पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/१३३

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३३० लक्ष्यगा मुझसे बढ़ घर रामक प्यारे हैं।' रावणके शेल से विद्ध , मानो मर गई थी, उनका सर्वाना - पित हो रहा था। लक्षमण जिस दिन युद्धक्षेत्र में मृतफल्प हो गये थे, उस लक्षमण यह दृष्य देव कर व्यथित हो गये, किन्तु रामके दिन राम आइत शावपकी जिस प्रकार थ्याघ्री रक्षा कार्यका उन्होंने प्रतिवाद नहीं किया। जव मतीत्व करती है, उसी प्रकार छोटे भाई लक्ष्मणको अपनी गोदमें परीक्षाके समय मीता अग्निमें कृद पढ़ने के लिये तैयार विठा कर उसकी रक्षा दरते थे:-रावणका असरय हो गई, नव उन्होंने लक्ष मणने चिता बनाने का शर रामकी पोटको छिन्न भिन्न कर रहा था। राम उस लक्ष मणने रामका अभिप्राय समन फर सजल-दबोसे ओर जरा मी दृष्टि न फेर फर अश्रुपूर्ण नेत्रोंसे लक्ष्मण चिता यनाया, जरा भी प्रतिवाद नहीं पिया। नानृ स्नेह- की रक्षा कर रहे थे। अनन्तर वानर सेनाके लक्ष्मणकी से ये स्वीय सास्तित्वमान्य दो गये धे। मीनाका उद्धार रक्षाका भार ग्रहण करने पर वे युद्धमें प्रवृत्त हुए। कर राम अयोध्या के राजा हुए। लक्षमणने मातृभकि- रावण भाग चला । पोछे रामचन्द्रने मृतकल्प वातः उनके सिर पर छल थामा था। चे राजकार्य में भ्राताको अति सुकोमलभावमें आलिशान कर कहा, 'तुमने भाईकी सहायता करने थे। कुछ दिन बाद प्रजाको जब जिस प्रकार घनमें मेरा अनुगमन किया था, आज में भी सीनाके चरित्रसम्बन्धी संदेह हुआ, नय रामने उन्हें बना उसी प्रकार यमालय तक तुम्हारा अनुगमन करूगा। वाम देने की सलाह दी। लक्ष मण यह गुनमार ले कर तुम्हारे विना में जीवन धारण नहीं कर सकता। देश परमाराध्या मीतादेवीको वाल्मीकि आश्रम में रम देशमें स्त्री और मित्र मिल सकता है, पर ऐसा कोई देश माये । म समयसे लक्षमणको चित्तविराति दुई। अश्व देखने में नहीं आता, जहाँ तुम्हारे समान भाई, मन्त्री और मेध यसके ममय वेदी महामुनिके नाश्रममे सीतादेवी- सहाय मिलता हो । भाई ! उठो, आंख खोलो, मेरा दुःख को लाने गये। सीता पाताल-प्रवेशके बाद एक दिन देखो। जब कभी मैं पर्वत पर या वनमे शोकाल, प्रमत्त कालपुरुप मा र रामचन्द्रसे मिले। उस समय राम- और विषण्ण होता था, तब तुम ही प्रबोध वाक्यसे मुझे! चन्द्रने लश्न मणको द्वारपाल बनाया और कहा कि मन्त्रणा- सान्वना देने थे। अभी क्यों इस प्रकार नीरव हो गृहमें किसीको घुसने न देना । अफ्समात् रोपभूति गये हो? ! दुर्वासा गमचन्द्रसे मिलने आये। सन मणने रामचन्ट. रामायणी युद्धमें वीरवर लक्ष्मण बलवीर्य और की आजा सुना जर उन्हें भीतर जानने रोका। दुर्वासा साहसका अच्छा परिचय दे गये हैं। सहयोगी सेनापति- शाप देनेको नेवार हो गये। इस पर रामसे अनुमति के रूपमें युद्ध करनेके सिवा इन्होंने अपने भुजबलसे मणने घरमदा किया। प्रतिप्राबद्ध अतिकाय, इन्द्रजित् आदिको यमपुर भेजा था। मेघना । को मारना उनका सङ्कल्प था। चौदह वर्ष अनाहा 4 रामने लक्षमणको निन्दा की। लक्ष मणने सरयू-जल में जितेन्द्रि नहीं होनेसे इन्द्रजित्को कोई मार ना " और कृट कर प्राण घाये। ऐसा घर था। लक्ष्मणने धन्यासकालमें । सकता, अध्यात्मरामायणमें लक्ष मणको शेष' का अवतार कहा है। पालन किया था । ताड़का-निधनकाल में वि स व्रतका लक्ष मणके चरित्र में आन्त पुरुपकारकी महिमा देखी मन्त हो उस अनशन-शके निवामिल प्रदत्त जाती है। एक दिन लक्ष मणने रामसे कहा, "जलसे हुया था। निकाली हुई मछलीकी तरह मैं आपके विना क्षण भर भी रामके आवापालेनमें लक्षमणने कभी, नहीं ठहर सकता।" उन्होंने वनवासकी आज्ञाको अन्याय मोड़ा। न्यायसङ्गत हो वा न हो, लक्षमण समुग्व-नहीं। ' भावसे उसका पालन कर गये हैं। राक्षसोंका कि तथा रामके पित्त-आदेश-पालनको धर्मविरुद्ध समझा था। घर जिस दिन रामने सीताको विपुल-सैन्यसंघर्ष के मध्य इम पर रामने लक्ष मणसे कहा था, 'तू क्या इस कार्यको देवशक्तिका फल नहीं समझता। आरब्ध कार्यका नए - हो कर पैदल आने कहा था, उस दिन सीता लज्ञासे कर यदि किसी असकल्पित पथसे कार्यप्रवाह बदल का सहाय 1 . ।