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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४३१

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कामरूप

पुरातत्वको देखते कामरूप अति प्राचीन जनपद है। महाभारतके समय यह स्थान किरातपति भग- दत्तके अधीन था। उस समय लोग इसे परशरामका लौहित्यतीर्थ मानते थे।

पुराण और तन्त्रमें कामरूप महापीठस्थान माना गया है। गरुडपुराणमें लिखा है,-

"कामरूपं महातीर्थ कामाख्या सन विष्ठति । (गरुडपुराण, श१६) राधातन्त्रके २०३ पटलमें कहा है,-

"कामरूप' महभानि ब्रह्मणो मुखमुच्यते।"

है भगवति । यह कामरूप ब्रह्माका सुख माना जाता है।

स्कन्दपुराणका प्रभासखण्ड ( ७० प्र०) देखते इस स्थानमें शभकर लिङ्ग विद्यमान है।

नीलतन्त्र और वृहन्नीलतन्त्रके मतसे इस महा- तीर्थम योगनिद्रा सर्वदा विरानती हैं।

पूर्वकालको कामरूपका आयतन इस समयको अपेक्षा अधिक विस्तृत था। कुमारिकाखण्डमें लिखा है,

"कामरूपे च यामाया मवलया: कोलिता।" (२० ई०) वर्तमान प्रासाम, कोचविहार, जलपाईगोड़ी और रनपुर कामरूपके अन्तर्गत था। योगिनीतन्त्र में प्राचीन कामरूपकी चतुःसीमा इस प्रकार वर्णित है,-

"करतोयो समाथिस्य यावहिकावासिनी।

उत्तरवां कश्चगिरिः करतोधानु परिमे ।

तीर्थ श्रेष्ठा दिखनदी पूर्वस्या गिरिकन्यके ।

दचिये नपुवस्य लामायाः समावधि ॥


येन यान्युपयोग्यानि गव्यं दैवि पयोमसम् ।

मार्ग मान्य तथा कागं शालन शाशक तथा।

माझिप वर्मयन्मास घौरं दवितस्ततः ।

पचिपा प्रवामि ये प्रयोज्या मम प्रिये।

हारितश्च मयुरष नारकं वर्तकन्नथा।

कपिलयब चाशय काककुटकी शिक्षा

बन्धक टकचव गणारिय कपोतक।

विश्वका कुलिकय व रहापुच्छर टिहिमः ।

अचमत्याभनय व पोयाच विशियाने।

चिवमव्य' रोहितच महायलच राजिवम्।"

(योगिनौतन, रा८ पटल)

कामरूप इति ख्यातः सर्वशास्त्रेषु नियितः "

"विशन योजनविस्तीर्ण दोघे व शवयोजनम् ।

कामरूपं विनानीधि विकोणाकारमतमम् ।

थाने चव केदारी वाया गनासमः।

दक्षिणे सहमे देवौ वाचाया: बहरेसमः।

विकोयमेव मानौडि सुरासुरनमानम्।"

करतोयासे दिक्करवासिनी तक कामरूप विस्तृत है। इसको उत्तरसीमामें कनगिरि, पश्चिम करतोया नदी, पूर्वसीमामें तीर्थ श्रेष्ठ दिक्षु नदी और दक्षिण ब्रह्मपुत्र नद तथा साक्षा नदीका सङ्गमस्थल है। यह सीमा मिर्देश समुदाय शास्त्रका अनुमोदित है। यह सुरासुर- पूजित कामरूप त्रिकोणाकार है। इसका देव एक शत योजन पौर विस्तार तोस योजन है। कामरूपके ईशानकोणमें केदार, वायुकोणम गजशासन और दक्षिणम ब्रह्मरता तथा लाथाका सङ्गमस्थत है।

कालिकापुराणमें भी लिखा है-

"करतोया सव्यगना पूर्वभागावधिथिता।

याववलितकान्नास्ति वावद्देपुर वदा।"

(कालिकापुराण, २८११२१०)

करतोया नामक सत्यगङ्गासे पूर्वदिक ललितकाम्बा पर्यन्त यह पुर विस्तृत है। (ललितकान्ता दिक्कर- वासिनोके निकट है।)

दुरबीके मतसे भी कामरूपको उत्तर सीमा कनगिरि वा मूटानका पावत्य प्रदेश है। इसके पूर्व महाचीन वा चीन-सामान्य, दक्षिण लाक्षा नदी (यह नदी ब्रह्मपुत्र से पृथक् हो वङ्गदेशक सीमारूपसे प्रवाहित है।) और पश्चिम करतोया नदी है।*

सपुरवारी रोगकि विश्वासानुसार देवीगंजी निवभागमें प्राचीन विता (विसोवा) नदीमें पायराज नामको एक शेटौ नदी मिली है। वही करवाया नदीका पुराना गर्म है। फिर पाथराज भी कामरूपक Tanta Amali (Martin's Eastern India, Vol. III. p. 361-63.) करतोया देखो।

पर वर्तमान भासाम प्रदेशके पूर्वप्रान्तमें सदियाके निकट कामरूपपुव मामको एक नदी बहवी है। इसे मौ कामरूपको पूर्व सीमा बवानेवाली कहना पड़ेगा। (Journey from Upper Assam towards Rookhoom etc, by W. Griffith ; see Selection of papers regarding the Hill Tracts between Assam ani. Burmis, p. 126.)