पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/११

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रोगकारक-रोगविज्ञान शरीर धारण करनेसे ही रोग भुगतना पडेगा, इसमें । रोगपति ( स० पु० ) रोगस्य पतिः। ज्वर । जो कोई संदेह नहीं। जिसे रोग हुआ है उसे रोगी कहते हैं। कठिन रोग क्यों न हो, विना ज्यरके वह प्रबल नहीं हो यह रोगी चिकित्स्य और अचिकित्स्यके मेदसे दो प्रकार । सकता। इसलिये ज्यरको रोगपति कहा है। का है। जिस रोगीकी प्रकृति, वर्ण और चक्ष : रोगपरिसह (स' क्ली० ) उग्र रोग होने पर कुछ ध्यान आदि इन्द्रिया विकृत न हो कर स्वभावमें रहती न करके उसका सहन । है तथा जो रोगी सुग्य और दुःखजनक क्रियादिसे विह्वल रोगप्रद ( स० पु० ज्वरदायक । नहीं होता और चिकित्सकका वाध्य एवं इन्द्रिय दमन रोगमाज ( स० वि० ) रागं भजने भन-ण्यि । रागयुक्त, करने में समर्थ होता है उसे चिकित्स्य रोगी कहते हैं। रोगी । जो व्यक्ति अधिक क्रोधी, अविनेकी, डरपोक, व्याकुलचित्त, रोगभू (स. स्त्री० ) रोगानां भूः स्थान व्याधिमन्दिर शोकाभिभूत, अतिरिक्त इन्द्रियसेवी तथा चिकित्सक-त्वात् । शरीर, देह । । के वाक्यानुसार न चल कर अपने इच्छानुसार चलता रोगमार्ग (स० पु०) रोगाणां मार्गः । शाखादि रोगावतं । उसे अचिकित्स्य रोगी कहते हैं। अर्थात् चिकित्सक यह रोगमा तीन प्रकारका है, यथा-शाखा, ममोस्थि- ऐसे रोगीको चिकित्सा न करे। (सुश्रुत भावप्र०) सन्धि और कोष्ठ । इनमें शाखाले रक्तादि धातुसमूह और रोगकारक (सं० त्रि०) व्याधिजनक, वीमारी पैदा करने . त्वक समझा जाता है। यह वाारेरोगमार्ग, मर्म अस्थि- वाला। सन्धिस्थानके बीच रोगमार्ग तथा कोष्ट अभ्यन्तर रोग रोगशष्ट (सं० पली०) पत्राचन्दन, बकमको लकडो। मार्ग है। (चरक सूत्रस्था० ११ १०) रोग देखो। रोगग्रस्त (स० वि०) शेगसे पीडित, बीमारीमे पडा रोगमुक्त (स त्रि०) रोगात् मुक्तः । रेगिसे मुक्त, हुआ। योमारोसे छुटकारा। . रोगघ्न (सं० पली०) रोगं हन्तीति हन्-टक । ६ भोपध।। ": रोगमुगरि (स० पु० ) नववराधिकारमें रसीपधविशेष । (ति०) २ गंगनाशक, दीमारीको दूर करनेवाला। प्रस्तुत प्रणाली-पारा, गंधक, विप, लोहा, विक्टु और रोगन (संपु०) रोग जानातीति मा का वैद्य। तांबा प्रत्येक समभाग और सीसा अर्द्ध भाग ले रोगनान ( स० क्ली०) रोगविषयमें अभिज्ञता। । कर पीस डाले और दो दो रत्तीकी गोलियां वनावे । रोगद ( स० नि० ) पीडादायक, दुःन देनेवाला। अनुपान पान और अदरकका रस है। इसके सेवनसे रोशन (फा० पु०) १ तेल, चिकनाई। २ लाख आदि । नवज्वर शीघ्र ही प्रशमित होता है। (रमको०) से बना हुआ मसाला जिसे मिट्टीके वरतनों आदि पर चढ़ाते हैं। ३ चमड़े को मुलायम करने के लिये कसम रोगराज (सं० पु०) रोगाणा राजा टच समोसान्तः । या वरैके दलसे बनाया हुमा मसाला । ४ पतला लेप राजयक्ष्मरोग। जिसे किसी वस्तु पर पोतनेले चमक, चिकनाई और रोगलक्षण (सं० क्ली०) रोगाणां लक्षणं । निदानरोग रंग आके, पालिश। ध्यक्षक चिह्न। रोगनदार (फा०वि०) जिस पर रोगन किया गया हो, रोगविज्ञान ( स० क्ली०) रोगस्य विज्ञान'1 जिन सव पालिशदार। उपायोंसे रोगका कुछ ज्ञान होता है उसे रोगज्ञान कहते रोगनाशक ( स० त्रि०) रोगहर, वीमारी दूर करने ! हैं। दर्शन, स्पर्श और प्रश्न इन तीन उपायोंसे रोगका वाला। ज्ञान होता है इसलिये यह तीन प्रकारका है। मूत्र और रोगनिदान (स'० पली०) रोगके लक्षण और उत्पत्तिके जिह्वा आदि देखने, नाड़ी आदि छूने और दूत आदिको कारण आदिकी पहचान, तशखीस। प्रश्न करनेसे सब मालूम होता है। रोगनी (फा०वि०) रोगन किया हुआ, रोगनदार। ( मैपज्यरत्ना० ) रोग देखो।