पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/१६१

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लग्न लग्न स्थिर नहीं होनेसे जातकका फलाफल नहीं। जन्म होनेसे मनिमागृहपक हार, दुव्यात्मक लग्नमें दो - जाना जा सकता। इस कारण पहले लग्नस्थिर करना | द्वार तथा चर लग्नमें होनेसे अनेया द्वार होते है। उचित है। लग्न स्थिर होनेसे निःसन्देह शास्त्रोक फल जातक में यह भी लिया है, कि केन्द्रमियत वाटयान प्रह फलता है। बहुतेरे ज्योतिर्विद् लग्नके प्रति विशेष लक्ष्य जिम दिशाका अधिपति है, मूतिकागृहका द्वार सो न करके फल निर्णय करते हैं , किन्तु इससे शास्त्रोक्तः योग सिर करना चाहिये । केन्द्रमियत अनेक प्राह बलवान् फल कुछ भी नहीं मिलता ! इस कारण शानमें लग्न-1 नेस अनेक द्वार होते है और यदि गेन्द्र ग्रह न रहे, परीक्षाके अनेक उपाय कहे हैं । अति संक्षिप्त भावमें इस तो जन्मलग्नसे राजिदिर के अनुसार सूनिकायहका द्वार का विषय लिया जाता है। निर्णय करें । ___ अनेक समय ऐसा हुआ करता है, कि जब कोई वचा मेव पीर चपटान मूनिकागृह के पूर्व भागमे, मिथन जन्म लेता, तब वहा घडीके न रहने अथवा निश्चितरूपसे लानमें अग्निकोणमें, करंट और सिंहलग्नमें दक्षिण भाग. समयका ज्ञान न होनेसे आनुमानिक ममयको ले कर मे, बन्यालग्नमें नेतकोणमें, तुला और यश्चिक लग्नमें लग्न स्थिर किया जाता है, किन्तु आनुमानिक समयके | पश्चिम भागमे, धुनल ग्नमें वायुकोण, मर और कुम्भ ले कर जो लग्न निरूपित होता है, वह ठीक है या नहीं, लग्नमें उत्तर भागमें तथा मीनलग्नमें जानकोणमें निशु. उसकी जांच के अनेक उपाय हैं। जैसे- का प्रमय और भयपारपान निरूपण करना होता है। सन्देहनमारीन्हा। शिशु के मस्तक पतन द्वारा लग गानको जो दिशा है। यूप, कर्कट, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन मका उसी दिगामे गिशुफा मम्नक पतिन होता है अर्थान् मेय, अन्यतम लग्न होनेसे धात्री सधवा तथा प्रमूति द्विवना सिंह और धनु लग्नमें पूर्वशिग, वृष. मन्या और मकर हो कर बच्चा जनती है । मेप, मिथुन, सिंह, तुला, धनु लग्नमें दक्षिणगिरा, मिथुन, तुला और कुम्भ लग्नमें और कुम्म इसका अन्यतम लग्न होनेसे धात्री विधया | पश्चिम शिरा, ककट, वृश्चिक और मीन लग्नमें उत्तर- तथा प्रसूतिने एकवस्त्रा हो कर बचा जना ६, ऐसा शिग हो कर बचा जन्म लेता है। किसी किसी मनमें जानना होगा। लगनाय अथवा लगनाधिपति ग्रह यदि दलवान हो, तो "युग्मे च सधवा धानी बयुग्मे विधवा स्मृता। उम प्रहकी जो दिशा है उसी दिनामे प्रसवगृह या प्रमव. अयुग्मादत्रमयुग्म युग्मायुग्मं क्रमाद धै।" (गृहज्जा०)। गृहका द्वार तथा शिशुका मस्तक पतन होगा, ऐमा स्थिर जातकचन्द्रिकामें लिखा है, कि मेप, सिंह और धनु ! किया जाता है। फिर किसीका कहना है, जि लगनके लग नमें जन्म होनेसे सूतिक गृह घरसे पूर्वमागर्म तथा द्वादशाशपतिकी दिशासे सूतिकागृहका द्वार निरूपित सूतिकागृहकी स्त्रियोंकी संख्या ५; कन्या, वृप और मकर होता है। लग्नमें सूतिकागृह घरसे दक्षिण और स्त्रीकी संख्या ४ राण्याधिप ग्रहकी स्थिति ननुसार नग्न परीक्षा-चन्द्र जन ; कुम्भ, तुला और मिथुन लग्नमें सूतिकागृह घरसे | जिस राशिमें रहते हैं उम रागिका अधिपति प्रह पश्चिम तथा स्त्री-सख्या ७ जना मीन, कर्कट और वृश्चिक जन्मकुण्डलोचकर्म जिम राशिमें रहता है उस राशि लग्नमें सूनिकागृह घरसे उत्तर तथा स्त्री-संख्या ३, ६ वा अथवा उस राशिकी पञ्चम वा नवम राशिमें अथवा है,ऐसा जानना होगा। सप्तम राशिसे पञ्चम वा नवम रानिमें जन्मलगन होगा। मेष, कर्कट, तुला, वृश्चिक और कुम्भ इनमेंसे एक यह नियम अधिकांश जगह प्रायः एकमा देखा जाता जन्मलग्न अथवा लग्नका उदित नवांश राशि स्वरूप होने- जाता है। चन्द्र राधिपतिको अवस्थितिके स्थानसे से घरसे पूरब, धनु, मीन, मिथुन और कन्या लग्न होनेसे उक्त ६ स्थानोंमें जन्मलगनकी जो सम्भावना लिखी गई, उत्तर , वृष लग्न होनेसे पश्चिम ; सिंह और मकर लग्न इसफा किसी प्रकार व्यतिक्रम होनेसे पूर्वापर राशिमें ही होनेसे दक्षिण भागमें सूतिकागृह होगा । स्थिर लग्नमें , लगन हुआ करता है।