पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/१५

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१२ रोटास (रोहिनास )-रोटिका किन्तु दुःसका विषय है, कि सीमाशाचीरकी मध्यगनउत्तर-पश्चिममें ५ मोल विस्तृत होगा। उसकी परिधि दुर्गवाटिका ढह गई है। इस सुरक्षित दुग भूमिका परि- प्राय: २८ मील होगी। १८४८ ६०में डा० करने इम माण करीव २६० एकड होगा। इस स्थानका प्राकृतिक स्थानकी ऊचाई १४६० फुट स्थिर कर गये है। उम पर्वत पर चढ़ने के ८३ रास्ते है। उनमैग्ने ४ चित्र बड़ा ही मनोरम है। रोटासगढ़ ( रोहिन स )-शाहाबाद जिलान्तर्गत एक वडा घाट और ७६ घाटी कहलाता है। दुर्गपरिक्रमाके __गिरिदुर्ग । यह अक्षा० २४.२७° उ० नया देशा० ८.५५, मध्य जितनी प्राचीन कीलिया दिनाई देनी है, उनमेमे पू०के मध्य सम्मेराम शहर से ३० मील दक्षिणमें अवस्ति मानसिहके प्रतिप्टिन टो हिन्दमन्दिर, औरगजेवकी वनाई है। जनसंख्या २ हजारके करीब होगी। मसजिद, महाल सरीय नामक प्रासाद और 'बारहदारी' शाहाबाद जिलेमे जगह जगह प्राचीन कीत्तिके अनेक नामक राजकार्यालय स्थापत्य शिल्पका उत्कृष्ट निदर्शन निदर्शन रहने पर मी प्रत्नतत्त्वविदोंके लिये ऐसा स्थान है। और कही भी नही है। इस स्थान के प्राचीनत्यके सम्बन्ध भविष्यब्रह्मवण्डमे गया के अन्तर्गन रुहिदासपत्तनका से उल्लेख है। भौगोलिक विवरणानुमार वह स्थान में अनेक किंवदन्ती प्रचलित है सही, पर एकमात्र दुर्गसे ' उल्ल ही उसको अतीत कीतिका स्पष्ट आमाम मिलता है। ; रोटासगढ़ के जैसा प्रतीत होता है। (बार० ३१३६०) सूर्यवशीवतश राजा हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहिताश्यक रोटिका (सं० स्त्रो०) पिष्टविशेष, रोटी। यह मैदा, कलाय, . चने आदिकी बनाई जाती है। साधारणतः रोटी कहने- नामानुसार इस रधानका नाम रोहिताश्वगढ़ हुआ था। पीछे मुसलमानो अमलमे इसका नाम बदल कर रोटास- । मैदेकी ही गेटी समझी जाती है। भावप्रकाश शेटी गढ़ रखा गण । गहा रोहिताश्य मूर्ति प्रतिष्ठित थी। वनानेका तरीका इस प्रकार लिग्ता है-सूये गेहको गयानीय लोग भक्तिपूर्वक उस मूर्तिकी उपासना करते चूर कर जलसे गुभो। पोछे गोल गोल लाई बना कर थे। सम्राट औरङ्गजेबने रोटासगढको जीत कर तहस उसे तब गरम करे । अनन्तर कोयलेको आग सेक लेने. नहस कर डाला। से यह तैयार होती है। इसका गुंण वलकारक, रुचि ___ उपरोक्त ससागरा पृथ्वोके अधिपति महाराज हरि जनक, शरीरका उपचयकारक, धातुबई क, वायुननिक, श्चन्द्रले उस बंशके क्तिने राजे इस दुर्गाधिकारकी रक्षा और गुरु है। जिस आदमीकी अग्नि प्रबल है उसके लिये यह विशेष उपकारी है। • करते आ रहे थे, उसका कोई विवरण नहीं मिलता। जीकी रोटी-जोको चूर कर उन प्रणालोसे रोटी बनाई ऐतिहासिकयुगमे १५३० ई०को शेरशाहने इस स्थानको जाती है, इसीको जॉकी रोटी - हने हैं। इसका गुण • जीत कर दुर्गसस्कार करना चाहा, किन्तु कुछ समय वाद ही वह उस स्थानका परित्याग कर शेरगढ़में रुचिर, मधुररस, लघु, मलबद्ध, शुक्र और वातजनक, बलकारक तथा कफरोग, पीनस, श्वास, कास, मेह, दुर्ग बना कर रहने लगे। सम्राट अकबर शाहके सेना । प्रमेह और गलरोगनाशक माना गया है। पति और बदलालके प्रतिनिधि राजा मानसिंहने १४वों ___उड्ढकी रोटी -मुखी उडदके चरको चमसी कहने सर्दीक शेप भागमे यह दुगं मजबूत करके वहा सेनादल है। इस चमसीसे जो रोटो वनाई जाती है उसे बल स्थापन किया था। वे प्राचीन दुर्गका सस्कार कर और भद्रिका वा उडदकी रोटी कहते है। इसका गुण रुक्ष, नये नये वासभवनादि वनवा गये है। उनके उत्कीर्ण उष्णवीर्य, वायुवईक और वलकारक है। यह प्रवलाग्नि दुर्गगात्रस्य संस्कृत और पारस्य भाषामें लिखे हुए दो मनुष्योंके लिये हितकर है। उड़दको दालको जलमें शिलाफल से उनका आनुपूर्विक विवरण जाना जाता भिगो कर उसको भूमी फेंक दे। पीछे उसे धूपमें सुला रोटांसगढ शैलके जिस अधित्यकाप्रदेशमै ध्वस्त- कर जांतमें पीस लेनेसे उसे धृमसी कहते हैं। इस धूमसीसी रोटी कफ और पित्तनाशक तथा कुछ वायु- दुर्गका निदर्शन पड़ा है वह पूर्व पश्चिममें ४ मील और बर्द्धक है। इस रोटीका नाम झरिका है।