना कुछ द्रुत और ढालू हो ही जाता है। पत्थरपर खोदनेके लिये मोटे-मोटे अक्षर आवश्यक होते हैं। जब फनिक अक्षरमाला पाश्चात्य भूखण्डके बीच |
अपनी अङ्गोभ्दूत अक्षरलिपिकी परिपुष्टि और उसके उत्कर्ष साधनमें तत्पर थी, ठीक उसी ही समय प्राच्य जनपद-समूहमें ममसोतमे अक्षरमाला और लिपिप्रचार कार्य्य चल रहा था। पाश्चात्य पण्डितोंका विश्वास है, कि पूर्व्व खण्डमें सेमेटिक जातिने ही सबसे पहले कई असभवर्णीय चिह्न ले भाषालिपिकी प्रतिष्ठाकी थी, जहांसे वह क्रमश: दूरदेशमें विस्तृत हुई। किन्तु पूर्वापर आलोचना करनेसे भली भांति समझ पड़ता है, कि यह बात कहां तक युक्तियुक्त है। ग्लेसारने जिन स्तम्भोंको अरब देशमें आविष्कार किया था, उनमेंसे किसी-किसीकी लिपि सन् ई॰ से पहलेके १५ वें शताब्दसे भी पुरानी है। इसलिये यदि उससे
अक्षरमालाकी उत्पत्ति और उसका प्रचार स्वीकार-कर लिया जाय, तो पूर्वमीमांमित लिपितत्त्वकी भित्ति और भी प्राचीन युगमें जाकर खड़ी हो जाती है। इसके बाद सन् ई॰ से पहलेके ७ वें शताब्दवाले पुराने कई एक सेमेटिक लिपिके निदर्शन मिले। होजकीयके राजत्त्वकालभें मोआबाइट पत्थर और सिलोयमके तालाबकी सुरङ्गके बीच मिली हुई हिब्रू-लिपि और बललेबानोनकी पात्रस्थ-लिपिमें फनिक चिह्नके सेमेटिक अक्षरकी लिपि विद्यमान है। सिवा इसके लाफिस् और अन्यान्य नगरोंमें प्राप्त मृत्पात्रादिमें जो सब हिब्रू-अक्षर, चिह्न और हिब्रू-शिलालिपि मिली, वह भी वैसी ही प्राचीन मानी जाती है। फनिकोंकी भांति यह हिब्रू-चिह्न भी विशेष वक्राकृति हैं। यहूदी लोग निर्व्वासनके पीछे क्रम-क्रमसे अरमीय लिपिका अभ्यास करते रहे थे। उसीसे ही क्रमशः चतुष्कोण हिब्रू लिपि उत्पन्न हुई। एक मात्र सामारिटान् जातिने ही उस प्राचीन और वक्राकृति हिब्रूलिपिका आश्रय लिया था; इसीसे उस जातिवाले अपनेको प्रकृत हिब्रू बता गौरव दिखाया करते हैं। अरमीय लिपिका प्राचीनतम निदर्शन सिरिया राज्यके अन्तर्गत सिन्दजिल नगरमें मिला, जो फलकपर सन् ई॰ से कोई ७०० वर्ष पहले खोदी गई थी। इस अरमीय लिपिके साथ पूर्वोक्त मोआबाइट प्रस्तरलिपिका वैसा पार्थक्य विशेष नहीं है। अनु- |
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अक्षरलिपि