पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/१२८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


लगा १२५ इन दोनों दोपौका यथारम दार्शनिक नाम ति , प्रकार श्यान या उपशिष्ट गो पशु उस समय यद्यपि प्याप्ति और अव्याप्ति है। अतिध्याप्ति-अतिशय सम्बध गमा नहीं करता तो भी गमन करनेकी योग्यता उसमें पा अतिरिक्त सम्ब। सम्बन्धयोग्य स्थलको अतिकम है। इस कारण मयादिगारम भी गोशका प्रयोग पर अर्थात् जिसके साथ मम्बध होना उचित है उमके | हो सकता है। गुतरा गो शब्दके यौगिक होने पर भी माथ न हो कर दूमोके माध होनसे मनिध्याप्ति दोष अव्याप्तिदोष नहीं होता। इसके उत्तरमें यही कहना होता है। सभ्य ध योग्य स्थलको अस्निग करना, ऐसा है, कि उन' प्रकारमै थोडा बहुत अध्याप्ति दोपमा परि कहनेसे यह न समझना होगा, कि सम्बायोग्य स्थलमा हार मले दा हो सकता है, पर अतिव्याप्तिदोपका परि विरपुर सम्याध रहेगा ही नहीं। सम्बधयोग्य स्थरमें हार तो किसा हालतस नहीं हो सकता । अतएव गो सम्बन्ध रह कर भी यदि सम्बन्धके अयोग्य स्थल सदको रूढ मानना होगा। सम्बध हो, तो अतिव्याप्तिदोष हुथा करता है। गमनकर्ता यह अवयवार्थ (गमधातु और खोस प्रत्यय उद स्थलम व्युत्पत्तिके अनुसार गमनशील गो। का अय) गोशझा ध्युत्पत्ति निमित्तमात्र है, विस्तु पशुमै गो का प्रयोग होनेम कोई भी बाधा नहीं होतो, प्रवृत्तिनिमित नहीं। गोगादका प्रवृत्तिनिमित्त गोत्य फिर गमनशील मनुष्यादिमें भी गो शवदा प्रयोग हो | जाति ह। जिस अर्थको अवलम्बन कर शब्द ध्युत्पन्न माता है। गमनशील मनुष्णादि गोशम्दका सम्बध होता है या शब्दको व्युत्पत्तिके अनुसार जो अर्थ पाया योग्य स्थल नही है। इस अयोग्य स्थल में समय होने जाता है उसे व्यत्पत्तिनिमित्त तथा जिम अधंका अघ कारण अतियाप्तिोप होता है। लम्बा कर शव्दकी प्रवृत्ति अर्थात् प्रयोग होता है । भन्याप्ति शादसे समवध समझा जाता है। रिसी, उसे प्रतिनिमित्त कहते हैं। मनपर गोत्य अर्भके साथ शब्दका सम्यघन रहेगा यह असम्भर है। भाति रा गोवजातिधिशिष्ट व्यक्ति में गो सद आतएप जहा पर सम्बत्र रहना उचित है यहा सम्बघ का प्रयोग होता है, इस कारण उस अर्थ में गो शप्नका नहीं रहनेसे हो असम्घ मम्वध समझना होगा। जैसे सङ्केत स्वीकार दिया गया है। यह सङ्कत गो इस पर्णा मायान या उपविष्ट गो पशुमा गो है, उस अमस्थामें भी यलीगत गो शन्दका घटक है, गम् धातु या सोस् प्रत्ययगत उसक साथ गोसदका मनघ रहा उचित है परन्तु नहीं। पाचन शद यौगिबरूद नहीं है। पौकि, गो गम्दो व्युत्पत्तिलम्य अथ अनुसार शयनादि । पाचक उम वर्णाश्लोके किमी अथविशेष सङ्केत नहीं अवस्थामें गो पशुक साय गो सम्बध नहीं रह सकता है। अवयव सङ्केत अथात् पच् धातु युण प्रत्ययफे इस कारण अध्याप्तिदोष होता है। गादको यौगिक मड्डत द्वारा हो पाकपत्तारूप भयकी गवति हो सकती हमेसे उक्त प्रकारका अतिव्याति और अयाप्तिदोष है। समुदायका सङ्केत स्वीकार करना कोई कारण होता है । मतपय गो गन्द यौगिर नहीं रुढ है। नही । इमरिये पाक पद रूट ही यौगिक है। कोरकार प्रत्यय म्यिा रो योग्य तक समझा। पदले जिस सङ्केतका उल्लेख किया गया है, वह जाता है सही, कि तु सभा प्रत्यय नहीं। साधारणतः सङ्केत दो प्रकारका है, माजानिक र माधुनिक शो किया पाहा समझा जाता है। यहा पर ठोस पत्यय सरत बहुत दिनोंस चला आता है, जो नित्य है उसे पा मध मियाकत्ता है। इमलिपे अध्याप्तिदोष होना। माज्ञानिक तथा मो मधेत शनादिवालसे नहीं चला । प्रिया करन योग्य तक हा ढोस् प्रत्ययका अर्थ है, यह प्राता, यीच वोचम परिपर्तिन हो गया है उसे आधुनिक पदि मान लिया जाय, तो प्रा यह हो सस्ता है, कि कहते हैं। मानानि सङ्केतका दूसरा नाम शक्ति और पावर व्यक्ति जिस समय पारवा उस समय) माधुनिक सङ्केतका परिभाषा है। गोगरयादि सङ्केत मो उमे पाक रहते हैं। पोंकि, उस समय पार भाजाशिक तथा चैत्रमैनादि सरत आधुमिल है। मदों करनेमे भी उमम पार करनेका योग्यता है। इसी ! भाजानिक सदेत शारिके अनुसार जो जन जो पर्थ Vol. 32