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दिखाको शायरी। इसके अक्षर नियमपूर्वक लिखनेसे कमलका चित्र उतर आता है। कमलबन्धु (सं० पु०) कमलोंका बन्धु, सूर्य।
कमलबायो (हिं० स्त्री०) रोगविशेष, एक बीमारी। इससे शरीर पीला पड़ जाता है।
कमलभव (सं० पु०) कमलात् भवति, कमल-भू-अण्। १ कमलज, ब्रह्मा। २ एक जैन ग्रन्थकार। इन्होंने कर्णाटो भाषामें शान्तिनाथपुराण बनाया है।
कमलभू (सं० पु०) ब्रह्मा।
कमलमूल (सं० क्ली०) कमलकन्द, कँवलकी जड़।
कमलयोनि (सं० पु०) कमलं विष्णुनाभिकमलं योनिरुत्पत्तिस्थानं यस्य, बहुव्री०। १ ब्रह्मा। (स्त्री०) पद्मकी उत्पत्तिस्थान, कँवल पैदा होनेकी जगह।
कमलयोनि—संस्कृतके एक प्राचीन विद्वान्। नृसिंहने सूर्यसिद्धान्तवासनाभाष्यमें इनका वचन उद्धृत किया है।
कमलरत्नाकर—संगीतचिन्तामणि और संगीतामृत नामक संस्कृत ग्रन्थरचयिता।
कमलवती, कमलदेवी देखो।
कमलबीज (सं० क्ली०) पद्मबीज, कँवलका तुषम्, कमलगहा। भावप्रकाशके मतमें यह स्वादु, कषाय एवं तिक्तरस, शीतल, गुरु, विष्टम्भी, शुक्रवर्धक, रुच, बलकारक, संस्थापक, गर्भसंस्थापक और कफ, वायु, पित्त, रक्त तथा दाहनाशक है।
कमलवदन (सं० त्रि०) कमलमीव वदनं यस्य, बहुव्री०। पद्मकी भांति मुखकान्तिविशिष्ट, जो कमलकी तरह खूबसूरत मुंह रखता हो।
कमलवर्द्धन—एक काश्मीरराज। यह काश्मीरराजके प्रसन्न असू रहे। बालक शूरवर्माके राजा होने पर इन्होंने सुयोग देख काश्मीरराज्य आक्रमण किया। एकाङ्ग और तन्त्रोगणने इनसे हार मानी थी। फिर इनके भयसे काश्मीरराज सिंहासनकी आशा छोड़ गुप्त भावमें भाग खड़े हुए। इन्हें काश्मीरके राजा बननेको बड़ी आशा थी। किन्तु मन्त्रिगणोने इन्हें किसी प्रकार सिंहासनपर बैठने न दिया और इनके बदले यस्कर नामक किसी सामान्य व्यक्तिको अभिषिक्त किया। कमलवर्द्धन ९१५ शकको विद्यमान थे।
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कमलबसु—बंगालके एक विख्यात व्यक्ति। साधारणतः लोग इन्हें 'फिरङ्गी कमलबसु' कहते हैं। किन्तु इस विजातीय उपाधिके संयुक्त होनेका कारण बहुतसे लोग नहीं जानते।
कमलबसुका असली नाम रामकमल बसु था। १७६७ ई० को इन्होंने गोवर्धनगिरिके निकटवर्ती गोईपुर नामक ग्राममें जन्म लिया। इनके पिता माणिकचन्द्र बसु चन्दननगरवासी फ्रांसीसियोंके अधीन तहसीलदार थे। उसी समय गोईपुरमें कराल कालघ्नी शीतला रोगका प्रादुर्भाव हुआ। परिवारके प्रायः ही भयंकर रोगाक्रान्त हो भाग रहे थे। माणिकचन्द्र स्त्री और अपने चार पुत्र चन्दननगर ले आये। फिर वह जन्मभूमिको लौटे न थे। रामकमल गुरुकी पाठशालानि यत्सामान्या बंगला और फ़ारसी पढ़ने लगे। यह अपने पिताके ज्येष्ठ पुत्र थे। पिताकी अवस्था अच्छी न रहनेसे इन्हें अर्थोपार्जनकी चेष्टा करना पड़ी। २० वर्षके वयःक्रमकाल यह पोर्तुगीज़ोंके सरकारी जहाज़ी कार्यमें नियुक्त हुए। जहाज़ी कप्तानोंके साथ संश्रव रहनेसे इन्होंने अल्प दिनमें सामान्यांशित पोर्तुगीज़ भाषा सीखी थी। किन्तु कोई उन्नति न हुई। इन्हें ६०।७०) रुपये कर्ज़ देना पड़ा था। उसी रुपयेके लिये यह थोड़े दिन कारागृहमें भी रहे। फिर गोपीमोहन ठाकुरके यत्न और साहाय्यसे इन्होंने छुटकारा पाया। रामकमलने जिससे नोट छपना रुपया लगा व्यवसाय प्रारम्भ किया था। इस बार इनका भाग्य फिरा, छिं सुञ्जा प्रभृति प्रधान प्रधान वणिकोंके साथ कारबार चलने लगा। पोर्तुगीज़ वणिकोंके साथ कामकाज कर यह सम्यक् सम्पत्तिशाली बन गये। फिर रामकमल चन्दननगरके बुनाइयोंसे एक प्रकारकी छींट तैयार करा अमेरिका भेजने लगे। उससे इन्हें विलक्षण लाभ हुआ था। कप़ड़े—प्रत्येक जहाज़में ५००००) रु० मिले। इसोप्रकार इन्होंने दश बार लाभ उठाया था। पोर्तुगीज़ों (फिरङ्गियों)के संसर्गसे बड़े आदमी बननेपर लोग इन्हें 'फिरङ्गी कमल बसु' कहने लगे। वास्तवमें यह एक कट्टर हिन्दू थे। रामकमल दोसू-दुर्गाउत्सवादि
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४२
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कमलबन्धु—कमलबसु