पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/१४२

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१३६ सुवर्ण सदश तथा तण्डुल रजत सदृश उत्पन होता है, अन्न करके उनके उद्देशसे हविस्याशी ही नियम पालन करना तुपरहित अर्थान् परिणत पाया जाता है यहा मेरी अब होता है। स्थिति नाननी चाहिये । नो प्रिय पापभाषी, वृद्धोपयो, शुक्लपक्षम गृहस्पतिधारको लक्ष्मीपूजा करनी होती है। प्रियदर्शन, अल्पप्रलापी तथा प्रदीर्घसूत्रा है, जो धर्मशील, इस दिन यदि शुम तिथिनक्षत्रका योग न हो, तो रवि जितिय, विद्याचिनीत, भगति, जनानुरागा है और शोर सोमवारको पूजा को ना सस्ती है। इस पूजामें जो परोपतापी नदी है, मैं सबदा ऐसे व्यक्तिके यहा पृहस्पतिवार मुण्य तथा रवि और सोमार गौण है। रहती। जो देरीस स्नान करता और जल्दी पाता है, | गृहस्पतिवारमें पदि पूणा अर्थात् पञ्चमी, दशमा या जो सुगध पुष्प पाकर उसे नहीं सूघता, नग्ना स्त्रीको पूर्णिमा तिथि हो, तो उमा दिन पूजा परना उत्तम है। नहा देवता है, वही सघ आदमो मेरे प्रिय है। जिस इममें कुछ विशेषता भी है, वह यह कि पोपमासमें दशमी, पुरधर्म त्याग सत्य और शौन ये तान महागुण हैं मैं उनक चैत्रमासमें पञ्चमी तथा भाद्रमासमें पूर्णिमा तिथि विशेष घरवास करता है। उपयोगा है। तिथि प्रतिपद, एकादगी, पठी, चतुर्थी __भामर फल, गोमय, शह और शुक्रवार, पद्मोत्पल, नवमी, चतुईशी, द्वादी, सयोदशी, अमावस्या और चन्द्र, महेश्वर, नागयण, यसुरा और उत्सवमदिर, इन अष्टमी तिधि रक्षमीपूजा निपिद्ध है। स्काति, प्रथम सव स्थानों में एक्षमा नित्य अरस्थान करती है। मास अपराहकाल, साहसपशे दिन भोर रातिकाल में यह जो सप खो गुणभक्युिक्ता, पतिका भांशानुयत्तिनो) पूजा नही करनी चाहिये। श्रवणा धनिष्ठा शतभिषा है तथा जो पतिका जूठा खाती है, जो सर्वदा मतुथा, और पूर्वमानपद इन चार नपवों में तथा एप्णपक्षमें भी धीरा, प्रियरादिनी, सौभाग्ययुक्का, लावण्यमयी, प्रिय भी पूजा 7 करे। दर्शना, श्यामा, मृगाझी, सुशीला, पतिव्रता, रन सब एक काठके घरतनर्म फरीय चार सेर धान भर कर गुणोंमे युक्त हैं उनम में सर्वादा सरस्थान करती है। उसे अनेक प्रकार आभूपोंसे सजाये । पाठे सुगध जो पूति और पप्युपित पुष्प प्राण करता, यहुत शुक्पु ष द्वारा उमको पूजा परे। पौरमास पिष्टक, भादमियों के साथ सोता, हटे फटे आमन पर बैठता और चैत्रमासमै परमान तथा भाद्रमासम पिष्टक और जो कुमारी गमन करता है लक्षमी उसको दूरसे परि परमान तथा नाना प्रकारचे उपहार द्वारा पूर्वारी मोर त्याग करती है। चित्राङ्गार अम्धि, यहि, भस्म, द्विज, मुह करके पूजा करनी होगी। नो यथाविधान यह पाप, तुप गुरु रहे जो पैरसे स्पर्श परता यह लक्ष मी लक्षमीपूजा करते हैं वह इस रोष में नासा प्रकारका सुग्न हीन होता है । (स्कन्दपु० मन मा कशवसंवाद मन मीचरित्र) सौभाग्य मोग कर अन्तकालमें विष्णुलोकको जाते हैं। गण्डपुराणके १९४वें अध्याय तथा मार्कण्डेयपुराण लक्ष्मादेवीको पूजा स्त्रियों को करनी चाहिये, पेसा विधान आदिम भी यह लक्ष मोरिक्ष विशदरूपसे वर्णित है। देखनमें आता है। नहा लग्न मापूजा होगी, यहा घटा । विस्तार हो जाने के मयसे यहा नही लिम्या गया। नही बनाना चाहिये। झिएटा और काचा पुष्प द्वारा लक्ष्मीपूजा न करे । पद्म द्वारा रमापूजा विशेष मन्न मापूजाको व्यवस्था। शुभजनक है। स्वर्गम देयतामोंसे लक्षमी पूजित हुइ थीं, इस कारण इस रक्ष मीपूजामें लक्षमा, नारायण और युवेर इम भारतवर्णमें भी लोग डाकी पूजा करते हैं। पाप, चैव तीनोंशी पूजाका विधान देखा जाता है। इस दिन सर और माटइन तास महानमें सक्षमीपूजाका विधान है। स्थतीकी पूजा तथा सरस्वतीपूजाके दिन भी लक्षमीपूजा विष्णुने इसी समय रक्षमीका पूना का था, इस कारण होती है। • यह तीन मास सक्षमीपूजाका उपयुस समय है। इन ब्रह्मवैस्तपुराणमं लश मीदेवीको श्वेतरा त तोम महोने में तीन बार पना होती है। लक्षमीकी पूजा' लाया है।