पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/१३४

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लदेगा जाय, तो इम देश में समझना चाहिये। देखो, रामको पात निहलता देय उन्डॉन व्यथित चिससे यी हमेशास मुझे भरतके समान मानती गातो थी, 'बाप उत्साहशय न होवें 'आपको इस प्रकार दुर्वरता पर यह जो मेरी जानी दुश्मन हो गइ सो यो ? यह | दिपाना उचित नहीं 'पुरुरवार अपलमा कीजिये' स्पष्ट देवका कम है, इसमें मनुष्य कोई चारा नही ।" | इत्यादि प्रकार उपदश देवर रामसे कहा था, "देवताओं के एक्षमपाने उत्तर में कहा, 'शति दोन और मशरु प्यविधी अमृतभा तरद पहु तपस्या पृच्छ साधन फरफे महा दयको दोहार देते हैं। पुरपकार द्वारा नो देव प्रतिफूल राज दशरथने बापशे पाया था। यह सव मैंन भरतके ख होते, ये आपकी तरह अयसन न हो जाते। मुटु मुपसे सुनी है-आप तपस्याफे फलस्वरूप है। यदि प्यक्ति दी सबदा कट भोगत है-"मृदि परिभूयते।" विपद में पड पर थापम घमात्मा सहा न कर सके, घम और सस्या बहाना कर पिता नो घोर अन्याय | तो साधारण सादमी किस प्रकार सघ परेगा?" परते हैं, यह पया आपको मालूम नहा ! आप देवतूय राम जानते हो पान जानते हो, निस रिसी हैं, ऋतु और दात हैं तथा शव भी आपकी प्रशसा अन्याय किया है, लक्षमणो उसे क्षमा 1 की, यह बात परते है। ऐसे पुत्रको क्सि अपराधसे धार्म भगा रहे | पहले ही लिखी जा चुकी है। दशरथको गुणराशि ६१ आप भी धर्म करनेके लिये उटपटा रहे हैं, उस उई अच्छी तरह मालूम थी, ग्रोधको उत्तेजनासे घे धर्मको में भधर्म समझा। रीफ यशपत्ती हो कर निर चाहे जो कुछ पहे, पर दशरथ पुत्र गोक्से प्राणत्याग पराध पुरको वनवास देना -यही या सत्य है, क्या परेंगे, इसका भी उह पहले ही आमाहो चुका था। मीको धर्म रहते। मैं साज ही मपी पाहुयल पर फिर भी वे दारयको पटकारनेसे पाज नहा भाये। भयोध्या सिंहासा पर पैट गा। देस तो सदो, फोन सुमन विदाय काठमें नप क्षमणने पृा, 'कुमार। मुझे रोकता? आज पुग्पशर कुरासे ३हाम देर । पिताम कुछ कहा भी है। इस पर लक्षमण पोले, स्वोको मैं अपने कापू परूगा। जिसे माप देवतुल 'राजासे कहना, उनि रामपो पयो धन भेजा, निरपराध पतलात है, उसे माप मामामोसे प्रत्याश्यान पर मत ज्येष्ठ पुरका पर्या परित्याग दिया, बहुत साचो पर भी है,तव दिर किस लिये अकिञ्चित्वर देवशमशमा पर मुझे समझमें भाया। मैं महारामक चरितम तितृया कोई निदशन नहीं देख पाता। मरे भ्राता, पन्धु भर्ता लक्षमण ढ, पुरुषोरित और यिपद्म निगो ये। और पिता, सभी रामच ।' विपद पढन पर ये दतावा होते थे। पिराध राम ! भरतके प्रति हे मारी सह था। योके हाधर्म साताको नि सदायमापर्म पति देव "हाय, ! पुर भरत माता भायसे नुमाणित होगे इस गम्म घ मार माता पेक्यीकी भाशा पूरी दुइ' ऐमा फह कार में उनकी मरर धारणा थी। फेयर रामक सरस घे रागन्द्र भामा हो गए थे। रक्षमपने माइको उस | भरतफे प्रति कडोर पापया प्रयोग नहीं परते थे। भयस्था देगा कर मका तरद लियास छोड कर स्न्तुि जब जराघद्ध पार अनशन यश भरत पE, 'न्द्रफ समान पराममो दो पर माप को मनाथ ! रामक चरणों में रट गपे, तप राणा सयामा की तरह परिताप पर रहे हैं। भाइये, दम रोग दुप चौर रजाय मारे ये मृतवत हो गये। एक दिन जी राक्षमस पथ परें।' पालकी रातको पाला पूर पटरदा पी चिड़िया शेपिद रसमणन पुनजीयम म पर जय देगा। भी अपने घागरम मिट गया। उस समय शिम उन तीस अधीर दो मागुपूण मगरत रिपे रमण माण रो। अहो रास बियोका साद पिपर, तर उसो कातर कहा, 'यह ताशात मस पर धमारमा मस्त थापरी अपरा एक्षमपने इस प्रकार पायोग मोदप्राप्तिके मचि हि तपस्या कर रहा है। राम, भोग मान, जिपमा तिरस्कार मिया था। पिरदशी अपम्पा पितास सां पर सानमारकर नियनाहारी भरा रस