पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/११५

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२१२ रोहिशा-होतकारिष्ट रोहिशा-वन्चई प्रदेश काठियावाड विभागके अन्तर्गत | चितामृल, हवूपा, चई और वत्र प्रत्येक २ तोला, पाक- जूनागढ़ राज्यका एक वडा गांव। यह समुद्रतटमे पाय का जल १६ सेर । यथाविधान पाक शेप करके नीचे भर दूर तथा ऊना नगरसे ४ कोस पूरवमें अवस्थित उतार ले। इस तकी मात्रा आट भानेसे दो वा तीन है। पलिताना राजबंगमें एक ऐसी प्रथा चली आती है, तोला तथा अनुपान मांसरल, जम और दूध बताया कि जो कोई सरदार गद्दी पर बैठता है, वह अपने पूर्ण ! गया है। यह चूत बहन बलकर है। इसका सेवन पुरुष द्वारा जीते गये इस रोहिशा नगरसे एक पत्थरका करनेसे रीहा, यकृत और उससे उत्पन्न प्रल, कुशिशल, टुकड़ा ले जाता है। यहाँस ॥० कोस उत्तर 'चित्रासर' हच्छल, पावशाल आदि अनेक प्रकारके रोग दूर होते नामक एक बडा बांध है। इसके चारों ओर वडे उड़े हैं। प्लीहा यन् अधिकारमें यह एक उत्कृष्ट छूत है। मकान हैं। (भैषज्यरत्ना० प्लीहायकृदधि०) रोहिशाला-बम्बई प्रदेशके काटियावाड़ विभागले अन्तर्गत रोहीतकलाह ( स० क्ली० ) ओपनविशेष । प्रस्तुत गोहेलवाड प्रान्तका एक मामन्त राज्य । यहाँके सरदार प्रणाली-रोहीत की छाल, विकटु, त्रिफला, विडङ्ग, जूनागढ़के नवाब और बडौदाके गायकवाडको कर दिया । मोथा, चितामूल, प्रत्येक वस्तु वरायर यगवर भाग; करते हैं। फल मिला कर जितना हो उतना ही लौह । इन्हें रोहिप ( स० क्लो०) १ कत्तण, रुसा घास । (पु०)२ अच्छी तरह पीस कर औषध बनाना होगा। अनुपान रोहिक मृग, एक प्रकारका मृग जो गधेसे मिलता जुलता। दोपका बल देय कर स्थिर करना उचित है। इसके है। 3 रोह मछलो। । सेवनसे प्लीहा, मनमास और भोप नए होता है। रोही (मपु०) रोहिन देखो । (भैपचरत्ना० प्जीहायकृदधि०) रोही (हिं० वि०) १ चढनेवाला। (पु०) २ एक रोहीतकलौह ( स० जी० ) प्लीहाधिकाग्मे लोहभेद । हथियार। प्रस्तुनप्रणा ठी-रोहितक, सगंठ, पीपल, मिर्च, हरीतकी, रोहीतक ( स० पु० ) रोही- एव स्वार्थे कन् । रोहितक- आमलकी, बहेडा, विडङ्ग, चीता और मोथा प्रत्येक वृक्ष, रोहेडा। द्रव्य एक एक भाग तशा सबोंके समान लौह एक रोहीतकधुन ( सं० क्ली०) घृतोपधविशेप। यह औषध साथ मिला कर यह बनाना होगा। माता और अनुपान दो प्रकारका है-स्वल्प और महत् । इसको प्रस्तुत- रोगके बलादलके अनुमार स्थिर करना होगा। इसके प्रणालो-धो ४ सेर, काढ केलिये। रोहीतककी छाल सेवनसे अग्रमाम और योग अच्छा होता है। .२५ पल, सूबो बेर ३२ पल, पाका जल ५७ सेर, शेप (रमेन्द्रसारस० प्लीहागंगाधि०) १४ सेर २ पल। करकाशं पीपलका मृल, चई, चिता- रोहीतकाद्यचूर्ण ( स० क्ली) चूर्णी पधविशेष । प्रस्तुत- मूल, सोंठ प्रत्येक १ पल, रोहीतक की छाल ५ पल, पाक | प्रणाली-रोहीतक छ ल, यवक्षार, चिरायता, कुटकी, का जल १६ सेर। पीडे यथाविधान इप्स घृतका पाक मोथा, निगादल, अतीस, सोंठ प्रत्येकका चूर्ण सनान, करे। यह घृत पान करनेसे लोहा और गुल्म आदि गेग इन्हें अच्छी तरह चूर्ण कर एक साथ मिलावे । इस नष्ट होते हैं। (भै पज्यरत्ना० प्लीहायकृदधि०) औषधकी मात्रा १ माशा और अनुपान शीतल जल ___ महारोहीतकघृतकरी प्रस्तुत प्रणालो-घी ४ सेर, बताया गया है। इसका सेवन करनेसे यकृन्, प्लीहा क्याथार्थ रोहीतककी छाल १२॥० सेर, सूखी बैर ८ सेर, बहुत जल्द नष्ट होती है। (भ पन्यरत्ना० प्लीहायकृदधि०) जल १२८ सेर, शेष १२ सेर, वक्रीका दूध १६ सेर। रोहीतकारिष्ट ( स० पु० ) अरिष्ट औपधविशेष । प्रस्तुत- कल्कार्थ त्रिकटु, त्रिफला, हींग, अजवायन, धनिया, प्रणाली-रोहीतक छाल १२॥ सेर, जल २५६ सेर, शेष बिटलवण, जीरा, कृष्ण व्यण, अनारका वीज, देवदारु, १४ सेर। इस क्याथको अच्छी तरह छान कर उसमें पुनर्णबा, ग्वाल ककड़ीका मूल, यवक्षार, कुट, विडङ्ग, २५ सेर घोल दे। पीछे धाईका फूल १६ पल, पीपल,