पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/१०

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. कहते हैं। यया में जिस किसी एक्षण द्वारा मायो, को जाय, तो यह मसाध्य हो जाता है। वातम्याधि, मृत्युका मनुमप किया जा सकता है, उसीका नाम मरिष्ट प्रमेह, कुछ, मर्श, भगन्दर, अश्मरो, मूढगर्भ तथा उदरा चिह है। चिकित्सकको इस भरिए चिहके प्रति विशेष रोग पे ८ प्रकारके रोग स्वाभाविक मसाध्य हैं। बल मौर लक्ष्य रखना चाहिये। यह परिएलक्षण रोगभेदसे मिल मासक्षप, ध्यास, तणा, शीप पमि और स्वर पे सब भिन्न प्रकारका है। मरिएलक्षण दिखा दोसे रोगीके उपद्रय या मूर्जा, अतिसार और हिका उपस्थित होनेमे जीयमको भाशा नही रहतो विन्तु फिर भी रोगीका | रोग मसाध्य होता है, जिस जिस रोग जो जो उप परित्याग करना उचित नहीं। अब तक रोगी जीना है। वनिर्दिए है ये सब उपद्रप दिखार से सपा प्रमेह हा तक उसकी चिकित्सा करनी चाहिये। किस रिस रोग चित्तके भरिएको सरह होने तथा अत्यन्त धातु रोग कैसा मरिपुलक्षण दिखाई देनेसे रोगोषी मृत्युकी गिरने और अतिशय पक्षणा होनेसे यह मसाध्य है। सम्मायना उसका विषय घेधशालमें इस प्रकार कुष्टरोग-क्षत महका विदीर्ण हो कर रस निक रना, मात्र लाल और स्वरमा होना तथा यमन, विरे मरिएलक्षण-शरीरक जो सब मङ्गस्यमावत: मिस / चन, नस्य, निसदयस्ति और उत्तरपस्ति इन पाच का प्रकार रहते हैं उनकी अन्यथा होनसे रोगीको मृत्यु स्थिर में कोई फल न दिखाइ मेसे असाध्य तथा अर्शरोग, परनी होगी। शुक्लयर्णकी पृष्णता, प्रणयर्णको शुक्लता, तृष्णा, मरुचि, अतिशय घेदना, बहुत एक गिरना, शोथ रमादि पर्णो का अग्य प्रकारका वर्ण होना, स्थिरकी और अतिसार पे सव उपद्रप होनेसे,भगन्दररोगमें घायु अस्थिरता, मस्थिरकी स्थिरता, स्थूलको राता स्यादि। मूत्र, विष्ठा और शुफ पे सप निकलनेसे, अश्मरोरोगों प्रकार के स्वभापका विपरीत होनेम गरिए लक्षण स्थिर नाभि और कोपके स्फोत होनेसे सपा पेशाय बंद और परने होते हैं । कहने का मतलब यह कि शरीर या अत्यन्त घेदना होनेसे, मूढगर्भरोगमें गर्मकोप आल स्वमायको कुछ भी विरति होनेसे उसे अरिष्ट लक्षण पहा पदना, कुक्षिदेशमें रक्के जमा होनेसे तथा योनिमुख जाता है। समाच्छादित हो पर ये सब लक्षण दिखाई देनेसे पक्ष जिन सब रोगोफे भोजन मही करने पर भी मल मसाध्य होता है। जो जो रोग जिस जिस उपनयसे मूलको पनि पा भोजन करने पर मलमूत्रका ममाय | असाध्य होता है यह उही शम्मोंमें लिखा जा चुका है। स्सनमूला हदय वा यशस्लम घटना, किसी अङ्गका रोग असाध्य होनेसे यह रोगीसे महा पहना चाहिये, मधोत्पल रूपात और दोनों मोर कश मधया मध्यस्थल पल्कि उसे सामान्य रोग कह कर आश्वासन देना छश मोर दोनों मोर स्फीत, भगिमें शीप पा साप, उचित है। क्योंकि, रोगी यदि जोपनके प्रति हताश हो शरीर शक तथा स्वर नए होम, यिरल पारित होना) जाय, तो अनेक साध्य रोग मी मसाध्य हो जाते हैं। या दन्त, मुध, नत्र मादि स्थानोम थिषर्ण पुष्पकी तरह रोगीके मनुगत, विश्वस्त चौर प्रिय व्यक्ति उसके पास मिह पा इष्टिमएडरमें भिन्न प्रकारका विरत रूप मालूम रहरमाभ्यासपूर्ण प्रिययाय द्वारा उसे सतुष्ट रखे । दोमा या मतेलाम्पा की तरह दिखाई देना, इत्यादि। रोगीके निकर बहुत मादमियोंका रहना उचित नही । प्रकारको मरिए चिह जानना होगा। अतिसार रोग | जो घर सूखा, साफ सुथरा दो मौर जिसम हया समी मरुपिया दुर्बलता, कासरोग, तृष्णामिभूनता, क्षोणता, तरह माती जाती हो, बसे सुन्दर परमें रोगीका रममा वमन, मचि, रसायमन, हाथ, पैर और मुधा पहाना उचित है। रोगीका विछावन पूजा मोर मुलायम रहे। मादिसण विशेष मरियमनक है। रोग उत्पन्न होते ही उमा यथापिधान चिकित्सा मसाध्य रोगका लक्षण-पहले लिया जाता है कि करे। दोप पम होने पर भी उसी उपेक्षा करना साध्य, मसाप मोर पाप्यके मेसे रोग तीन प्रकार उति नहीं। क्योंकि रोग मप होने पर भी मनि है। मारोगो मी पदि की तरह चिश्रिसाम शर और विरको तरह रिकार उपस्थित दो सरला ।