पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/१३९

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लदपणावती-लक्ष्मी लक्ष्मणावती-बङ्गालकी प्राचीन राजधानी । इसका दूसरा भी मात करता था। दोनों नेत शरत्कालीन मध्याके नाम गौड़ था । गौड़ेश्वर महाराज लक्ष मणसेन (दूसरे विकसित पपाको भी तिरस्कार करते थे। यह देवी उत्पन्न के मतसे सेनवंशीय अतिम राजा लछमनिया ) ने गोड होते ही ईश्वरकी इच्छासे दो रूपोंमें विभक्त हो गई। राजधानीको अच्छी तरह सजा कर उसका 'लक्ष मणा-1 दोनों ही मूर्ति रूप, वर्ण, तेज, वयस, प्रभा, यश, वस्त्र, पती' नाम रखा था। तत्परवत्ती मुसलमान ऐति भूषण, गुण, हास्य, दर्शन, वाक्य, मधुरस्वर और नीतिमें हासिक भी इस नगरका 'लखनौती' नामसे उल्लेख कर एक सी थी। उनका नाम राधिका और लक्ष मो रखा गये हैं। १२४३ ई०के कुछ वाद मिनहाजने इस नगरमें | गया । कृष्णकी वामांशसम्भूता मूर्ति लक्ष मी तथा दक्षि घास किया था। रक्ष मणावतीका तोरणद्वार तथा | णांशसम्भूता देवी राधिका कहलाई। राधिकाने उत्पन्न अन्यान्य हिन्दू और मुसलमान-कीर्तिका निदर्शन आज | होते ही श्रीकृष्णकी कामना की। पोछे लक्ष मीने भी कृष्णकी भी जो गौडराजधानी में विद्यमान है उसका संक्षिप्त | प्रार्थना फो। श्रीकृष्णने इस प्रकार दोनोंसे मार्थित हो विवरण गौडमें लिखा जा चुका है। वर्तमान प्रत्नतत्त्व दोनोंका ही अभि टाप पूर्ण किया था। इसके बाद श्रीकृष्ण विदोंके अध्यवसायसे इस प्राचीन जनपदके लुप्त इति दक्षांश हिभुज और वामाशसे चतुर्भुज इन दो भागोंमें हासका अनेकांश वल्लालसेन और लक्ष मणसेन आदि ! विभक हुए । पोछे डिभुज मूर्तिमं कृष्णने गधिकाको प्रहण सेनवंशीय राजाओंके जीवन इतिहासके साथ साथ किया और स्वीय चतुर्भुज नारायणमूर्ति ले कर लक्ष मीकी उद्घारित होता है। उसका विस्तृत विवरण बङ्गालके | प्रार्थना पूरी की। लक्ष मीदेवी स्निग्ध दृष्टिसे समस्त विश्व इतिहासमें दिया जायगा। पर लक्षा रपती हैं, इस कारण वे महालक्ष मी कहलाई। गौड, वङ्गाल और सेनराजवश देखो। इस प्रकार द्विभुज कृष्ण राधिकाकान्त तथा चतुर्भुज लक्ष्मणोरु (सं० वि०) लक्षणोरु देखो। नारायण लक्ष मीकान्त हुए थे। लक्ष्मण्य (सं० पु०) लक्ष मणके पुत्र । ( ऋक् ५।३३।१०) श्रीकृष्ण राधिका और गोपियों के साथ गोलोकमें रहे लक्ष्मवीथी (प्त स्त्री०) लक्षा करनेका पथ । तथा चतुर्भुज नारायण लक्ष मोदेवोके साथ वैकुएटमें गये। लक्ष्मी (सं० स्त्री० ) लक्षयनि पश्यति उद्योगिनमिति लक्षि | कृष्ण और नारायण दोनों ही सर्वा शमें पक-से हैं। यह (ला मुट च। उण ३१६० ) ई प्रत्ययो मुहागयश्च ।। लक्ष मोदेवी शुद्धसत्यस्वरूपा हैं। वैकुण्ठध म हो उनका विष्णुपत्नी । पर्याय--पद्मालया, पद्मा, कमला, श्री, पूर्णाधिष्ठान निर्दिष्ट है। वे प्रेमसे नारायणको आवद्ध हरिप्रिया, इन्दिरा, लोकमाता, क्षीराधितनवा, ग्मा, जल- कर सभी रमणियों में प्रधान हुई। यह लक्ष मीदेवी इन्द्र- धिजा, भार्गवी, हरिवल्लभा, दुग्धान्धितनया, क्षीरसागर की सम्पत्तिरूपिणी स्वर्गलक्ष मीरूपमें, पाताल और मर्त्य- सुता। (कविकल्पलता) में राजाओं के निकट राजलक्ष मीरूपमें, गृहिगण-गृहमें ग्रह- ब्रह्मवैवर्तपुराणमें लक्ष मोका उत्पत्ति-विषय इस प्रकार लक्ष मीरूपमें, फलांश द्वारा गृहिणी और सम्पद् रूपमें, लिखा है, एक दिन नारदने नारायणसे लक्षमीको गोगणको प्रसूति सुरभिरूपमें, यज्ञकामिनी दक्षिणा रूपमे, उत्पत्ति और पूजादिका विषय पूछा । नारायणने कहा था | क्षीरोदसागरको कन्या रूपमें, चन्द्रसूर्यमण्डलमें, रत्नमें, कि, "सृष्टिके पहले रासमण्डलस्थित परमात्मा श्रीकृष्णके | फलमें, नृपपत्नीमें, दिव्य स्त्रीमें, गृहमें, समरत शस्यमें, चाममागसे लक्ष मीदेवी उत्पन्न हुई। वे अत्यन्त सुन्दरो वस्त्रमें, परिष्कृत स्थानमें, देवप्रतिमामें, मङ्गलघटमें, और तप्तकाञ्चनवर्णाभा थी। उनका अङ्ग शीतलमें सुख- माणिक्य और मुक्ता आदिमें शोभारूपमें अवस्थान करती जनक, उप्या और प्रीमकालमें शीतल, कटिदेश क्षीण, दोनों है। जहां जहां सामान्य रूपकी भी शोभा देखने में आती स्तन कठिन और नितम्ब अति विशाल था। यह देवी है, वहा लक्षमीदेवी अवस्थित हैं, ऐसा जानना होगा। स्थिरयौवना थी तथा उनका वर्ण श्वेत चम्पकके समान | क्योंकि, लक्ष मीदेवी ही एकमाल शोभाकी आधार हैं। था। मुखमण्डल शारदीय कोठि चिन्द्रकी प्रमाको बिना उनके अवस्थानके शोभा रह नही सकती यापपरामानातकतामा