पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/१०८

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रोहिणी १०३ सुरमि कन्या। (कालिकापु०) १४ प वपोया पन्या, नी। इस नक्षतम जाम होनेसे ज्ञात वालक कुशल, पुलीन, वर्गको या। सुचारदेव, धनी, मानी और कामुक होता । (काठीप्र०) 'भष्टया भवेदोरी नपा च राहिणी अष्टोत्तरी मतसे इस नक्षवर्म "म होनेसे सूर्यको (उदाहसत्त्व ) ! दशा तथा विशोत्तरी मतसे चन्द्रकी दशा होती है। १५ पञ्चवर्षीया क या, पाच वर्षकी कुमारी। रोगियों नक्षनके परिमाणादि अनुमार भोग्यभुकादिका निरूपण का रोग नाश करनेके लिये इस कुमारीको पूजा करनेको क्यिा जा सकता है। व्यवस्था देखा जाती है। भाद्रमासको कृष्णाएमी अथात् माष्टमी के दिन 'रोहिणी पञ्चषा च पहपर्ण कालिका स्मृता।" रोहिणी नक्षलका योग होनेसे जय ती योग होता है। यह (देवीभाग० ३।२६४२) रोहिणी नक्षत्र रात्रिकाल पा कर यदि दूसरे दिन भी रहे "राहिया रोगनाशाय पृजयदिधिष नर ।" तो जब तक रोहिणी नक्षत्र रहेगा, तब तक उपास करना ( देवीमाग० ३२६४८) होता है। रोहिणी रहने पर पारण नहीं करना चाहिये। रोहिणीको पूजा निम्नोक्त मत्रमे करनी होती है। माएमा देखो। "गेहयती च वीजा प्रारतमश्चितानि । ____१८ गलरोगमेद, गलेका एक रोग। इसके निदान या देवी सव मूताना रोहिणा पूजयाम्यहम् ॥" और चिकित्साका विषय भारमका में इस प्रकार लिखा (दवीमाग० ३१२६१५६) । है। गररोग १८ प्रकारका है। उनमेंसे रोहिणीके पाच इस कुमारीको पूजा करनेसे अनेक प्रकारकी नुख | भेद है। सम्पद प्राप्त होती है । १६ हिरण्यकशिपुकी कया। निदान-दूषित वायु पित्त कफ और रक्त जब (मारत ३२१ १८) १७ आश्विना आदि सत्ताइस नक्षत्रों गले के मासको दूषित पर एरोधकारी मासादर के मतगत चाधा नक्षत्र । पर्याय-रोहिणी, नाही। उत्पादन करता है, तय उसे रोहिणी रोग कहत हैं। इस यह नक्षत्र गटाशर और पश्चमात्मा है। ब्रह्मा इस रोगमें प्राय रोगोका जायन Tट होता है। के अधिष्ठात्री देवता है। इस नक्षतम अपराशि होती वातज रोहिणीका लक्षण-यातज रोहिणो रोगर्भ जोमक चारों ओर अत्यन्त वेदनापिशिष्ट गठरोधकारव रोहिणी (नभन ) चन्माको अत्यात प्रियतमा है। मासाह र उत्पन्न होता है तथा रोगो स्तम्भव आदि चन्द्रमाको सत्ताइस स्त्री होने पर भी वे हमेशा रोहिणी ) वातजनित उपनाम पोडिन रहता है। के निकट रहत थे। शेष स्त्रिया इससे असन्तुष्ट हो दश । पित्तन लपण-पित्तजयरोहिणो रोगई मासाङ्कर फे पास गइ और कुत्र वृत्ता त उ ह कह सुनाया। दक्ष पडे गिडे और उन्होंन व द्रमाको शाप दिया। रोहिणी नल्दी निकलता है तथा गत्य त दाद और पारयुक्त होता के कारण पदमा दया अभिशापसे यक्ष्मरोगाका त है। इस रोगीको गोर गोरसे घर आता है। हुए। (कालिकापु०) फज रक्षण -कफजय रोहिणी रोगमें मामाडूर ____यह नक्षत्र उद्ध्वमुम्न, मौर मपजातिका है। शा | गुरु, स्थिर और गल्पपारिटि होता है, तथा एट पदकासार इस नक्षनमें नामरण होनेसे इसके स्रोत यद ही जाता है। चार पादमें 'मो, य, यो चुन चार अक्षणा मादि सनिपातज रक्षण-लिदोपज रोहिणी रोगमें उत्त नाम होगा। (काशिदासात राषितम न.) तीन दोवोंके समा रक्षण दिखाइ दते हैं तथा मासाहूर पात्र नपत्रयुत कटाकार रोहिणी नक्षत्र पदि । गम्भीरपाको होता है। ये सव रक्षण दिग्राइ देनेमे प्रकाशित हो तो मिहनका ३ दण्ड ३४ पल पोत गया रोगोको जान पर खतरा है ऐसा जानना होगा। है, ऐसा मानना होगा। रता रक्षण--रत्तजन्य रोहिणी रोगमें जीभके नीचे Vol Ar 27 - - - - - - - - -