पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/१५३

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___ लखि अखिमपुर लखि-सिन्धुप्रदेशके फरांची जिलेके सेवान उपविभागके । नक पतिशान्त में अगरेजोंका अधिकार न होने पाग अन्तर्गत एक वड़ा गाव यह मिन्धुनटके पश्चिमी है। दक्षिण सीमा ले पर अजगज और ब्रह्म गध- किनारेके पास और लखि गिरिसकटके प्रवेशपय पर संगटका बटोयम्त हुआ था । सम्प्रति ग्रह्मराज्य अवस्थित है। सिन्धु, पंजाब और दिल्ली रेलवे लाइन अङ्गजोंके अधिकारमे आने पर मी उस देशकी बहुतेरी लखि नगर होती हुई गिरिपथके बीच हो कर चली । पहाडी जातियां आज भी स्वाधीनमावसे पहाडकी तराई- गई है। यहां उक्त रेलचे लाइनका एक स्टेशन है। यहांमे ! विचरण करती है। प्रसिद्ध धारातीर्थ दो मील दूर पड़ता है। इस गरम ब्रह्मपुत्र नद दोनों किनारोंको भृमि बड़ी उपजाऊ मरनेमें जानेके लिये लंबी चौड़ी सड़क दौड़ गई है। है। उसको उत्तरी, पूर्वी और दक्षिणी सीमा पर बड़े लखि-मिन्धुप्रदेश शिकारपुर जिलान्तर्गत एक नगर। बड़े पहाड़ है जिससे आसाम उपत्यकाले ये सब स्थान यह सला० २७५२ उ० तथा देशा. ६८ ४४ पू० के बड़े मनोरम दिनाई पड़ते हैं। ब्रह्मपुत्र नद नाना वीच पडता। इस नगरसे सिन्धु, पंजाब और दिल्ली। भाखाओंके साथ हिमालयकी कन्टगाने निकल कर रेलपथका एक जङ्कशन मिर्फ डेढ़ कोस दूर है। यह ; आसाम-प्रदेश होता हुआ नीचे की ओर बह गया है। नगर बहुत प्राचीन है। जिस समय वर्तमान शिकार- : नीके कीनारे धान काफी उपजता है। बहुत-से यांस पुर विमाग जंगलोंसे भरा था, उस समय यह सिन्धु' और फलये भी जंगल है। प्रदेशके प्रसिद्ध वद्धिका और टाना विभागका प्रधान ब्रह्मपुत्र नद ही यहांका प्रधान हैं। वर्षाकालमें इस केन्द्र समझा जाता था। फिलहाल वह सौन्दर्या बहुत , नदमें सदिया तक जहाज भाता जाता है, किन्तु दूसरी कुछ नष्ट हो गया है। । ऋतु में दिव गढ़ ना जाना है। इस समय छोटी छोटी लखिमपुर-आसाम प्रदेशको पूर्वी सीमा पर स्थित । नायें ब्रह्मकुण्डतीर्थ ना जा सकती है। दिबद्न और अरे लोंके अधिकारमें एक जिला । ब्रह्मपुत्र नदके दोनों ' दिन नामकी दो शाखानदी हिमालयकी तराईसे निकल तोरवी भूभागको ले कर यह जिला गठिन है। यह कर यहां ब्रह्मपुत्रमे आ मिली है। दिवङ्गत ही तितकी अन्ना० २६४६ से २७ ५२ ३० तथा देशा० १६४६से प्रसिह तमानपु नदी है। इसके अलावा सुवर्णधी नव- ६५ पृ० मध्य अबस्थित है। भूपरिमाण ४५२६ ' दिहित, दिव, बूढ़ी दिदिन निलगाई और लोहित नदी वर्गमील है। इस जिलेका अधिकांश हिस्सा ही जंगलों ' ब्रह्मपुत्रका कलेवर बढ़ाती हुई इम जिलेके बीच हो कर और पर्वतोंसे भरा है। वीच बीचमे पहाड़ी जातिका यहती है। चास है। सरकारको वर्तमान पैमाइशी में सिर्पा ३७२३ खेतीदारोकी उन्नति और वृद्धि के लिये यहाकी क्सिी वर्गमील भूमि रहने योग्य विशिष्ट हुई है। टिव गढ़, नीम वाध नहीं दिया जाता । प्राचीन आसामके दिव नदी और ब्रह्मपुत्रके मंगम पर अवस्थित है और गजायोंने राज्यकी उन्नतिके लिये बांध दिलवाया था। यही इस जिलेका विचार सदर है। जनसंम्या जंगलमें जो मव वस्तु मिलती है उनमें ग्वरके ही पेड़ २७११६ है। प्रधान है। इसके सिवा रेगम, मोम और अनेक तरहकी इस जिलेके उत्तर दफला, मी, थायर और यौपध भी पाई जाती है। हाथी, गैडा, जंगली भैसा, मिशमी गैलमाला, पूर्वमे मिशमी और सिङ्गको शैल-जंगली गाय, हरिण और मालू आदि पशु लौर बहुत माला : दक्षिणमें पाटर्क पर्वत और नागाशेलका अव- तरहके पक्षी बनमें स्वच्छन्दम्पसे विहार करते है। वाहिका प्रदश तथा पश्चिममे दरग और शिवसागर ब्रह्मकुण्ड या परशुरामकुण्ड यहांका प्रधान टीर्थ है। जिलेकी प्रान्तप्रवाही मरा मरणार्ड, दिहित और दिसङ्ग । यहां ब्रह्मपुत्रकी एक शाखा वहती है। हर साल बहुतसे मदी पड़ती है। उत्तर और पूर्वप्रान्तस्थित शैलमाला ! तीर्थयात्री पर्वतके ऊपर स्थित इस तीर्थका दर्शन करने पर टस नामकी पहाड़ी जाति रहती है, इस कारण अभी आते है । पान हीमें प्रसिद्ध देवडवी (रानसकुएउ)-