पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/१३७

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१३४ लक्ष्मणदास-लघमणमाणिक्य पार्श्वमे दुरारोह पर्वतशृङ्ग और वाम पार्श्वमे गभीर ; लक्ष्मणमाणिक्य-यङ्गालक प्रसिद्ध धारभूनार्मस ऐक । नदीकी खाई है। इन्हीं दोनोंके मध्यवती पथसे यात्री । भुलुगामें इनकी राजधानी थी । मेघनाके पूर्वापत्ती अनेक जाने आते हैं। अन्यमनस्क होनेसे गिरनेकी सम्भा परगनों पर इनका आधिपत्य था। वना है। भिक्ष क और संन्यासी राहकी यगलमें तरह वलालके इस भूयावंशक प्रभाव और प्रतिष्टाके तरह के रूप बना कर बैठे रहते हैं जो यात्रियोंके और सम्बन्धी अनेक विवदन्ती प्रचलित हैं। उनका अनुमरण भी भयके कारण है। करनेस मालम होता है, किए: दिन आदिशूर वंशीय लक्ष्मणदास-श्रीसूक्तमायके रचयिता। बङ्गज फायरथ श्रेणी में उत्पन्न राजा विश्वम्भर राय चट्ट. लक्ष्मणदेव-तोमापासारमझरो प्रणेता माधवदेव के ग्रामके अन्तर्गन सीताकुण्ड तीर्थ जा रहे थे। राहमे उन्हें पिता। रात हो गई। मेघनाके एक चोरवाद के चरमें लगर लक्ष्मणदेशिक-एक प्रसिद्ध तान्त्रिक पण्डित । ये वारेन्द्र । डाल कर रात भर यही रहे। म्बनमें राजाने देखा कि ब्राह्मण विजय आचार्गके पौत्र और श्रीकृष्ण के पुत्र थे।। । भगवान् कह रहे है, "तुम माज जिस स्थानमें सो रहे इन्होंने कार्तवीर्याज्जुनदीपदानपद्धति, फुण्डमण्डपविधि, हो, उनके चारों ओरके स्थानों पर तुम्हारा अधिकार ताराप्रदीप, शारदातिलक, शव्दार्थचिन्तामणि नामक । होगा।" प्रातःकाल होने पर उन्होंने स्वप्नको ईश्वरका शारदातिलकटीका और तन्तप्रदीप नामकी ताराप्रदीप- टीका लिखी। आदेश ही समझ लिया। उस स्थानको जीननेका लक्ष्मणद्विवेदिन्-उपसर्गद्योतकत्वविचार, द्विकर्मवाद । सङ्कल्प कर वे अरुणोदयकालमे ही रवाना हुए। प्रशान्त और सारसंग्रह नामक व्याकरणके प्रणेता। नदीमें दिनिरूपण न कर सकनेके कारण वे इधर लक्ष्मणनायक-एक नायक-सरदार। ये १८२० में उधर भटकते रहे। इसी कारण राजाने उस स्थानका वालघाटके अन्तर्गत परवडा नामक स्थान पर भुल वा भुलुआ नाम रखा। जनपद स्थापन कर गरे हैं। प्रवाद है, कि १०वी माघ अथवा १२०३ ६०मे यह लक्ष्मण पण्डित-सारचन्द्रिका नामक राघवपाण्डवीय घटना घटी थी। इसके पहले ही महम्मद इ-बस्तियार टीका और सूक्तिमुक्तावलीके रचयिता। खिलजीने बङ्गाल पर आक्रमण कर दिया था। प्रवाद. लक्ष्मणपति-गौरीजानकके प्रणेता। चर्णित कालनिर्णयमें विश्वास नहीं होने पर भी लहमण- लक्ष्मणप्रसू (सं० स्त्री०) लक्ष्मणस्य प्रसूर्जननी। सुमिला माणिक्यको वशलतासे मालूम होता है, कि राजा लक्ष्मणभट्ट (सं० पु० ) गीतगोविन्दको टीकाके प्रणेता।। विश्वम्भरकी ११वीं पीढ़ीमें राजा लक्षमणमाणिक्य उत्पन्न लक्ष्मणभट्ट-१ काव्यप्रकाशटोकाके प्रणेता चण्डिदासके हुए थे । विश्वम्भरकी मृत्यु और लक्ष मणके जन्म, दोनों एक मित्र । प्रन्थकारने अपनी टीकामें वन्धुवरको पंडि- में ३५० वर्षका अन्तर है। ताईका परिचय दिया है । २ पद्यरचना और रतमालाके इधर ऐतिहासिक प्रमाणसे भी जाना जाता है, कि प्रणेता। महाभारतको टोकाके प्रणेता। जहा तक १५८६ ई० में चन्द्रद्वीपपति राजा कन्दपनारायण जीवित सम्भव है कि ये भारतमावदीपके प्रणेता नीलकण्ठके थे। राजा लक्षमणमाणिक्य उन्हीं के समसामयिक थे। गुरु थे। ४ हौत्रकल्पद्र मके प्रणेता नारायणभट्टयो पुत्र । कन्दर्पनारायणको मृत्युके बाद बालक रामचन्द्रराय इन्होंने वाघेल-सरदार राजा भावसिंह देवके आदेशा- राजा हुए। वालक रामचन्द्रको लक्ष मणमाणिक्य बुरी नुसार उक्त अन्य सकलन किया। ५ आचाररत्न, आचार- निगाहसे देखते थे। कई कारणोंसे क्रुद्ध हो उन्होंने - सार, गुरूशतकटिप्पण और गोत्रप्रवररत्नके रचयिता। भुलुआ पर चढ़ाई करने के लिये जंगी जहाजों को सजाने. रामकृष्णभट्टके पुत्र, नारायणभट्टके पोल और रामेश्वर- का हुकुम दिया। तदनुसार उनका दलवल अस्त्रशस्त्र भट्टके प्रपौत्र थे। ६ लक्षमणभट्टोय नामक वेदान्तग्रन्थके ले कर मेघना नदीको पार कर गया और लक्ष्मणको रचयितो। खवर दी गई। भुलुआ राज कोई आशङ्का न कर प्रति-