पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/११३

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रोहिल्ला अधिकारमे था। महासद्रगण रोहिलोको छोड कर: रोहिलपण्ड विभागका कुछ अंश अतिपर ग्बन अबदालोके विरुद्ध अपने राज्यकी रक्षामे लग गये। अंगरेजको नेका बनन दिया । तदनुसार समाके १७६० ई० में अबदाली नाजिव उद्दौला, हाफिज रहमत् प्रेसिडेण्ट पार्टियरी आसामे सर रावट बकारने यीच. और अन्यान्य रोहिल्ला सरदारोंके साथ दिल्लीकी ओर में पड़ कर महाराष्ट्र, रोहिल्ला और मुजाउद्दौलाके बीच वढे । छी जनवरी १७६१ १०को पानोपतको लडाई । मेल करानेी वेटा की। उसी नाटकी भी मई तक में महाराष्ट्र शक्तिका जब अवसान हुआ, तव अह्मदशाह , सन्धिका प्रस्नाय चन्दना रहा, गिन्तुको विशेष फल अबदालीने विजयघोषणा के पीछे शाह बालम को हो दिली-, न गुआ। वर्षा आरममा महाराष्ट्रीयदल गढ़ा पार कर का सम्राट मनोनीत कर नाजिव उद्दौलामो प्रधान मन्त्री न गवा और लौट आया। रोहिलागण तथा जाविना वा और सुजा उद्दौलाको वजोर बनाया था। उसने हाफिज पत्तोपुत्र ले कर गाय से । नमीर येकार माहवको रहमत और दुण्डी खाँको यथाक्रम इटावा तथा आगरा , ले कर अयोध्या गया। और कालपी प्रदेश प्रदान किया । अन्यान्य रोहिला- धर रेटिस मन्द्राज आ पर उमी चाफि अप्रिल, सरदारोंको अन्तर्वेदीफे मध्यपत्ती प्रदेशका अधिकार मासमे बदाल के गवर्नर र । महागाद्र रोहिला, वजीर मिला। इस समय थोडे वर्षों तक रोहिलॉन मान्ति ' और मुगल सम्राट के स्वार्थ और मम्बन्धको रक्षा करना मय सुखराज्यका मोन किया था। ही उनका उद्देश था। महाराष्ट्रोंने यद्यपि गेहिलपण्ड १७६४ ई० सुना उद्दौलाके साथ अगरेजोका छोड दिया और वहांस वे लोग युद्ध के मामान उटा विवाद खडा हुआ तथा १७:५४०को वक्सरपी लडाईमे लाये, ता भी बहा शान्ति स्थापित होने न पाई। वह बहुत कुछ दब गया । १७६६ ई०में अफगानोंने जब ! रोहिलों के बीच गृह-विवाद सटा हुआ । रोहिल्ला फिरसे इटाया और दोआवके मध्यवत्ती जिलों पर सग्दार नर वा यस्तों के मरने पर उसके लडके राज- माक्रमण कर दिया, तब क्लाइवके मनमे तरह नरहकी भाव- सिंहासन ले कर झगडने लगे। हाफिन रहमन्के पुत्र नाएं उठने लगी। किन्तु २७९० ई०में नाजिव उद्दीलाके ' इनायत पाने पिताके विरुद्ध अवधारण किया। इस मरने पर उसका लडका जाविता वा राजा हुआ सही, समय दूसरे दृमरे रोहिला मरदार कमजोर होने लगे, पर रोहिल्ला जातिका दर्प बहुत कुछ चूर हो गया। सरदार शेष कवीता देदान्त नुआ, फलंगावादका मुज. उसी साल रोहिलखण्डमे दुण्डी पांकी मृत्यु हो जाने- फारजन अकर्मण्यताके मारण दुर्वल हो गया तथा से रोहिल्ला लोग फिर मराठोंकी गति न रोक सके।। जाविता यां स्वजातिको महानुभूति खो कर फिकर्तव्य २७७१ ईमें उन लोगोंने दश वर्षके वाद फिरसे दिल्ली, विमूढ हुआ। वह दिल्लीध्याका प्रधान मन्त्री होनेको पर धावा बोल दिया। जाविना सा विपद्को नजदीक आमासे १७७२ ई० जुलाई मासमें मराठा-दलमे मिल देख कर राज्य छोड भाग गया। उसी वर्षकी २५वी। गया । दिसम्बरको मराठौके साथ एक शर्त करके सम्राटने। उसी वर्षके शेपमे महाराष्ट्रगण जब दिल्ली घुसे, तव नगरमें प्रवेश किया। नजफ खां विशेष चेष्टा करके भी आत्मरक्षा न कर सका। १७७२ ई०मे महाराष्ट्रदलने रोहिलखण्ड पर आक्रमण तव महाराष्ट्रदलने खुल्लमखुला सम्राट को किसी तरहका किया । जाविता खाँ और हाफिज रहमत् आदि रोहिला. ! सम्मान न दिखा कर उनसे इलाहाबाद और कोराप्रदेश सरदार तथा स्वयं सुजा उद्दौला महाराष्ट्रीय सेनाको छोन लिया। इस संवादसे डर कर सुजा उद्दौलाने अङ्क गति रोकने में असमर्थ हुए। महाराष्ट्रदल पानीपतकी रेज गवर्मेण्टसे सहायता मांग भेजी । कोरा और इलाहा- लड़ाईका बदला लेने के लिये जव रोहिलखण्डको पवस्त वाटसे ले कर अगरेजों के साथ युद्धको सम्भावना देख कर अयोध्या लूटने अग्रसर हुआ, तब वजीर सुजा कर महाराष्ट्रीय सेनापति हाफिज रहमत्के साथ मिलने- उद्दौलाने कलकत्ते की गवर्मेएटसे सहायता मांगी तथा की आशासे गङ्गा पार कर रोहिलखण्डमें घुसे।